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कभी न झुकने वाला क्रांतिकारी के रूप में उभरे सुरेंद्रनाथ बनर्जी, जाने क्या कैसा था इनका जीवन

बनर्जी का जन्म 10 नवंबर 1848 को कलकत्ता में हुआ था, स्नातक करने के बाद वे भारतीयसिविल सर्विसेज (आईसीएस) की इम्तिहान में भाग लेने के लिए लंदन गए, उन्होंने इम्तिहान पास भी कर ली लेकिन उनकी असली आयु को लेकर टकराव उत्पन्न हो गया, बाद में एक अदालती निर्णय में उनके पक्ष को सही ठहराया गया बनर्जी ने बाद में फिर यह इम्तिहान उत्तीर्ण की  वे सिलहट में सहायक मजिस्ट्रेट बनाए गए ब्रिटिश शासन ने बाद में उन पर नस्ली भेदभाव का आरोप लगाकर उन्हें सरकारी जॉब से हटा दिया, गवर्नमेंट के इस निर्णय का उन्होंने इंग्लैंड जाकर विरोध किया लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला

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बाद में वे राष्ट्र में लौटकर अंग्रेजी के प्राध्यापक बन गए, उन्होंने द बंगाली नामक खबर प्रारम्भ किया  1876 में अपनी तरह का पहला राजनीतिक संगठन भारतीय नेशनल एसोसिएशन खोला, इसी के साथ उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले नस्लभेद के विरूद्ध राष्ट्र में घूम-घूमकर सार्वजनिक सम्बोधन देने प्रारम्भ कर दिए ब्रिटिश गवर्नमेंट  अदालतों के विरूद्ध सम्बोधन देने के कारण उनकी गिरफ्तारी की गई जिसका देशभर में विरोध हुआ, कांग्रेस पार्टी की स्थापना होने के बाद बनर्जी ने अपने संगठन का उसमें विलय कर दिया, उन्होंने 1905 के बंगाल विभाजन का जमकर विरोध किया

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अपने राजनीतिक ज़िंदगी के अंतिम दौर में 1909 के मोंटे मोलरे सुधारों को स्वीकार करने जैसे कुछ निर्णयों के कारण उनकी लोकप्रियता कुछ कम हुई, वे 1922 में बंगाल विधानसभा का चुनाव भी पराजय गए, बनर्जी को ब्रिटिश राजनीतिज्ञ प्राय ‘सरेंडर नाट बनर्जी-अपने पक्ष से नहीं झुकने वाला व्यक्ति’ कहकर पुकारते थे, उनकी लिखी पुस्तक ‘ए नेशन इन मेकिंग’ बहुत ज्यादा चर्चित रही थी, इस महान देशभक्त का निधन 6 अगस्त 1925 में हुआ

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