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अटल बिहारी वाजपेयी की जीवन यात्रा

डा.राधेश्याम द्विवेदी

भारतीय राजनीति के अजातशत्रु,प्रखर वक्ता , कवि हृदय राजनीतिज्ञ एवं भारत रत्न पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी की पूरी जीवन यात्रा के मूल्यांकन के लिए कुछ आधार बनाना ही होगा। वे भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष माने जाते है । राजनीति में इतना लंबा दौर गुजारने के बावजूद वैचारिक प्रतिबद्धता रखते हुए, घोर विरोधियों के प्रति भी बिल्कुल उदार आचरण एवं उसे जीवन भर कायम रखना तथा किसी से निजी कटुता न होना सामान्य बात नहीं है। वस्तुतः आजादी के दौर के राजनेताओं में राष्ट्रीय राजनीति में वे अंतिम व्यक्ति बन गए थे।

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जीवन यात्रा के प्रमुख पहलू:-  माननीय अटल विहारी वाजपेयी जन्म 25 दिसम्बर 1924, ग्वालियर में हुआ था। उनके पूर्वज आगरा के बटेसर नामक स्थल के मूल निवासी थे। इसलिए उत्तर प्रदेश से उनका विशेष लगाव था। उन्होने सर्वप्रथम 1952 के आम चुनावों में भारतीय जनसंघ नामक पाटी के प्रतिनिधि के रुप में भाग लिया। तब उनका चुनाव चिह्न दीपक हुआ करता था। उन्हें सफलता नहीं मिली। 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया. लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे.। 1962 के आम चुनाव में वह पुन बलरामपुर की सीट से भारतीय जनसंघ के टिकट पर खड़े हुए लेकिन उनकी इस बार पराजय हुई। चैथे आम चुनाव 1967 में सम्पन्न हुए। अटलजी पुन बलरामपुर की सीट से प्रत्याशी बने। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को लगभग 32 हजार वोटों से हराया। अपने इस कार्यकाल में अटल जी ने यह साबित कर दिया कि वह धर्मनिरपेक्षता के पूर्ण समर्थक हैं तथा धर्म और राजनीति का सम्मिश्रण नहीं चाहते। 1996 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। संसदीय दल के नेता के रूप में अटलजी प्रधानमंत्री बने। अटल बिहारी वाजपेयी भारत के दसवें प्रधानमंत्री थे। उन्होंने 16 मई, 1996 को प्रधानमंत्री के पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की। 31 मई, 1996 को इन्हें अन्तिम रूप से बहुमत सिद्ध करना था, लेकिन विपक्ष संगठित नहीं था। इस कारण अटल जी मात्र 13 दिनों तक ही प्रधानमंत्री रहे। उनके पास आवश्यक बहुमत नहीं था और उन्होने जोड़ तोड़ नहीं किया और एक आदर्श परम्परा शुरू करते हुए उन्होंने अपनी अल्पमत सरकार का त्यागपत्र राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा को सौंप दिया। अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय करियर की यह शुरुआत थी.  खासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे. 1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

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इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे. 1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए. सरकार गिराने के लिए विपक्ष ने राजनीति में प्रचलित वैध-अवैध सभी पैंतरे आजमाए, लेकिन कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। अत: अप्रैल, 1999 से अक्टूबर, 1999 तक अटल जी कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। तथा फिर 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। भाजपा और एन. डी. ए. को यह प्रबल विश्वास था कि जनता उन्हें पुन अवसर प्रदान करेगी। उन्होंने चमकदार भारत (शाइनिंग इंडिया) और भारत उदय (इंडिया राइजिंग) का चुनावी नारा दिया था। उन्हें मुगालता था कि एन. डी. ए. ने भारत की तस्वीर बदल दी है। एन. डी. ए. अपनी उपलब्धियाँ भी गिनाईं। एन. डी. ए. का कार्यकाल अक्टूबर 2004 में समाप्त होना था। लेकिन उसे लगा कि यदि चुनाव जल्दी करा लिए जाएँ तो इसका फायदा उन्हें अवश्य होगा। इस कारण चुनाव अप्रैल-मई में ही करा लिए गए। लेकिन एन. डी. ए. का पूर्वानुमान गलत साबित हुआ। 2004 में स्वयं तो वह जीत गये थे परन्तु जनता का विश्वास पार्टी पर से उठ गया था। उन्हें पुनः सेवा का अवसर नहीं प्राप्त हुआ। उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा था । दिसम्बर 2005 में उन्होने राजनीति सन्यास ले लिया था ।उसके बाद से अटलजी भाजपा के लिए कार्य करते रहे। वाजपेयी हिन्दी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता थे। वे राजनीति से संन्यास ले चुके थे और नई दिल्ली में 6-ए कृष्णामेनन मार्ग स्थित सरकारी आवास में रहते थे ।

मृत्यु :-  वाजपेयी को 2009 में एक दौरा पड़ा था, जिसके बाद वह बोलने में अक्षम हो गए थे। उन्हें 11 जून 2018 में किडनी में संक्रमण और कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) में भर्ती कराया गया था, जहाँ 16 अगस्त 2018 को शाम 05. 05 बजे उनकी मृत्यु हो गयी। उनके निधन पर जारी एम्स के औपचारिक बयान में कहा गया उन्हें अगले दिन 17 अगस्त को हिंदू रीति रिवाज के अनुसार उनकी दत्तक पुत्री नमिता कौल भट्टाचार्या मुखाग्नि दी।, उनका समाधि स्थल राजघाट के पास शान्ति वन में बने स्मृति स्थल में बनाया जाएगा। वाजपेयी के निधन पर भारत भर में सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गयी। अमेरिका, चीन, बांग्लादेश, व्रिटेन नेपाल और जापान समेत विश्व के कई राष्टों द्वारा उनके निधन पर शोक जताया गया । उत्तर प्रदेश सरकार आगरा कानपुर बलरामपुर तथा लखनउ में उनकी स्मृति में स्मारक बनाने की घोषणा की है।

