Saturday , November 17 2018
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महिला आरक्षण बिल के बारे में कुछ एसी बाते जो आपको पता होनी चाहिए

संसद का मानसून सत्र प्रारम्भ होने में महज तीन दिन रह गए हैं  यह 10 अगस्त तक चलेगा. भाजपा शासन में मानसून का यह आखिरी सत्र होगा. सत्र प्रारम्भ होने से पहले लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सभी राजनीतिक पार्टियों से संसद निर्विरोध चलने देने का आह्वान किया है.जबकि कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी को एक लेटर लिखा है जिसमें  इस सत्र में ‘महिला आरक्षण बिल’ लाने की मांग की है. राहुल गांधी ने बोला है कि आप बिल पेश कीजिए संसद में कांग्रेस पार्टी इसका समर्थन करेगी.

क्या है महिला आरक्षण बिल
महिला आरक्षण बिल इंडियन पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी गले की फांस बना हुआ है. यह इनसे न तो उगलते बन रहा है न निगलते ही बन रहा है. पिछले दस से अधिक वर्षों से शायद ही कोई संसद सत्र होगा जिसमें महिला आरक्षण बिल की बात न उठी हो.
ये संविधान के 85 वें संशोधन का विधेयक है. इसके भीतर लोकसभा  राज्य विधानसभाओं में स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत सीटों पर आरक्षण का प्रावधान रखा गया है. इसी 33 प्रतिशत में से  एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति  जनजाति की स्त्रियों के लिए आरक्षित की जानी है. जिस तरह से इस आरक्षण विधेयक को पिछले कई वर्षों से बार-बार पारित होने से रोका जा रहा है या फिर राजनीतिक पार्टियों में इसे लेकर विरोध है इसे देखकर यह लगता है कि शायद ही यह कभी संसद में पारित हो सके.

शुरू से ही रहा है विवादों में
पहली बार इस विधेयक को देवगौड़ा के नेतृत्व वाली लोकसभा में 1996 में पेश किया गया था तब भी सत्तारूढ़ पक्ष में एक राय नहीं बन सकी थी. तब भी विधेयक की खिलाफत शरद यादव ने की थी पिछले साल जब बिल पेश किया जा रहा था तब भी शरद यादव ने ही इसका विरोध किया था. 1998 में जब इस विधेयक को पेश करने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री थंबी दुरै खड़े हुए थे तब संसद में इतना हंगामा हुआ  हाथापाई भी हुई उसके बाद उनके हाथ से विधेयक की प्रति को लेकर लोकसभा में ही फाड़ दिया गया था.

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विधेयक पारित करने का अच्छा समय
लोकसभा  विधानसभाओं में स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए संविधान संशोधन करने का यह सबसे अच्छा समय है. महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108 वां विधेयक राज्यसभा में पहले से पारित है. यह विधेयक 2010 में राज्यसभा में पारित हुआ, पर तब यह लोकसभा में पारित नहीं हो पाया था  2014 में लोकसभा खत्म होने के साथ ही यह रद्द हो गया था.

चूंकि राज्यसभा स्थायी सदन है, इसलिए यह बिल अभी जिंदा है. अब लोकसभा इसे पारित कर दे, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा. 2019 के लोकसभा चुनाव नए कानून के तहत हो सकते हैं  नयी लोकसभा में 33 प्रतिशत महिलाएं आ सकती हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए अब सिर्फ एक वर्ष का समय बचा है.

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तब कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह बोला था कि केंद्र में कांग्रेस पार्टी की गवर्नमेंट आएगी, तो वह महिला आरक्षण बिल लाएगी, गेंद बीजेपी के पाले में डाल दी थी. महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाने वाली पार्टी होने के नाते इस मायने में कांग्रेस पार्टी की प्रतिबद्धता जाहिर है.

