Tuesday , September 25 2018
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लोकगीतों का महीना है सावन

चंदन तिवारी, लोक गायिका
आज से सृष्टि,स्त्री और प्रóति का महीना सावन शुरू हो रहा है. इसे लोकगीतों का महीना भी कहते हैं. लोकगीतों की ॰ष्टि से देखें तो कोई एक महीना ऐसा नहीं है, जिसमें इतने तरीके के गीत गाये जाने का चलन रहा हो. गुणी-ज्ञानीजन तो यह भी कहते हैं कि भले ही बसंत को ऋतुओं का राजा कहते हों, लेकिन मौसम की रानी तो सावन ही है. सावन के मेघ पर ही बसंत के उल्लास और रंग का भविष्य टिका होता है. अब अगर इसे लोकगीतों की ॰ष्टि से देखें तो एक माह के सावन में गीतों की विविधता है. शुरुआत खेती के गीतों से होती है, क्योंकि यह रोपनी का मौसम होता है. फिर सावन शुरू होते ही शिव का गीत गाया जाने लगता है. कजरी और झूला गीत तो इसकी पहचान में शामिल है ही. सावन को शिव का महीना कहा गया है, लेकिन आखिरी का पांच दिन तो यह राधा और óष्ण का हो जाता है. झूलनोत्सव का हो जाता है. और इस बीच सावन में अगर 15 अगस्त आ गया तो देश के गीत का अलग उल्लास रहता है और आखिरी दिन तो यह भाई-बहन के पर्व रक्षाबंधन का हो ही जाता है. लेकिन पूरे देश और दुनिया में सावन का एक रंग कजरी बिखेरता है. कजरी और सावन एक दूसरे के पर्याय हैं. और जब कजरी की बात चलती है तो सबसे पहले नाम मिरजापुर का ही आता है. मान्यता है कि कजरी की विधा वहीं से निकली है, जिसे दुनिया में फैलाया बनारस ने. कई कहानियां हैं कजरी के पीछे. कोई इसे कजली देवी से जोड़ता है, जिनका मंदिर है उस इलाके में तो कोई कजली नामक नायिका से, जिसने प्रेम की तड़प के साथ अपने दुख और बिरह को स्वर देना शुरू किया तो कजली गायन की विधा जन्मी, जो बाद में कजरी के नाम से जाना गया. खैर, कजरी की मिथकीय कहानियां तो ढेरों हैं, लेकिन हकीकत की कहानी यही है कि कजरी गायन को मिरजापुर और बनारस के कजरीबाजों ने आगे बढ़ाया. इस कजरी ने, दोनों शहरों और इलाकों को एक सूत्र में जोड़ा. कजरीबाजी एक परंपरा थी, जिसमें सवाल-जवाब का दौर चलता था. जैसे कव्वाली में देखते हैं, दुगोला में देखते हैं, वैसे ही. रात-रात भर कजरीबाजी होती थी. यह पूरे सावन चलता था. सावन में कजरी का अखाड़ा लगता था. और जब हम कजरीबाजों की बात करते हैं तो एक नाम प्रमुखता से उभरकर आता है.वह नाम है सुंदर वेश्या का. कजरी की रानी कह सकते हैं उन्हें. हम सब कम जानते हैं उनके बारे में लेकिन एक जमाने में बरसाती चांद नाम से लिखित उनकी किताब बहुत मशहूर थी कलाकारों के बीच. उन्हें खुद ही बरसाती चांद कहा जाता था. सुंदर वेश्या की ही मूल रचना है मिरजापुर कईलअ गुलजार हो… जो आज दुनिया में मशहूर है और कजरीगीतों का पर्याय भी. सुंदर एक सुशील लड़की थी, जिसका अपहरण तब के मिसिर नामक गुंडे ने कर लिया था और उनका नाम सुंदर वेश्या कर दिया था. सुंदर को लेकर मिसिर कजरी के अखाड़े में जाता था. वह बड़े से बड़े कवियों से कजरी के अखाड़े में टकराती थी. लेकिन मिसिर अंग्रेजों का दलाल था और सुंदर को यह बात अखरती थी. वह सुंदर पर जुल्म भी ढाता था. बनारस के एक बड़े कजरीबाज और पहलवान नागर थे. नागर पहलवान कहते थे सब उनको. एक बार मिसिर गुंडा सुंदर को लेकर नागर के अखाड़े पर गया. नागर पहलवान अंग्रेजों के विरोधी थे. देशभ७ थे. मौका मिलते ही सुंदर ने मिसिर के जुल्म की कहानी बतायी. मिसिर और नागर में लड़ाई हुई.मिसिर मारा गया. सुंदर को नागर ने बहन माना. मिसिर की हत्या के जुल्म में नागर को कालापानी की सजा हुई. और उसके बाद सुंदर ने अपने भाई के बिरह के गीत रचने शुरू किये. इस तरह से सुंदर ने अपने समय में प्रेम, बिरह, आजादी और भाई-बहन के प्रेम, सभी तरीके के गीतों को रचा और लोगों को सुनाया. सुंदर के गीत तो लोकमानस में सदा-सदा रचा-बसा रहा, लेकिन दुनिया में मशहूर करने का काम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब ने किया, जब उन्होंने उनके कजरी गीतों पर शहनाई का रंग चढ़ाकर दुनिया में फैलाना शुरू किया. सुंदर के गीत दुनिया में फैल गये, लेकिन हम सुंदर को नहीं जानते. उनकी कजरी दुनिया सुनती है लेकिन कजरी की उस पटरानी को हम नहीं जानते. लोकविधा में यह चुनौती भी रही है. हम मूल रचनाकार को गौण कर देते हैं. जैसे हमरी अंटरिया ठुमरी को दुनिया सुनती है, लेकिन उसके मूल रचनाकार मिरजा जमाल को हम याद नहीं करते. कितना सुंदर होता कि इस सावन हम सुंदर को अच्छे से याद करते!

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