Tuesday , November 20 2018
Loading...

OMG… क्या बंद होगा ताजमहल! यहाँ जाने क्या है पूरा माजरा

सुप्रीम न्यायालय ने ताजमहल के संरक्षण को लेकर एक बार फिर केंद्र  उत्तरप्रदेश गवर्नमेंट को फटकार लगाई है. सुप्रीम न्यायालय ने पूछा है कि ताजमहल के संरक्षण  ट्रेपेजियम जोन के पुनर्विकास के लिये दोनों (केंद्र  राज्य) में से कौन जिम्मेदार है. न्यायालय का कहना है कि इस कार्यके लिये किसी एक प्राधिकरण की जवाबदेही तय की जानी चाहिए. ट्रेपेजियम जोन के भीतर स्मारक के आस-पास लगभग 10,400 वर्ग किमी एरिया आता है जिसे प्रदूषण से बचाने की कवायद की जा रही है.
Image result for OMG...  क्या बंद होगा ताजमहल!

यूपी गवर्नमेंट ने 17वीं सदी के स्मारक ताजमहल की सुरक्षा  संरक्षण को लेकर सुप्रीम न्यायालयमें दृष्टिपत्र पेश किया था. संसार के सात अजूबों में शामिल मुगलकालीन इस स्मारक की देखरेख के प्रति उदासीन रवैय्ये को लेकर सुप्रीम न्यायालय से 11 जुलाई को फटकार मिलने के बाद राज्य गवर्नमेंट ने यह दृष्टिपत्र पेश किया है. यूपी गवर्नमेंट ने ताजमहल संरक्षण के लिए बन रहे विजन डॉक्यूमेंट का शुरुआती ड्राफ्ट सुप्रीम न्यायालय में दाखिल किया था. जिसमें बोला गया है कि स्मारक के संरक्षण को लेकर अब ताज के आसपास के इलाके में प्लास्टिक का प्रयोग बंद होगा  बोतलबंद पानी की भी मनाही होगी.

सुनवाई के दौरान जस्टिस मदन बी लोकुर ने बोला कि इस कार्य के लिये एक प्राधिकरण होना चाहिये, जो इसकी जिम्मेदारी ले. यूपी गवर्नमेंट की ओर से ताजमहल के संरक्षण को लेकर पेश किए गए विजन डॉक्यूमेंट पर नाराजगी जाहिर करते हुये उन्होंने बोला कि हालत यह है कि इंडियनपुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के योगदान के बिना ही विजन डॉक्यूमेंट तैयार कर लिया गया है.

उधर, केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना है कि एएसआई ट्रेपेजियम जोन में स्थित उद्योगों के ट्रान्सफर के लिये जिम्मेदार नहीं है. उन्होंने दावा किया कि यूनेस्को दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन को अपनी हेरिटेज जोन की सूची से हटाने की तैयारी कर रही है  ऐसे में अगर ताजमहल को इस सूची से हटा दिया गया तो यह राष्ट्र के लिए बहुत ज्यादा शर्मिंदगी की बात होगी.

सुप्रीम न्यायालय ने ताजमहल की सुंदरता बचाने के लचर प्रयासों को देखते हुए पहले भी कई बार कठोर टिप्पणी की है. ताज को प्रदूषण से बचाने की चिंता तो 70 के दशक से ही प्रारम्भ हो गई थी. तब तो आगरा से 40 किमी दूर स्थित मथुरा रिफाइनरी तक पर सवाल उठ गए थे.  अब सुप्रीम न्यायालय ने बेहद कठोर होते हुए केंद्र, राज्य गवर्नमेंट तथा अन्य जिम्मेदार संस्थाओं को जमकर फटकार लगाई है. सुप्रीम न्यायालय ने कहा, अगर ताजमहल को सरंक्षण नहीं दे पा रहे तो बंद कर दो.

कहीं कई विभाग-मंत्रालय  संस्थाएं तो नहीं ताजमहल की दुर्दशा का कारण

ताजमहल के रखरखाव की जिम्मेदारी कई विभागों-मंत्रालयों के हाथ में है. कई बार ये अलग-अलग तो कई बार साथ कार्य करते हैं. इनमें प्रमुख हैं इंडियन पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई). इसके अतिरिक्त है 1982 में स्थापित ‘ताज ट्रेपेजियम जोन अथॉरिटी’. इसमें कई जिम्मेदार साथ कार्यकर रहे हैं. 1999 में इसमें लोकल प्रशासन, इंडियन पुरातत्व सर्वेक्षण, केंद्र और राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, आगरा विकास प्राधिकरण, पर्यावरण, वन, पेट्रोलियम तथा गैस से जुड़े मंत्रालय के 8 लोग थे. 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 18 हो गई. वैसे एएसआई अकेले  ताज ट्रेपेजियम जोन अथॉरिटी के जिम्मेदार तो मिलकर भी इसका अच्छा रखरखाव करने मेें असमर्थ रहे हैं. एएसआई में कर्मचारियों का टोटा है.

