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अमेरिकी रिटर्न युवा ने बदली 1103 सरकारी स्कूलों की तकदीर

अमेरिका जाकर पढ़ाई और डॉलर में कमाई, हर भारतीय युवा का सपना होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनका यह सपना पूरा जरूर होता है, लेकिन मातृभूमि के लिए कुछ करने का जज्बा उन्हें वापस बुला लेता है। महाराष्ट्र के हर्षल विभांडिक ऐसे ही युवा हैं, जो गए थे अमेरिका पढ़ाई के लिए, लेकिन देश के लिए कुछ करने की ललक उन्हें वापस खींच लाई। हर्षल ने अपने दम पर महाराष्ट्र के 1103 स्कूलों को डिजिटल इंडिया कैंपेन से कनेक्ट कर दिया।
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छोटे से कमरे में 12 लोग
उत्तरी महाराष्ट्र के आदिवासी जिला धूला में जन्मे हर्षल विभांडिक ने भी देश के बाकी युवाओं की तरह अमेरिका में पढ़ने और वहीं बसने का बड़ा सपना देखा था। 37 वर्षीय हर्षल बताते हैं कि बेहद गरीब परिवार में उनकी परवरिश हुई, जहां वे परिवार के 12 लोगों के साथ एक गांव में 10X10 के कमरे में रहते थे। गांव से 1998 में 12वीं करने के बाद उन्होंने मुंबई से कैमिकल में इंजीनियरिंग की, जिसके बाद उन्हें अहमदाबाद में अरविंद मिल्स में नौकरी मिल गई।

2010 में खुद की इनवेस्टमेंट कंपनी बनाई
वह कहते हैं कि चार साल नौकरी करने के बाद उनकी आगे पढ़ने की चाहत हुई। पढ़ाई में अच्छा था, तो सौभाग्यवश 2006 में अमेरिका में फाइनेंस में एमबीए करने का मौका मिल गया। 2 साल के कोर्स के बाद उन्हें इनवेस्टमेंट बैंकिंग की जॉब मिली। जब नौकरी से मन भर गया तो कुछ दोस्तों के साथ मिल कर 2010 में इंटरनेशनल कैपिटल पार्टनर्स के नाम से कंपनी शुरू की।

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कोई अमेरिका से वापस नहीं लौटना चाहता
हर्षल बताते हैं कि यूएस जाना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल वहां से वापस लौटने की सोचना है। लोग वहां से वापस आने नहीं चाहते। सिर्फ वीजा या नौकरी खोने की वजहों से ही लोग वहां से वापस आते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने वापस लौटने की शुरूआत कई चरणों में की। उस दौरान 3-4 बार 1 से 2 महीने के लिए भारत आए और लक्ष्य की तलाश शुरू की।
ससे वह मन लगाकर पढ़ते हैं।

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यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट से मिली प्रेरणा

महाराष्ट्र के 15 गांवों के दौरे के दौरान पाया कि गांवों में तीन चीज सुविधाजनक मिलती हैं, ग्राम पंचायत, सामूहिक स्वास्थ्य केन्द्र और सरकारी स्कूल। उन्होंने सरकारी स्कूलों पर काम करने की ठानी। 2014 में वे वापस अमेरिका चले गए। इस दौरान उन्हें यूनाइटेड नेशंस की एक रिपोर्ट पढ़ने को मिली, जिसमें भारत में बढ़ते स्कूल ड्रॉप आउट्स को लेकर चिंता जाहिर की गई थी। उसमें लिखा था कि भारत को विकसित देश बनने में 40-45 साल लगेंगे।

गरीब मां-बाप नहीं पढ़ाना चाहते बच्चों को
2015 में वे वापस भारत लौट आए और कई स्कूलों का दौरा किया। वह कहते हैं कि गरीब मां-बाप अपने बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते, क्योंकि उनके लिए पढ़ाई से ज्यादा कमाई जरूरी है। लोगों का मानना है कि ज्यादा पढ़-लिख कर नौकरी भी नहीं मिलती और छोटा काम करने में शर्म आती है। बस शिक्षा पर काम शुरू कर दिया। वापसी पर घरवाले बेहद खुश हुए, उनकी सलाह थी कि यहीं पर कोई नौकरी करूं।

प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया से हुए प्रभावित

वह बताते हैं कि दिनभर वे स्कूलों में घूमते और रात को धूले से ही कंपनी का काम निबटाते थे। प्रधानमंत्री मोदी के डिजिटल इंडिया से प्रभावित हो कर उन्होंने सरकारी स्कूलों में डिजिटल क्लास रूम बनाने की ठानी। इसके लिए 30 प्रतिशत राशि गांव वालों से और 70 फीसदी राशि खुद वहन करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने गांवों में प्रेरणा सभाएं शुरू कीं, जो सुबह साढ़े छह बजे या शाम को छह बजे होती थीं।