प्रधानमंत्री के रूप में अटल का कार्यकाल

भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाना :-अटल सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊचाईयों को छुआ।

पाकिस्तान से संबंधों में सुधार की पहल :- 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। इस सेवा का उद्घाटन करते हुए प्रथम यात्री के रूप में वाजपेयी जी ने पाकिस्तान की यात्रा करके नवाज शरीफ से मुलाकात की और आपसी संबंधों में एक नयी शुरुआत की।

कारगिल युद्ध :- कुछ ही समय पश्चात् पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया। इस युद्ध में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण भारतीय सेना को जान माल का काफी नुकसान हुआ और पाकिस्तान के साथ शुरु किए गए संबंध सुधार एकबार फिर शून्य हो गए।

स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना :- भारत भर के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना (अंगरेजी में- गोल्डन क्वाड्रिलेट्रल प्रोजैक्ट या संक्षेप में जी क्यू प्रोजैक्ट) की शुरुआत की गई। इसके अंतर्गत दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नईव मुम्बई को राजमार्ग से जोड़ा गया। ऐसा माना जाता है कि अटल जी के शासनकाल में भारत में जितनी सड़कों का निर्माण हुआ इतना केवल शेरशाह सूरी के समय में ही हुआ था।

कवि के रुप में अटल :- अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी थे। मेरी इक्यावन कविताएँ अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह थे। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। इसमें शृंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी। विख्यात गजल गायक जगजीत सिंह ने अटल जी की चुनिंदा कविताओं को संगीतबद्ध करके एक एल्बम भी निकाला था।

अटल जी की प्रमुख रचनायें :- उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं .मृत्यु या हत्या ,अमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह) , कैदी कविराय की कुण्डलियाँ, संसद में तीन दशक , अमर आग है ,कुछ लेख कुछ भाषण , सेक्युलर वाद, राजनीति की रपटीली राहें, बिन्दु बिन्दु विचार, इत्यादि तथा मेरी इक्यावन कविताएँ

मूल्यांकन :-  एक पत्रकार, कवि और दूसरी पार्टियों के नेताओं के साथ संबंध और संवाद का ही प्रभाव था कि जब उनकी पार्टी के सामने 1998 में सरकार बनाने का अवसर आया तो उन्होंने एक साथ कई पार्टियों को साथ लेकर सरकार के लिए एजेंडा बनाकर अपने तीन प्रमुख मुद्दों को बाहर किया। यही वह काल था जब उन्हांने सरकार बनने के ढाई महीने के अंदर ही पोकरण में 11 और 13 मई 1998 को दो नाभिकीय परीक्षण कराया। पूरी दुनिया इससे भौचक्क रह गई। जाहिर है, उसकी तैयारी में वाजपेयी, रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस तथा वैज्ञानिक सलाहकार डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने मिलकर इतनी गोपनीयता बरती कि यह मिशन सफल हो सका।

वाजपेयी जी को मालूम था कि इसकी प्रतिक्रिया दुनिया भर में भारत के विरुद्ध होगी। अमेरिका से लेकर जापान, ऑस्ट्रेलिया सब ने भारत पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया। वाजपेयी अपने कदम को पीछे हटाने को तैयार नहीं हुए और विदेश मंत्री जसवंत सिंह के माध्यम से इतना सघन कूटनीतिक अभियान चलाया कि धीरे-धीरे अमेरिका भारत से सहमत हुआ और अन्य देशों के रवैये में बदलाव आया। बाद में यूपीए सरकार के समय अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश एवं हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ जो नाभिकीय सहयोग समझौता हुआ उसकी नींव अटल जी ने ही रखी थी।

वाजपेयी के काल का सबसे बड़ा प्रयास जम्मू कश्मीर को सामान्य स्थिति में लाना तथा पाकिस्तान से हर हाल में संबंध सुधारने की कोशिश के रुप में सामने आया। स्वयं बस लेकर लाहौर जाने का ऐतिहासिक कदम उठाया और मिनारे-ए-पाकिस्तान जाकर यह संदेश दिया कि देश के रुप में भारत पाकिस्तान को स्वीकार करता है। हालांकि वहां से वापसी के कुछ समय बाद ही करगिल युद्ध आरंभ हो गया। बिना सीमा पार किए पाकिस्तान को युद्ध में पूरी तरह परास्त करना तथा इस दौरान दुनिया भर का समर्थन जुटाने का कौशल हमारे सामने है।

आज अगर सभी दलों एवं विचारधारा के नेताओं, लोग अटल जी को लेकर द्रवित हैं तो इसमें उनके पूरे जीवन के आचरण का ही योगदान है। अटल जी जैसे राजनेता का व्यक्तित्व वास्तव में अतुलनीय है। इतनी बहुमुखी प्रतिभा और क्षमता तथा उन सबके होते हुए अहं से परे रहककर अपने कर्तव्यों के निर्वहन के प्रति इतना समर्पित रहना सामान्य बात नहीं है। ऐसे व्यक्ति को यह देश कभी भूल नहीं सकता। इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान से लिया जाएगा। आज के नेताओं के लिए वे विचार और आचरण में प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे।

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