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धवन के निधन के साथ इस युग के एक अध्याय का पटाक्षेप

आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कोटरी की खासी चर्चा थी। सियासी गलियारों से लेकर आम जनता तक यह बात आम थी कि इंदिरा गांधी के फैसलों के पीछे उनकी कोटरी होती थी। इस कोटरी में संजय गांधी के बाद अगर कोई दूसरा सबसे ताकतवर नाम लिया जाता था तो वह नाम था आर.के.धवन।
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इंदिरा गांधी के दौर को याद करने वाले कांग्रेसी नेता कहते हैं कि अगर धवन की समझ में बात आ गई तो समझो इंदिरा जी भी समझ गईं और अगर धवन नाराज हो गए तो इंदिरा जी तक पहुंचना और उन्हें संतुष्ट कर पाना नामुमकिन था।

इसीलिए 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार ने आपातकाल की ज्यादतियों को लेकर इंदिरा और उनकी कोटरी पर शिकंजा कसा तो इंदिरा गांधी और संजय गांधी के बाद सबसे ज्यादा मुसीबत में धवन ही आए थे। यहां तक कि जो शख्स एक दौर में सरकार का प्रमुख सत्ता केंद्र था, उसे पुलिस की नजरों से बचने के लिए दिल्ली से बाहर भी जाना पड़ा था।

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राजीव गांधी के कार्यकाल से लेकर सोनिया युग और अब राहुल के जमाने के भी कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने अपने राजनीतिक बचपन में धवन की उंगली पकड़कर सियासत की ऊंची इमारत की सीढियां चढ़ी हैं।

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आर.के.धवन जिनका पूरा नाम राजेन्द्र कुमार धवन था, 1962 से लकर 1984 तक इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे। 31 अक्टूबर 1984 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री निवास 1 सफदरजंग रोड पर इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने गोली मारी उस समय उनके ठीक पीछे छाता लेकर आर.के.धवन ही चल रहे थे, जो उस हमले में इसलिए बाल बाल बच गए थे कि हत्यारों के निशाने पर सिर्फ इंदिरा गांधी ही थीं।

हालांकि कुछ लोगों ने इसके पीछे भी एक साजिश का इशारा किया था और इंदिरा की हत्या की जांच करने वाले ठक्कर आयोग तक में इस मुद्दे पर खासी माथा पच्ची हुई लेकिन बाद में धवन को इस मामले में क्लीन चिट मिल गई। इंदिरा गांधी के साथ आने से पहले धवन एक मामूली सी नौकरी करते थे, और उनके एक रिश्तेदार उन्हें इंदिरा गांधी के पास लेकर आए थे।

आपातकाल में धवन की तूती बोलती ही थी

बताया जाता है कि जगह न होते हुए भी इंदिरा ने धवन को कुछ दिनों के लिए अपने सहायक के तौर पर रख लिया। एक दिन इंदिरा जी अपना चश्मा खोज रही थीं, तभी धवन ने अपनी दराज से उन्हें एक नया चश्मा दे दिया। पूछने पर धवन ने कहा कि उन्होंने इंदिरा जी के नंबर वाले दो तीन नए चश्में बनवाकर अपने पास रख लिए थे, जिससे कि कभी भी अगर उनका चश्मा खो जाए तो उन्हें दिक्कत न हो।

धवन की यह समझदारी इंदिरा गांधी को इतनी भा गई कि उन्होंने उन्हें न सिर्फ अपना स्थाई सहायक बनाया बल्कि धीरे-धीरे उन पर इतना विश्वास किया कि एक दौर में धवन उनकी आंख नाक कान सब माने जाने लगे थे।

आपातकाल में तो धवन की तूती बोलती ही थी, लेकिन जब 1977 में कांग्रेस बुरी तरह हार गई और इंदिरा व संजय के बुरे दिन आए तो कांग्रेस के तमाम वो दिग्गज जिन्होंने आपातकाल में जमकर सत्ता सुख लूटा था और इंदिरा गांधी को ही देश का पर्याय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, इंदिरा और संजय का साथ छोड़ गए।

पार्टी का विभाजन करा दिया गया। लेकिन धवन पूरी वफादारी के साथ इंदिरा गांधी के साथ डटे रहे। उनके ऊपर आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए बने शाह आयोग में इंदिरा गांधी के खिलाफ सरकारी गवाह बनने का जबर्दस्त दबाव पड़ा, लेकिन धवन न झुके न टूटे। इसीलिए जब इंदिरा की 1980 में सत्ता वापसी हुई तो धवन फिर से उसी तरह ताकतवर हो गए।

इंदिरा की हत्या के बाद राजीव ने भी धवन को रखा अपने साथ

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने भी धवन को अपने साथ रखा, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय की उन्हें पार्टी की जिम्मेदारी दी गई। 1990 में वह राज्यसभा में भेजे गए और नरसिंह राव की सरकार में बाद मे उन्हें राज्यमंत्री भी बनाया गया।

धवन लंबे समय तक कांग्रेस की शीर्ष संस्था कांग्रेस कार्यसमिति में भी रहे। लेकिन 2004 में यूपीए सरकार बनने के बाद सोनिया गांधी ने उन्हें सम्मान तो दिया लेकिन ताकत नहीं दी। धीरे-धीरे धवन और माखनलाल फोतेदार जैसे परिवार के वफादार नेता नेपथ्य में चले गए। हालांकि यदा कदा सोनिया गांधी परिवार के इन वफादारों को बुलाकर उनसे बातचीत कर लेती थीं।

अपनी अनदेखी से क्षुब्ध आर.के.धवन ने मुझे एक साप्तहिक पत्रिका के लिए दिए गए साक्षात्कार कहा था कि सोनिया गांधी को अपने इर्द गिर्द साए की तरह रहने वाले कुछ कांग्रेसी नेताओं से होशियार रहना चाहिए क्योंकि इनमें से कुछ एसे हैं जिन्होंने बुरे वक्त में इंदिरा गांधी को भी धोखा दिया था।

धवन के इस बयान से कांग्रेस के भीतर खासा हडकंप मचा था। आम तौर पर मीडीया से दूर रहने वाले आर.के.धवन सियासी मामलों पर कम ही बोलते थे। वह दोस्ती निभाने के लिए मशहूर थे।

कांग्रेस के भीतर और बाहर अनेक लोग मिल जाएंगे जो बताते हैं कि कैसे धवन साहब ने उनकी मदद की। अपनी जिंदगी का करीब तीन चौथाई हिस्सा अकेले गुजारने वाले धवन ने 74 साल की उम्र में अपनी मित्र अचला से शादी की।

दिल्ली के सबसे शानदार और मंहगे इलाके गोल्फलिंक में रहने वाले आर.के.धवन अपने साथ सत्ता की राजनीति की कई राज सीने में दफन करके इस दुनिया से विदा हो गए। इसके साथ ही कांग्रेस और भारतीय राजनीति के इंदिरा युग के एक पूरे अध्याय का पटाक्षेप हो गया।

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