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घिस गईं एड़ियां, कोई नहीं सुनता कारगिल शहीद के बूढ़े मां-बाप की फरियाद

‘क्या करने आए हो, जाओ यहां से, क्या फायदा अखबारों में खबर छापने का, जब सरकार किसी की सुनती ही नहीं। थोड़ा गुस्से में…एड़ियां घिस गईं, 19 साल से कोई सुनता ही नहीं यहां।’
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कारगिल शहीद राजेश गुरुंग के पिता नायक श्याम सिंह गुरुंग (अप्र) के चेहरे पर ये बातें कहते हुए उदासी छा गई। आंखों में गुस्सा और मन में नाराजगी थी। सरकार के खिलाफ भी और सिस्टम के खिलाफ भी। अमर उजाला की टीम जब गढ़ी कैंट स्थित चांदमारी गांव में शहीद के घर पहुंची तो उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर बयां की। बोले, आज तक न तो जमीन मिली और न बेटे को नौकरी।

शहीद राजेश गुरुंग 2 नागा रेजीमेंट में तैनात थे। छह जुलाई 1999 को वह कारगिल युद्ध में शहीद हो गए। उनके पिता श्याम सिंह गुरुंग भी सेना में नायक पद से रिटायर्ड हैं। पिता को देखकर बेटा भी फौज में गया था, लेकिन राजेश के शहीद होने के बाद उनका परिवार सरकार की सुस्ती से बेहद दुखी है। उनके पिता ने बताया कि जब बेटा शहीद हुआ तो सरकार ने घोषणा की थी कारगिल शहीद के परिवार को पांच बीघा जमीन और एक नौकरी दी जाएगी।

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 सरकार से पांच हजार रुपये महीना पेंशन के अलावा कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ

बताया कि जब बेटा शहीद हुआ तो उस वक्त करीब 27 लाख रुपये मिले थे। इस पैसे से उन्होंने चांदमारी में मकान बना लिया था। इसके बाद 19 साल हो गए, सरकार से पांच हजार रुपये महीना पेंशन के अलावा कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ। नौकरी के इंतजार में छोटे बेटे अजय गुरुंग की उम्र ही निकल गई। अब वह एक प्राइवेट कंपनी में चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी है।

इसी तरह, सरकार ने आज तक जमीन नहीं दी है। दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते एड़ियां घिस गईं। उनका कहना है कि अब तो यह शौर्य दिवस केवल एक ढोंग लगता है, जिसमें सरकार हर साल औपचारिकता पूरी करती है। बेहतर हो कि सरकार ऐसे दिन सभी कारगिल शहीदों के परिवारों को बुलाए और उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता से करे। यही उन वीर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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पांच बीघा जमीन फाइलों में ‘कैद’

कारगिल शहीद राजेश गुरुंग के परिवार को सरकार ने पांच बीघा जमीन देने की घोषणा की थी। पिता श्याम सिंह गुरुंग ने बताया कि गढ़ी कैंट में पांच बीघा जमीन चिह्नित भी की गई थी। उन्होंने बताया कि उन्हें पेट्रोल पंप भी देने की घोषणा की गई थी, लेकिन इसके लिए उन्होंने खुद मना कर दिया था। जमीन के लिए जब चक्कर काटे तो पटवारी ने जमीन की पैमाइश की। इसके बाद से आज तक बात आगे ही नहीं बढ़ पाई।
पेंशन के लिए भी काटने पड़ते हैं चक्कर
कारगिल शहीद परिवारों के लिए सिस्टम की सुस्ती और काहिली केवल घोषणाओं के पूरा होने में ही रुकावट नहीं है बल्कि पेंशन के भुगतान का सिस्टम भी बेहद सुस्त है। साल में कम से कम चार बार तो पटवारी से लेकर सैनिक कल्याण बोर्ड तक के चक्कर काटने पड़ते हैं। इसके बाद कहीं जाकर पेंशन मिलती है। कारगिल शहीद परिवारों की सरकार से मांग है कि जल्द से जल्द उनकी पेंशन भुगतान की प्रक्रिया सरल की जाए।
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