Wednesday , September 26 2018
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राजनीति नाम परिवर्तन की….

अपनी नैनीताल यात्रा के दौरान एक बार हल्द्वानी से पहले एक स्थान पर रुकने का मौ$का मिला। उस जगह का नाम था गोरा पड़ाव। गोरा पड़ाव नाम के विषय में कुछ स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार जब अंग्रज़ों ने काठगोदाम-नैनीताल मार्ग पर सड़क निर्माण का काम शुरु किया था उस समय उन्होंने अपना कैंप कार्यालय इसी जगह पर बनाया था। इसीलिए इस स्थान को गोरा पड़ाव यानी अंग्रेज़ों के ठहरने की जगह कहा गया। निश्चित रूप से प्रत्येक नामकरण के पीछे का कोई न कोई इतिहास ज़रूर होता है या फिर अतिविशिष्ट व्यक्ति के स मानार्थ उस स्थान का नाम रख दिया जाता है। परंतु एक नाम को मिटा कर उसके स्थान पर दूसरा नाम रख देना ज़ाहिर है कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है जैसेकि एक इतिहास को मिटाकर उसपर नया इतिहास चढ़ाने या मढ़ने की कोशिश की जा रही हो। कालांतर से नाम परिवर्तन का यह सिलसिला जारी है और शासकगण अपनी सुविधा के अनुसार,झूठी लोकप्रियता अर्जित करने के लिए अथवा क्षेत्र,समुदाय,धर्म अथवा जाति विशेष के लोगों को लुभाने के लिए अनेक स्थानों का नाम बदलते आ रहे हैं। सरकारों द्वारा तो कभी किसी योजना का नाम बदल दिया जाता है, कभी किसी गली-मोहल्ले का नाम बदलने की $खबर सुनाई देती है और कभी शहरों व ज़िलों के नाम बदल दिए जाते हैं। कलकत्ता को कोलकाता बुलाया जाने लगा। मद्रास चेन्नई बन गया। पांडेचरी पुड्डूचेरी हो गई। बंबई मुंबई बन गई और बैंगलोर का नाम बैंगुलूरू रख दिया गया,गुड़गांव का नाम गुरूग्राम रख दिया गया। इसी प्रकार देश में और भी कई स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं। प्रश्र यह है कि नाम परिवर्तन की इस $कवायद के पीछे राजनीतिज्ञों की मंशा आखिर क्या होती है? क्या किसी जगह का नाम बदल देने से उस क्षेत्र के विकास या प्रगति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं? क्या नाम परिवर्तन के पश्चात उस क्षेत्र विशेष के लोगों को रोज़गार मिलने लग जाता है? क्या उनकी शिक्षा,स्वास्थय,सड़क-बिजली-पानी जैसी समस्याओं में कुछ सुधार होने लगता है? यदि इस प्रकार के कुछ फायदे जनता को होते हों तो निश्चित रूप से जगहों का नाम एक ही बार नहीं बल्कि बार-बार बदला जाना चाहिए। परंतु यदि यह कवायद केवल किसी वर्ग विशेष को खुश करने के लिए और किसी दूसरे वर्ग या समुदाय के लोगों को आहत करने या चिढ़ाने के उद्देश्य से की जा रही हो और साथ-ही साथ इस तरह की प्रक्रिया बेहद खर्चीली हो फिर आखिर ऐसे नाम परिवर्तन का मकसद ही क्या है? जहां तक कलकत्ता को कोलकाता मद्रास को चेन्नई तथा पांडेचरी को पुड्डूचेरी का नाम देने का प्रश्र है तो यह नाम क्षेत्रीय भाषा व उच्चारण के अनुरूप परिवर्तित किए गए हैं जैसा कि बंबई के नाम को मराठी भाषा में मुंबई के नाम से पुकारा जाना। परंतु मुंबई के सुप्रसिद्ध एवं सबसे व्यस्त रेलवे स्टेश बंबई वी टी अर्थात् विक्टोरिया टर्मिनल का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनल किए जाने का मकसद यह है कि मुंबईवासियों को अपने मराठा आदर्श पुरुष शिवाजी के नाम का स्टेशन चाहिए न कि अंग्रेज़ महारानी विक्टोरिया के नाम का। इसी गरज़ से बंबई वी टी का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनल या सीएसटी कर दिया गया।