प्रेरणा सभाओं से जुटाए पैसे
शुरूआत में उन्होंने अपनी बचत राशि और अमेरिकी दोस्तों की मदद से प्रोजेक्टर खरीदना शुरू किया। दिसंबर 2015 में उन्होंने प्रेरणा सभाओं के जरिए 45 जिला परिषद स्कूलों को डिजिटाइज कर दिया। इसके बाद जनवरी 2016 में वह वापस अमेरिका लौट गए। लेकिन वहां स्कूलों को डिजिटाइज करने को लेकर व्हाट्सअप पर टीचर्स के फोन आने लगे। उसी दौरान ल्यूपिन फाउंडेशन ने उन्हें संपर्क किया और सभी स्कूलों को डिजिटाइज करने की शर्त रखी।

डिजिटाइज करने का खर्च 40 से 50 हजार
वह कहते हैं कि एक स्कूल को डिजिटाइज करने में एक हजार डालर का खर्चा आ जाता है। वहीं उन्होंने इस बजट को 40-50 हजार तक लाने की भी कोशिश की है। इसके लिए अलग से प्रोजेक्टर में एचडीएमआई पोर्ट के जरिए अलग से सॉफ्टवेयर वाला डोंगल लगाया जाता है, जिसे रिमोरट से कंट्रोल किया जाता है।

1103 स्कूल डिजिटाइज किए

हर्षल के मुताबिक मार्च 2016 में अमेरिका से वापस आ गए और अगले छह माह में 250 से ज्यादा प्रेरणा सभाएं की। फरवरी 2017 में उन्होंने 1103 स्कूल डिजिटाइज कर दिए। वह बताते हैं कि इनमें से 25 ऊर्दू स्कूल भी थे, लेकिन भाषा के चलते उन्हें डिजिटाइज करने में दिक्कत आ रही थी। जिसके बाद उन्होंने पुणे की कंपनी से संपर्क करके सॉफ्टवेयर डेवलप कराया और उन स्कूलों को डिजिटाइज किया। जिसके बाद राज्य के एजुकेशन सेक्रेटरी ने उन्हें मुंबई बुलाया और उन्होंने 24 जिलों में 36 प्रेरणा सभाएं की। मई 2017 में राज्य स्तर पर प्रेरणा सभा का आयोजन किया, जिसमें राज्यपाल समेत कई शिक्षाविदों ने हिस्सा लिया।

बच्चों ने इंग्लिश मीडियम स्कूल छोड़े
वह बताते हैं कि डिजिटाइज होने से सरकारी स्कूलों के हालात बदलने के बाद जुलाई 2017 में 769 बच्चों ने इंग्लिश मीडियम स्कूल छोड़ कर सरकारी स्कूलों में एडमिशन लिया, वहीं 2018 तक यह संख्या बढ़ कर तकरीबन 2000 तक पहुंच गई है।

बिजली के बिल बढ़ने से बढ़ी दिक्कतें

हर्षल कहते हैं कि राह इतनी आसान नहीं थी, नई चुनौतियां सामने आ रही थीं। जिन स्कूलों को डिजिटाइज किया उनके बिजली के बिल बढ़ कर आने लगे। वह बताते हैं कि सरकारी स्कूलों को कॉमर्शियल रेट पर बिजली दी जाती है और सरकार बिल के पैसे भी नहीं देती। पहले जहां बिल मात्र 50-60 रुपए महीना होते थे, वे बढ़ कर 600-700 तक पहुंच गए। वह बताते हैं कि शुरू में तो दोस्तों के साथ मिल कर जेब से भरे। लेकिन ज्यादा दिन तक ऐसा नहीं चल पाया।

प्रकाश जावड़ेकर भी हुए शामिल
वह बताते हैं कि जुलाई 2017 में वे न्यूजर्सी में थे और इस चुनौती से निबटना था। उन्होंने पहली बार अमेरिका में प्रेरणा सभा आयोजित की और जिसमें केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुए। जावड़ेकर के भाषण से प्रेरित हो कर कई लोगों ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए।

बांट रहे सोलर किट
स्कूलों का बिजली का बिल कम करने के लिए उन्होंने 500 वॉट का सोलर पैनल किट देने का प्लान बनाया। हर्षल अब तक 80 स्कूलों को सोलर पैनल किट मुहैया करा चुके हैं। वहीं 100 और स्कूलों के लिए उन्हें सांसद फंड से भी अनुदान मिला है। वह बताते हैं कि गांवों में स्कूलों के डिजिटाइज होने से बच्चों की संख्या बढ़ी है, यहां तक कि स्कूल शुरू होने से एक घंटे पहले ही बच्चे पहुंच जाते हैं। पहले जहां बच्चों की हाजिरी 10 फीसदी होती थी, वह अब बढ़ कर 90 फीसदी पहुंच गई है। बच्चों के लिए थ्रीडी में पढ़ाई करना नई चीज

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