Sunday , November 18 2018
Loading...

हां! यह अघोषित इमरजेंसी है

राजेंद्र शर्मा
हिंदी के एक प्रमुख खबरिया चैनल, एबीपी न्यूज में जो कुछ हुआ है, उसे तख्तापलट कहा जा सकता है या नहीं इस पर तो बहस हो सकती है। लेकिन, इतना तय है कि जो हुआ है और जिस तरह से हुआ है, न सिर्फ असाधारण है बल्कि डराने वाला भी है। बेशक, प्रकटतरू सिर्फ इतना हुआ है कि पहले अचानक यह खबर आयी कि चैनल के वरिष्ठड्ढ संपादक मिलिंद खांडेकर ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद, यह खबर आयी कि चैनल के चर्चित प्राइम टाइम शो, श्श्मास्टर स्ट्रोकष् के प्रस्तोता पुण्य प्रसून वाजपेयी ने चैनल छोड़ दिया है। इसके साथ ही नौ बजे के अपने निर्धारित समय पर चैनल से वाजपेयी का शो गायब हो गया।इसी बीच यह खबर आयी कि चैनल के एक और वरिष्ठड्ढ प्रस्तोता, अभिसार शर्मा को दो हफ्ते के लिए कोई भी कार्यक्रम प्रस्तुत करने से मना कर के घर बैठाल दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि उसी शाम से खासतौर पर श्श्मास्टर स्ट्रोकष्के समय पर प्रसारण में कई दिनों से नियमित रूप से हो रही तकनीकी गड़बड़ी का भी अंत हो गया।
बेशक, संबंधित चैनल ने इस संबंध में कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण करण देना जरूरी नहीं समझा है। लेकिन, किसी से छुपा हुआ नहीं है कि वास्तव में क्या हुआ है? अभिसार शर्मा की प्रस्तुतियां और पुण्य प्रसून वाजपेयी का मास्टर स्ट्रोक, न सिर्फ इस खबरिया चैनल के मौजूदा सत्ताधारियों से बेबाक सवाल करने वाले मुख्य कार्यक्रम थे बल्कि हिंदी के खबरिया चैनलों में आम तौर पर भी, सत्ता से सवाल करने वाले प्रमुख कार्यक्रम थे। बेशक, ऐसे सवाल करने वाली आवाजें किसी भी सत्ताधारी को पसंद नहीं आती हैं। पर जनतंत्र में सत्ता में बैठे लोगों को ऐसे आलोचनात्मक स्वरों को चाहे-अनचाहे बर्दाश्त करना पड़ता है। लेकिन, आज जो लोग केंद्र में सत्ता में बैठे हुए हैं, उन्हें अपनी आलोचना उसी तरह बर्दाश्त नहीं है, जैसे इमर्जेंसी में इंदिरा गांधी को बर्दाश्त नहीं थी। और उन्होंने इमर्जेंसी वाला ही काम किया और इन आवाजों को ही बंद करा दिया। पहले मास्टर स्ट्रोकष्के प्रसारण में तकनीकी बाधाएं पैदा करने के जरिए और अंततः कार्यक्रम ही बंद कराने के जरिए। हां! इसके लिए उन्हें इमर्जेंसी जैसी प्रकट सेंसरशिप का सहारा लेने की भी जरूरत नहीं पड़ी। चैनल मालिकान को धमकाना ही काफी साबित हुआ। कानों-सुनी के अनुसार इस श्पवित्रश् काम में खुद देश के वित्त मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष का हाथ लगा है। लेकिन, यह मामला और ऊपर तक यानी सत्ता के एकदम शीर्ष तक जाता है। व्यापक रूप से ऐसा माना जा रहा है कि श्श्मास्टर स्ट्रोकष् की जिस स्टोरी ने सत्ताधारी दल को अपना अंतिम हथियार चलाने के लिए तत्पर कर दिया, वह सीधे प्रधानमंत्री के दावों की सत्यता पर सवाल उठाती थी। मोदी सरकार के ग्रामीण क्षेत्र में लोगों की आय बढ़ाने के कार्यक्रमों के लाभार्थियों के साथ, प्रधानमंत्री मोदी की इंटरनैट के जरिए बहुप्रचारित-प्रसारित, प्रायोजित मुलाकात में, छत्तीसगढ़ में कांकेर की ग्रामीण महिला चंद्रमणी ने, अपनी आमदनी दोगुनी होने की बात कही थी। खुद प्रधानमंत्री की ओर से अपने ग्रामीण कार्यक्रमों की सफलता के साक्ष्य के रूप में, इसका खूब प्रचार भी किया गया था। लेकिन, एबीपी न्यूज की फौलो अप स्टोरी ने इस दावे की पोल खोल दी और यह दिखा दिया कि कृषि से आय दोगुनी होने का दावा पूरी तरह से हवाई था और वास्तव में चंद्रमणी को ऐसा दावा करने के लिए दिल्ली आए अधिकारियों द्वारा सिखाया-पढ़ाया गया था। सीधे प्रधानमंत्री मोदी के दावे को चुनौती देने की जुर्रत कोई पत्रकार करे, यह मौजूदा निजाम कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वास्तव में अभिसार शर्मा का भी अपराध कुछ ऐसा ही था। अपने एक प्रसारण में उन्होंने उत्तर प्रदेश में योगी राज में उत्तर प्रदेश में कानून व व्यवस्था में सुधार के प्रधानमंत्री