Saturday , November 17 2018
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गड़करी जी का सत्य वचन, नौकरी है कहाॅ

प्रेम शर्मा
निश्चित तौर पर यह बाॅत सौ फीसदी सत्य है कि अब नौकरी जनसंख्या के अनुपात में ऊट के मुंह में जीरा की तरह है। इसी लिए नौकरी की मारामारी मची है। यह स्थिति मोदी सरकार के कार्यकाल की देन नही बल्कि पिछले तीस सालों से नौकरी की मारामारी मची हुई है। सरकारी नौकरी का लोभ बेरोजगारों से इसलिए नही छूट रहा है कि निजी क्षेत्रों में मानसिक शरीरिक शोषण के बाद भी नौकरी किस सैकण्ड छीन जाएगी इसका कोई भरोसा नही। निजी क्षेत्रों की नौकरियों में श्रम कानूनों की धज्जियाॅ उड़ाई जाना तो आम बाॅत है। दूसरे लम्बे अरसे से देश में पीपीपी माडल और निजीकरण को बढ़ावा देने के चलते सरकारी नौकरियाॅ लगातार घट रही है। सरकारी सेवा का वह तबका जिसमें सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी के असार रहते है उसे लगभग समाप्त किया जा रहा है। चतुर्थ श्रेणी की भर्ती लम्बे अरसे से बंद है। इस संवर्ग में केन्द्र और प्रदेशों में मात्र दस से बीस फीसदी सरकारी नौकर बचे है बाकी का काम ठेके पर चल रहा है। कई बड़े पदों पर ठेका प्रणाली अपनाई जा रही है। सरकारी नौकरी में बाबू और अन्य तृतीय श्रेणी के पदों में भर्ती के लिए आने वाली भीड़ को देखकर उठने वाले यक्ष प्रश्न के सामने एक यक्ष प्रश्न पुनः यूपी पीएससी ने खड़ा कर दिया है। प्रश्न यह उठा है कि लोक सेवा आयोग के समक्ष पीसीएस और सहायक वन संरक्षक और क्षेत्रीय वन अधिकारी पद के लिए इतने आवेदन आ गए कि उसे परीक्षा कराने के लिए सेन्टर कम पड़ गए परिणाम यह कि पहले घोषित परीक्षा तिथि को रद्द करना पड़ा है। सरकारी नौकरी की इतनी मारामारी हो चुकी है कि उत्तर प्रदेश में सचिवालय में चतुर्थ श्रेणी के पद के लिए इंजीनियर और डाक्टरेट की डिग्री धारी तक आवदेन कर चुके है। कुल मिलाकर लब्बो लुआब यह कि अब सरकार नौकरी एक अनार सौ बीमार की जगह एक अनार एक लाख बीमार की ओर अग्रसर है। अब ऐसे मे आरक्षण, पदोन्नति में आरक्षण को लेकर चल रही रार और टकरार के बीच मोदी सरकार के बड़े और बुद्धिमान मंत्री नितिन गड़करी जी का यह कहना कि नौकरी है कहाॅ, निश्चित तौर पर इस सरकार के किसी मंत्री का सौ फीसदी कड़वा सच है। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने आरक्षण और रोजगार को लेकर बड़ा बयान देते हुए कह चुके है कि आरक्षण रोजगार देने की गारंटी नहीं है क्योंकि नौकरियां कम हो रही हैं। गडकरी ने कहा कि एक ‘सोच’ है जो चाहती है कि नीति निर्माता हर समुदाय के गरीबों पर विचार करें. गडकरी महाराष्ट्र में आरक्षण के लिए मराठों के वर्तमान आंदोलन तथा अन्य समुदायों द्वारा इस तरह की मांग से जुड़े सवालों का जवाब दे रहे थे। वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, ‘मान लीजिए कि आरक्षण दे दिया जाता है, लेकिन नौकरियां नहीं हैं। क्योंकि बैंक में आईटी के कारण नौकरियां कम हुई हैं. सरकारी भर्ती रूकी हुई है. नौकरियां कहां हैं?’उनका मानना है कि ‘‘एक सोच कहती है कि गरीब, गरीब होता है, उसकी कोई जाति, पंथ या भाषा नहीं होती। उसका कोई भी धर्म हो, मुस्लिम, हिन्दू या मराठा (जाति), सभी समुदायों में एक धड़ा है जिसके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं है, खाने के लिए भोजन नहीं है। गड़करी जी का यह बयान भले ही कड़वा हो सच्चाई और वास्तविकता यही है। क्योकि कुछ दिनों पूर्व ही गड़करी जी एक और दावा कर चुके है पिछले चार सालों में उन्होंने अपने अधिनस्थ विभागों में एक करोड़ नौकरियाॅ दी। केन्द्र के मुखिया और बड़े मंत्री तथा भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री बार बार अगर यह कहते है कि इतने रोजगार देगें तो यह बाॅत भी गलत नही है। क्योकि सरकार संसद में यह स्वीकार कर चुकी है कि देश में 24 लाख पद रिक्त पड़े है। जहा से न्याय मिलता है वहाॅ पर