परंतु औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर एपीजे कलाम रोड किया जाना, अकबर रोड,दिल्ली का नाम परिवर्तित कर महाराणा प्रताप रोड रखा जाना,उर्दू बाज़ार का नाम मिटाकर उसे हिंदी बाज़ार किया जाना,हुमायूंपुर का नाम हनुमान नगर कर देना, मीना बाज़ार को माया बाज़ार,अलीनगर को आर्य नगर के नाम से पुकारा जाना, निश्चित रूप से किसी खास व पूर्वाग्रही इरादों का संकेत देता है। उत्तर प्रदेश में तो बार-बार नाम बदलने का तमाशा भी प्रदेश की जनता देख चुकी है। जिस समय मायावती प्रदेश की मु यमंत्री बनी थीं उन्होंने अमेठी का नाम छत्रपति साहू जी नगर रख दिया था और उनके बाद जब मु यमंत्री की कुर्सी पर मुलायम सिंह यादव आए तो उन्होंने मायावती के आदेश को रद्द करते हुए पुनरू अमेठी बना दिया। इसके बाद जब मायावती पुनरू सत्ता में आई फिर इसी स्थान को छत्रपति साहू जी महाराज नगर किया गया और इसके बाद जब पुनः अखिलेश यादव मु यमंत्री बने तो इसे फिर से अमेठी का नाम दे दिया गया। और भी ऐसे कई ज़िले,शहर व $कस्बे थे जिनका नाम कभी मायावती ने बदले तो कभी मुलायम सिंह यादव ने उन्हें पुनरू पुराना नाम दे दिया और यह सिलसिला मायावती-अखिलेश यादव की सरकारों तक चलता रहा। गोया यूपी में नाम बदलने का यह सिलसिला तमाशा ही बनकर रह गया। नाम मिटाने और स्वेच्छा का नाम रखने की कवायद में इस समय उत्तर प्रदेश के मु यमंत्री योगी आदित्यनाथ सबसे आगे चल रहे हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी को भी हिंदू हृदय सम्राट कहा जाता है परंतु योगी आदित्यनाथ देश के इतिहास में पहली बार भगवाधारी एवं किसी बड़ी धार्मिक गद्दी के महंत होने के साथ-साथ मु यमंत्री के पद पर विराजमान हैं। यह अपनी पहचान नरेंद्र मोदी से भी अधिक खांटी हिंदुत्ववादी नेता की बनाना चाह रहे हैं। गोरखपुर में कई मोहल्लों,बाज़ारों आदि के नाम बदलकर उन्होंने पहले भी यह साबित करने की कोशिश की है कि वे उर्दू के शब्दों से या मुस्लिम,इस्लाम अथवा उर्दू-फारसी के आसपास के नज़र आने वाले किसी भी शब्द या नाम को अच्छा नहीं समझते भले ही उससे इतिहास की कितनी ही स्मृतियां क्यों न जुड़ी हों। यही वजह है कि सत्ता में आते ही उन्होंने मुगल सराय स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर दीनदयाल नगर कर दिया। ऐसा कर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि हमने मुगल शब्द का नाम मिटाकर एक महान हिंदू शासक होने का कर्तव्य अदा किया है। और दीनदयाल नगर नाम रखकर भारत को हिंदू राष्ट्र का दर्शन देने वाले तथा हिंदुत्ववाद की राजनीति करने वाले जनसंघ के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर इस शहर का नाम रखा है। अब आईए ज़रा यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि किसी स्टेशन का नाम बदलने की कीमत आज के दौर में हमें क्या चुकानी पड़ती है। इस कवायद के कारण सर्वप्रथम हमें पूरे विश्व की यात्रा संबंधी वेबसाईट्स अपडेटस करनी पड़ती हैं। प्रत्येक वेबसाईट में दी गई समयसारिणी में नाम परिवर्तित करना पड़ता है। रेलगाड़ियों के डिब्बों के नाम नए सिरे से बदले जाते हैं। स्टेशन कोड, रेलवे टिकट तथा टिकट का सा$ टवेयर आदि बदलना पड़ता है। पूरे विश्व को इस नाम परिवर्तन की सूचना देनी पड़ती है ताकि पूरा विश्व अपने सूचना तंत्र में नए नाम की प्रविष्टि कर सके। पूरे स्टेशन पर लगे बोर्ड,साईन बोर्ड आदि सब कुछ बदले जाते हैं। और एक अनुमान के मुताबिक इस पूरी कवायद पर लगभग 880 करोड़ रुपये का खर्च आता है। सूत्र तो यह भी बताते हैं कि नाम परिवर्तन के बाद सत्ता से जुड़े भक्तों को ही इस प्रक्रिया में खर्च होने वाले पैसों को लूटने के लिए उन्हें रोज़गार दिया जाता है। नाम परिवर्तन करने वाले महान नेता का अहंकार ऐसे समय में सिर चढ़कर बोलता है और शासक यह समझता है कि वह किसी खास धर्म-समुदाय या व्यक्ति को नीचा दिखाने तथा लोकतंत्र की शक्ति के बल पर अपनी मनमर्ज़ी थोपने में सफल रहा है। परंतु यह सवाल तो हर दौर में कायम रहेगा कि इस कवायद से और जनता के पैसों की इस बरबादी से आखिर आम जनता को क्या फायदा हासिल होता है? नाम परिवर्तन से मंहगाई,बेराज़गारी,स्वाथ्य व शिक्षा आदि के क्षेत्र में जनता को क्या फायदा पहुंचता है?

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