के दावे पर, इस दावे के अगले ही रोज सुल्तानपुर में तथा अन्य जगह पर हुई सरे-आम हत्या की दो दुस्साहसपूर्ण घटनाओं के संदर्भ में, सवाल उठाया था। मुख्यधारा के मीडिया में प्रधानमंत्री मोदी की किसी भी आलोचना को ही नहीं, नरेंद्र मोदी को पसंद न आने वाली किसी भी आवाज को दबाने के लिए मौजूदा शासन किस तरह अपने सारे हथियार लेकर टूट पड़ता है, इसका खुलासा जाने-माने टीवी पत्रकार तथा संभवतरू भारत के सबसे गंभीर तथा बेबाक साक्षात्कारकर्ता, करण थापर ने अपनी नयी किताब, श्डेविल्स एडवोकेट-एन अनटोल्ड स्टोरीश् में किया है। 2007 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी, 2002 के गुजरात के नरसंहार पर सवालों से नाराज होकर, तीन मिनट में ही थापर के साक्षात्कार से उठकर चले गए थे। उसके सात साल बाद, प्रधानमंत्री बनने पर नरेंद्र मोदी के इशारे पर न सिर्फ भाजपा के नेताओं व प्रवक्ताओं ने थापर का बहिष्कार कर दिया बल्कि इस अघोषित किंतु अचूक बहिष्कार को खत्म कराने की कोशिश में जब थापर ने सत्ताधारी पार्टी में शीर्ष स्तर तक संपर्क किया, उन्हें स्पष्टड्ढ इशारों में बता दिया गया कि यह बहिष्कार खुद प्रधानमंत्री के संकेत पर हो रहा था, जो उस अप्रिय लगे साक्षात्कार के लिए थापर को माफ करने को तैयार नहीं थे। अचरज नहीं कि खबरों अनुसार, संसद भवन में खुद भाजपा अध्यक्ष ने चंद्रमणी प्रकरण के बाद, एबीपी न्यूज को सबक सिखाने की बात कही थी। उसके चंद दिनों में ही भारी उलट-फेर हो चुका था। वास्तव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मौजूदा भाजपा निजाम शुरू से ही समूचे मुख्यधारा के मीडिया को अपने पाले में हांकने की कोशिशों मेें लगा रहा है। और नरेंद्र मोदी तथा उनके निजाम को कार्पोरेट जगत का जैसा पूर्ण समर्थन हासिल रहा है, उसे देखते हुए यह बहुत मुश्किल भी नहीं रहा है। इस प्रक्रिया में एक बड़ा मील का पत्थर था, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले से, रिलायंस ग्रुप का सीएनएन आइबीएनध् न्यूज 18 ग्रुप में सीधे हस्तक्षेप कर संपादकीय नीति को मोदी-अनुकूल कराना और अंततरू मोदी के प्रधानमंत्री बनने के फौरन बाद, इस चैनल को खड़ा करने वाली राजदीप सरदेसाई-सागरिका घोष जोड़ी का विदा किया जाना। उसके बाद से टाइम्स ग्रुप तथा जागरण गु्रुप जैसी मीडिया हाउसों ने हिंदुत्व के एजेंडा को जिस तरह अपने कारोबारी लाभ के लिए गले से लगाया है, उसकी एक झलक कोबरापोस्ट के हाल के रहस्योद्ड्ढघाटनों में दिखाई दी है। फिर भी इनके अलावा जी तथा रिपब्लिक जैसे चैनलों ने जिस तरह सत्ताधारी पार्टी की खुली वकालत को अपना पैशन बनाया है, उस सबके बाद से मुख्यधारा के मीडिया से मौजूदा शासन की मांगें और आक्रामक हो गयीे हैं।
इसी के एक महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन, शोभना भारतीया के साथ प्रधानमंत्री मोदी की एक मुलाकात के बाद, जो प्रकटतः इस समूह के महत्वाकांक्षी आयोजन, लीडरशिप समिट के सत्तापक्ष द्वारा संभावित बहिष्कार को टालने के लिए थी, अखबार के संपादक, अंतर्राष्टड्ढ्रीय ख्याति के पत्रकार बॉबी घोष को हटा दिया गया था। 2015 में उन्होंने जो हेट ट्रैकर शुरू कराया था, वह खासतौर पर संघ परिवार की आंख की किरकिरी बना हुआ था। संकेत स्पष्टड्ढ है। मुख्यधारा के मीडिया के बड़े हिस्से को अपनी गोदी में बैठाने पर भी मौजूदा सत्ताधारी संतुष्टड्ढ नहीं हैं और इमर्जेंसी की तरह आलोचना के हर स्वर को कुचल देना चाहते हैं। एबीपी न्यूज प्रकरण इसी जंग का एलान है। ज्यों-ज्यों मोदी एंड कंपनी को 2019 का चुनाव अपने हाथ से फिसलता लग रहा है, यह हमला और तीखा हो रहा है। आखिरकार, मीडिया जनता के आंख-कान का विस्तार है। सत्ता में बैठे लोगों को लगता है कि इस आंख-कान को बंद करा देेेंगे तो जनता उनकी सचाई जान ही नहीं पाएगी। लेकिन, इमर्जेंसी का एक सबक यह भी तो है कि मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण भी जनता को सचाई जानने से रोक नहीं पाता है।

Loading...
loading...