ही 58 हजार पद रिक्त है। स्वास्थ्य सुविधा की बेहतरी का दावा करने वाली सरकार स्वंय स्वीकार कर चुकी है कि स्वास्थ्य विभाग के अधीनस्थ 1.6 लाख पद रिक्त है। इनमें 16 हजार स्पेशलिस्ट भी शामिल है। जनता की सुरक्षा और कानून व्यवस्था के रखवालों की स्थिति खराब है। देश में पुलिस के 5.6 लाख पद रिक्त है। सिविल एवं डिस्ट्रक पुलिस के 4.4 लाख पद रिक्त है। डिफेन्स सर्विस पैरा मिलिटरी के 1.2 लाख पद रिक्त है। शिक्षा के क्षेत्र में भी यही स्थिति विद्यमान है। ऐसे में दावा तो सरकारें कर ही सकती है। फिर भी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यह बात तो पते की कही कि आरक्षण नौकरी की गारंटी नहीं है, लेकिन यह बयान मोदी सरकार के समक्ष मुसीबत खड़ी कर सकती है, क्योंकि उन्होंने यह भी कहा कि नौकरियां घटती जा रही हैं। उनकी ओर से यह साफ किया गया कि एक तो सूचना-तकनीक के कारण नौकरियां कम हो रही हैं और दूसरी ओर सरकारी भर्तियां बंद हैं। इसका तो यही मतलब हुआ कि सरकार अपनी जिम्मेदारियां कम करके निजीकरण की ओर बढ़ रही है। इसमें खतरे और शोषणा बहुत है। पूरी दुनिया में यही हो रहा है, क्योंकि निजी क्षेत्र के मुकाबले सरकारी क्षेत्र अकुशल साबित होने के साथ ही लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। शायद इसी कारण केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों में लाखों पद रिक्त हैं, लेकिन आखिर इन लाखों रिक्त पदों के रहते यह दावा कैसे किया जा सकता है कि पर्याप्त संख्या में रोजगार उपलब्ध कराए जा रहे हैं। यह समय की मांग और जरूरत है कि केंद्रीय सत्ता अपनी रोजगार नीति को लेकर कोई संशय न रखे और इसे बार-बार दोहराने में संकोच न करे कि आज के युग में कोई भी सरकार अपने बलबूते सबको नौकरियां नहीं उपलब्ध करा सकती। इससे सभी को अवगत भी होना चाहिए कि रोजगार का मतलब केवल नौकरियां और वह भी सरकारी नौकरियां नहीं होता और न हो सकता है। जब सरकारी नौकरियों में कमी एक सच्चाई है तब सरकार को यह देखना होगा कि निजी क्षेत्र रोजगार देने के मामले में समावेशी दृष्टि से लैस नजर आए। यह भी आज का यथार्थ है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण आवश्यक होता जा रहा है। यह अच्छा है कि नितिन गडकरी आर्थिक आधार पर आरक्षण को वक्त की जरूरत बता रहे हैं, लेकिन आखिर कब तक केवल सुझाव और सलाह देने तक सीमित रहा जाएगा? आखिर इस दिशा में सरकार की ओर से कोई ठोस पहल क्यों नहीं होती? यह ठीक है कि संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं, लेकिन क्या यह व्यवस्था पत्थर की लकीर है? क्या जातिगत के साथ आर्थिक आधार पर भी आरक्षण की गुंजाइश नहीं बनाई जा सकती? भाजपा समेत अन्य राजनीतिक दल नीर-क्षीर ढंग से विचार करें तो एक प्रभावी और कहीं अधिक सार्थक आरक्षण की व्यवस्था का निर्माण संभव है। समस्या यह है कि राजनीतिक दलों ने आरक्षण को वोट बैंक की राजनीति का औजार बना लिया है।सरकार आरक्षण को लेकर न्यायालय के आदेश को पूरी तरीके से समझ नही पा रही है या फिर वह समझना नही चाहती। इसका परिणाम यह हो रहा है कि देश में दो संवर्गो के बीच घातक मनमुटाव बढ़ता जा रहा है। सरकारें न तो आरक्षण की समीक्षा कर यह देखने को तैयार हैं कि उससे अब तक क्या हासिल हुआ और न ही जमीनी हकीकत देखने के लिए। वे बिना किसी ठोस आधार गैर-बराबरी, गरीबी आदि का जिक्र इस तरह करते रहते हैं मानों सामाजिक विषमता और निर्धनता के मामले में देश वहीं खड़ा है जहां 1960-70 के दशक में था। खराब बात यह है कि ऐसा भी माहौल बनाया जाता है कि आरक्षण सभी समस्यायों का समाधान है। दरअसल इसी कारण आरक्षण की अनुचित मांगें सामने आती हैं। सरकार को ऐसी स्थिति से निपटने के लिए बहुत संयम के साथ आरक्षण को आर्थिक आधार पर करने तथा सरकारी सेवा के रिक्त पदों को भरने के लिए निश्चित फार्मूला अख्तियार करना होगा।

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