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माताओं के लिए वरदान है स्तनपान

स्तनपान 21वीं सदी में अपने निचले स्तर पर पहुंच गया है डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, ज्यादातर राष्ट्रों में प्रथम छह महीने में सिर्फ स्तनपान कराने की दर 50 फीसदी से भी नीचे है इस स्थिति की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अब हम जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष एक अगस्त से आठ अगस्त तक स्तनपान हफ्ते मनाते हैं आईवीएच सीनियर केयर में वरिष्ठ न्यूट्रिशन एडवाइजर चिकित्सक मंजरी चंद्रा ने कहा, ‘गर्भधारण से प्रारम्भ होकर दूसरे जन्मदिन तक ज़िंदगी के प्रथम हजार दिनों में पोषण की आपूर्ति से दीर्घकालीन सेहत की नीव पड़ती है स्तनपान इस प्रारंभिक पोषण का एक आवश्यक भाग है, क्योंकि मां का दूध पोषक तत्वों बायोएक्टिव निर्माण कारकों का एक बहुआयामी मिलावट है, जो ज़िंदगी के शुरुआती छह महीनों में एक नवजात शिशु के लिए आवश्यक है ‘

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उन्होंने बोला कि मां का दूध मैक्रोन्यूट्रिएंट्स, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स, बायोएक्टिव घटकों, वृद्धि के कारकों  रोग प्रतिरोधक घटकों का एक मिलावट होता है यह मिलावट एक जैविक द्रव पदार्थ है, जिससे आदर्श शारीरिक  मानसिक वृद्धि में मदद मिलती है  बाद के समय में शिशु को मेटाबॉलिज्म से जुड़ी बीमारी की संभावना समाप्त हो जाती है

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चंद्रा के अनुसार, जिन बच्चों को केवल मां का दूध नहीं दिया जाता है, उन्हें संक्रमण का खतरा होता है  उनका आईक्यू भी कम रह सकता है उनकी सीखने की क्षमता कम होती है  स्कूल में उन बच्चों के मुकाबले उनका प्रदर्शन निर्बल रहता है, जिन्हें पहले छह महीने सिर्फ मां का दूध मिला है

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डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक, हर वर्ष दो करोड़ से अधिक शिशुओं का वजन जन्म के समय 2.5 किलोग्राम से कम रहता है  दुर्भाग्य से इनमें से 96 फीसदी विकासशील राष्ट्रों में हैं बचपन में इन शिशुओं में सामान्य विकास में कमी, संक्रामक बीमारी, धीमी वृद्धि  मृत्यु होने का जोखिम अधिक होता है ऐसे पर्याप्त प्रमाण मिले हैं जिनसे इन शिशुओं में ज़िंदगी के प्रथम 24 घंटों में स्तनपान का महत्व उजागर होता है जिन शिशुओं को जन्म के 24 घंटे के भीतर स्तनपान कराया जाता है, उनमें उन बच्चों के मुकाबले मृत्यु दर कम देखने को मिली है, जिन्हें 24 घंटे बाद स्तनपान कराया जाता है

वरिष्ठ शिशु डॉक्टर  ब्रेस्टफीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया (बीपीएनआई) के संयोजक चिकित्सक अरुण गुप्ता के मुताबिक, ‘स्तनपान बच्चे के स्वास्थ्य, उसके जीवित रहने  विकास के लिए आवश्यक है इसके बावजूद हिंदुस्तान में हर पांच में से तीन महिलाएं जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान प्रारम्भ करने में समर्थ नहीं हैं केवल एक-दो महिलाएं ही प्रथम छह महीने तक अपने बच्चे को केवल अपना दूध पिलाती हैं इसकी वजह यह है कि स्त्रियों को घर, दफ्तर अस्पतालों में स्तनपान के लिए विभिन्न अड़चनों का निरंतर सामना करना पड़ता है ‘

डॉ चंद्रा ने कहा, ‘स्तनपान कराने वाली माताओं को रोजाना उन विटामिन सप्लीमेंट्स को लेना जारी रखने की सलाह दी जाती है, जो उन्होंने प्रसव पूर्व लिया था विटामिन मां के दूध में स्रवित होते हैं मां के बॉडी में पोषक तत्वों की कमी से सीधे तौर पर उनका दूध प्रभावित होता है शाकाहारी माताओं को विटामिन डी, बी12  कैल्शियम की भी जरूरत होती है ‘

उन्होंने कहा, ‘स्तनपान कराना माताओं के लिए भी समान रूप से जरूरी है  इससे कई अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन फायदा हैं माताओं को तत्काल होने वाले लाभों में प्रसव के उपरांत वजन में कमी मां एवं शिशु के बीच गहरा रिश्ता शामिल है गर्भावस्था के समय गर्भाशय में नए ज़िंदगी को योगदान के लिए कई शारीरिक परिवर्तन होते हैं गर्भावस्था के दौरान बॉडी हाइपरलिपिडेमिक इंसुलिन रोधक चरण से गुजरता है, जिससे बाद के ज़िंदगी में ह्रदय रोग  टाइप-2 मधुमेह की संभावना बढ़ती है स्तनपान से लंबे समय में मेटाबॉलिक  ह्रदय की बीमारियों का जोखिम घटते देखा गया है  यह टाइप-2 मधुमेह के जोखिम में 4-12 फीसदी की कमी लाने से जुड़ा है ‘

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