अपनी गवर्नमेंट रहते हुए कांग्रेस पार्टी इसे राज्यसभा में पारित भी करा चुकी है. इसके अतिरिक्तकांग्रेस पार्टी की गवर्नमेंट 1993 में ही पंचायतों में महिला आरक्षण लागू कर चुकी है, जो पंचायतों में सफलतापूर्वक चल रही है. अब राजग  बीजेपी को साबित करना है कि महिला आरक्षण के सवाल पर वे गंभीर  ईमानदार हैं. कांग्रेस पहले से ही महिला आरक्षण बिल के समर्थन में रही है  अब राहुल गांधी की चिट्ठी ने इसपर मुहर लगा दी है.

पूर्व कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी हमेशा से स्त्रियों की पक्षधर रही हैं. उनका कहना है कि हिंदुस्तान में स्त्रियों को  शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है. उन्होंने पिछले सत्र में मोदी गवर्नमेंट से मांग की थी कि महिला आरक्षण बिल को पास किया जाए.

संसद में स्त्रियों का औसत देखें तो विश्व का औसत जहां 22.6 प्रतिशत है. इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन की रिपोर्ट के मुताबिक, संसद में स्त्रियों के प्रतिनिधित्व के मामले में संसार के 193 राष्ट्रों में हिंदुस्तान का जगह 148वां है.

संसद में स्त्रियों के आंकड़ें देखें तो रवांडा 63 प्रतिशत के स्तर पर हैं  नेपाल में 29.5 प्रतिशतमहिलाएं संसद में हैं. अफगानिस्तान में 27.7 प्रतिशत  चाइना की संसद में 23.6 प्रतिशत महिला सांसद हैं. पाक में भी संसद में 20.6 प्रतिशत महिला सांसद हैं. वहीं हिंदुस्तान का औसत केवल 12 प्रतिशत है.

बहरहाल इन तमाम अड़चनों के चलते महिला आरक्षण विधेयक एक सत्र से दूसरे सत्र  एक लोकसभा से दूसरी लोकसभा तक टलता जा रहा है.

पॉलिटिक्स में महिला भागीदारी कम होने का कारण है कि महिला आरक्षण बिल 22 वर्ष से अटका हुआ है. 1996 में पहली बार पेश होने के बाद  2010 में राज्यसभा से पास होने के बाद भी यह दुबारा लोकसभा से पास नहीं हो पाया. इसकी बड़ी वजह सपा, बीएसपी  आरजेडी का कड़ा विरोध  कोटे के भीतर कोटे की मांग था जिसके चलते ये बिल अधड़ में लटका हुआ है.

मजेदार बात यह है कि हर चुनाव में महिला आरक्षण बिल एक बड़ा मुद्दा बनता है. हर लोकसभा में इसे लाने की  फिर इसे पास करवाने की बात की जाती है. जानकारों का यह भी मानना है कि लोकसभा में सत्ताधारी साझेदारी को पूर्ण बहुमत हासिल है, यानी नरेंद्र मोदी गवर्नमेंट पूर्ण बहुमत की गवर्नमेंट है  उसके सामने वह दिक्कत नहीं है, जो मनमोहन गवर्नमेंट को थी.

मनमोहन गवर्नमेंट में कांग्रेस पार्टी का अपना बहुमत नहीं था  कई समर्थक दल महिला आरक्षण विधेयक को मौजूदा रूप में पारित करने के लिए तैयार नहीं थे. लेकिन मौजूदा लोकसभा में न सिर्फ सत्ताधारी साझेदारी का बहुमत है, बल्कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी महिला आरक्षण के समर्थन में है. इसके अतिरिक्त वामपंथी दल भी महिला आरक्षण लागू करना चाहते हैं. ऐसे में यह गवर्नमेंट पर है कि वह महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल लाए. इसके बिना हिंदुस्तान में संसद विधानसभाओं में स्त्रियों का समुचित प्रतिनिधित्व संभव नहीं दिखता.

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