फिल्हाल तो वह ताज की चमक लौटाने के लिए इसकी दीवारों पर मुल्तानी मिट्टी का लेप लगा रहा है.इस लेप को 24 घंटों या उससे अधिक समय के लिए सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है, ताकि वह पत्थर से सारी गंदगी सोख ले. सूखने के बाद इस मिट्टी को शुद्ध पानी से धोया जाता है. इमारत को ये ट्रीटमेंट 1994, 2001, 2008  2014 में दिए जा चुका है. मगर एएसआई के ये कोशिश नाकाफी साबित हुए हैं. एएसआई केंद्र गवर्नमेंट के प्रति जवाबदेह है, यही वजह है सुप्रीम न्यायालय लगातार केंद्र गवर्नमेंट को भी कठोर हिदायत दे रहा है. वहीं ताज ट्रेपेजियम जोन अथॉरिटी न्यायालय के आदेश के बावजूद जोन में पौधे लगवाने तथा प्रदूषण घटाने में असफल रही है.

घटते-बढ़ते पर्यटक
हालही में सुप्रीम न्यायालय ने पेरिस के एफिल टावर को देखने पहुंचने वाले पर्यटकों से ताज के पर्यटकों की तुलना करते हुए चिंता जताई है. वैसे, आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि ताजमहल देखने वाले पर्यटकों की संख्या 2014, 2015 तथा 2016 में कम रही है. हालांकि 2017 में इस आंकड़े में सुधार दिखा.
वर्ष              घरेलू           विदेशी
2011    4604603    679038
2012    5234200    790616
2013    5094432    740910
2014    5377891    694610
2015    5842287    639338
2016    5547839    666361
2017    5112776    760618

1992 में सुप्रीम न्यायालय के आदेश पर ताजमहल को सुरक्षित रखने के लिए 212 उद्योगों  450 ईंट भट्ठों को बंद कर दिया गया. हालांकि इससे आगरा में रोजगार संकट की बातें भी उठीं.

1996 में सुप्रीम न्यायालय ने एससी मेहता की याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय दिया. कार्ट ने ‘ताज ट्रेपेजियम जोन’ में स्थित उद्योगों में कोयले के प्रयोग पर रोक लगा दी. इन्हें सीएनजी के प्रयोग का आदेश दिया. न्यायालय ने बोला कि जो उद्योग इसका पालन नहीं करते उन्हें शिफ्ट या बंद कर दिया जाए.

1996 में ताजमहल को वायु प्रदूषण के कुप्रभाव से बचाने के लिए सुप्रीम न्यायालय ने ताज ट्रेपेजियम जोन में काटे गए पेड़ों के बदले 258208 पौधे लगाने का आदेश दिया था.

2015 में सुप्रीम न्यायालय ने ताजमहल के पास स्थित एक श्मशान को हटाने का आदेश दिया. बोलाकि लकड़ियों से चिता जलाने से उठते धुएं  राख से इमारत की दीवारों पर प्रदूषण का खतरा है. राज्य गवर्नमेंट ने न्यायालय के आदेश को माना, लेकिन हिंदू संगठनों के विरोध के बाद इसे नहीं हटाया गया.

2017 में सुप्रीम न्यायालय ने 450 पेड़ काटे जाने की अनुमति मांगने पर तल्ख टिप्पणी की थी.बोला था कि गवर्नमेंट ऐसा करके क्या ताजमहल को नष्ट करना चाहती है.

मई 2018 में सुप्रीम न्यायालय ने ताजमहल को लेकर कहा- ‘दुनिया का आठवां अजूबा अब यह बन रहा है. पहले यह पीला हुआ  अब यह भूरा  हरा हो रहा है.‘ न्यायालय ने एएसआई को यह भी बोलाकि क्या काई के पास पंख होते हैं, जो उड़कर ताजमहल पर बैठ जाती है.

वायु प्रदूषण
हवा में मौजूद धूल  कार्बन के कण ताजमहल पर जम जाते हैं. इससे संगमरमर की चमक लगातार फीकी पड़ रही है. इसे ही ताजमहल के सौंदर्य के बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण माना जाता रहा है. इस प्रदूषण की बड़ी वजह उद्योगों  वाहनों से निकलने वाला धुआं है.

यमुना में घटता पानी
ताजमहल की नींव वर्ष वृक्ष की लकड़ी से बनी है. इसे नमी से मजबूती मिलती है. ताज के यमुना के तट पर होने से लकड़ी को नमी मिलती रहती है. मगर अब प्रदूषण की शिकार यमुना का पानी लकड़ी को नुकसान पहुंचा रहा है. जल स्तर गिरने से भी नींव की लकड़ियां सूखकर निर्बल हो रही हैं.

पेड़ों की कटाई
आगरा में बड़ी संख्या में पेड़ विकास कार्यों की भेंट चढ़ चुके हैं. पेड़ प्रदूषण के स्तर में कमी लाते हैं.इसलिए हरियाली में कमी चिंता की बात है. हरियाली में इस कमी से प्रतिदिन के न्यूनतम औरअधिकतम तापमान में अंतर बढ़ रहा है. इससे संगमरमर को नुकसान पहुंच रहा है.

अवैध निर्माण
ताजमहल के 500 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के निर्माण काम पर रोक है. इसके बावजूद इस एरिया में धड़ल्ले से निर्माण हो रहे हैं. इन गैरकानूनी निर्माणों से हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है.साथ ही यमुना किनारे की हरियाली भी बहुत ज्यादा हद तक समाप्त हो रही है. इससे वायु प्रदूषण बढ़ा है.

प्राकृतिक कारण भी
संगमरमर में मौजूद खनिज हवा में मौजूद ऑक्सीजन से क्रिया करके इसका रंग बिगाड़ते हैं. इससे सफेद पत्थर पर पीले-भूरे धब्बे बन जाते हैं. इस पर बारिश का भी असर होता है. पर्यावरणविदों के मुताबिक यमुना नदी में पनप रहे कीड़े इस स्मारक पर हरे-काले रंग के अवशेष छोड़ रहे हैं.

ताजमहल के सौंदर्य को प्रदूषण से नुकसान पहुंचने की बात सबसे पहले 1970 के दशक में उठी थी.दरअसल तब भारतीय तेल कॉर्पोरेशन ने अागरा से 40 किमी दूर मथुरा में एक रिफाइनरी की स्थापना की थी. उस समय पर्यावरण कार्यकर्ताओं नेे रिफाइनरी का विरोध प्रारम्भ किया था. बोलाथा कि इससे निकल रहा सल्फर डाईऑक्साइड ताजमहल के संगमरमर पर जम रहा है. इससे पत्थरों का रंग बदल रहा है  ये झड़ने भी लगे हैं.

1982 में केंद्र गवर्नमेंट ने ‘ताज ट्रेपेजियम जोन’ की स्थापना का ऐलान किया. ताज के आसपास विषम चतुर्भुज आकार के 10,400 वर्ग किलोमीटर एरिया में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना  विस्तार पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

1984 में सुप्रीम न्यायालय के वकील तथा पर्यावरण कार्यकर्ता एससी मेहता ने ताज को हो रहे नुकसान को लेकर एक जनहित याचिका दायर की थी. इसमें उन्होंने गवर्नमेंट को पार्टी बनाया था.बोला था कि गवर्नमेंट इलाके के उद्योगोंं और वाहनों से निकले प्रदूषण से ताजमहल को बचाने में नाकाम रही है.

Loading...

एस वरदराजन कमेटी ने 1978 में केंद्रीय जल प्रदूषण नियंत्रण एवं संरक्षण बोर्ड ने 1981-82 मेें नेशनल एन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) ने 1990 तथा 1993 में मथुरा रिफाइनरी से निकलने वाले सल्फर उत्सर्जन को कम करने की सिफारिश की थी. ताकि ताजमहल को बचाया जा सके. इसमें ग्रीन बेल्ट बनाने  प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को ताज ट्रेपेजियम जोन से बाहर करने की सिफारिश भी की गई थी.

loading...

1990 में पर्यावरण कार्यकर्ता मथुरा रिफाइनरी के बजाय आगरा  फिरोजाबाद के छोटे उद्योगों के विरोध में उतर आए. इनमें कांच, लोहा, रबर, ईंट और चूना भट्टी जैसे उद्योग शामिल हैं.

यूपी प्रदूषण बोर्ड ने रिपोर्ट दी कि 1991 से 1994 के दौरान कोयला आधारित उद्योगों के बंद होने तथा थर्मल प्लांट शिफ्ट होने से प्रदूषण घटा है. लेकिन 1994 के बाद मथुरा रिफाइनरी, वाहनों की बढ़ती संख्या  बिजली संकट के दौरान डीजल जनरेटर के प्रयोग से प्रदूषण बढ़ रहा है.

Loading...
loading...