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पुलिस से उठता वि-रु39यवास,खतरे की घन्टी

प्रेम -रु39यार्मा
पूरे दे-रु39या में पुलिस के प्रति जनता का नजरिया बहुत तेजी से बदल रहा है। रेल पर सुरक्षा वाली पुलिस सुरक्षा छोडकर किस काम
मे जुटी है यह रेल यात्री अच्छे से सम-हजयते है। आम पुलिस का हाल बुरा है। थानें मंें डरा सहमा व्यक्ति जब फरियाद लेकर
पहुचता है तो पुलिस की भा-ुनवजयाा ही अलग होती है। यातायात पुलिस यातायात सुधारने की जगह हेल्मेट और वसूली में
जुटी है। पुलिस के प्रति अवि-रु39यवास पैदा करने के चंद उदाहरण केवल जून आौर जुलाई में केवल उत्तर प्रदे-रु39या में ही
दिखाई पड़े इनमें उत्तर प्रदे-रु39या में गुंडों और माफिया के साथ अब पुलिस विभाग से जुड़े लोग भी कानून
तोडने और लोगों के साथ गुंडई करने पर आमादा हैं। ताजा मामला प्रदे-रु39या की राजधानी लखनऊ का है, जहां
एसटीएफ के इंस्पेक्टर रणजीत राय ने सादी वर्दी में जन संदे-रु39या टाइम्स के प्रधान संपादक के घर में घुसकर गुंडागर्दी
की। घर में अकले रहने वाले बुजुर्ग पत्रकार दम्पति को धमकाया और अभद्रता की। इतना ही नहीं पत्रकार दम्पति से कहा
कि अब तुम किसी भी पुलिस वाले को, किसी दरोगा को, एपसी को जिसको चाहो बुला लो, देखता हूं तुम्हारी क्या
औकात है। इसके बाद अंबेडकरनगर राजेसुल्तानपुर थाना क्षेत्र के पदुमपुर बाजार में किराना के थोक व फुटकर
विक्रेता राके-रु39या जायसवाल (30) पुत्र आत्मा जायसवाल की हत्या के बाद मंगलवार सुबह हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग को
लेकर प्रद-रु39र्यानकारियों व पुलिस के बीच हुए संघ-ुनवजर्या में सीओ, एसआइ समेत पांच पुलिस कर्मी घायल हो गए। इसके बाद
’फैजाबाद में पुलिसिया निरंकु-रु39याता की -रु39यार्मनाक तस्वीर सामने आई है। मामला रुदौली कोतवाली क्षेत्र की -रु39याुजागंज
पुलिस चैकी से जुड़ा है। प्र-िरु39याक्षु दारोगा पवन राठौर पर आरोप है कि उन्होंने चैकी में ही पिता-ंउचयपुत्र की
बेरहमी से पिटाई कर उन्हें निर्वस्त्र करके वीडियो बनाया। वजह इतनी थी कि कि-रु39याोर ने दारोगा का घूस लेते हुए
वीडियो बना लिया था। इससे नाराज दारोगा ने जूते से कि-रु39याोर का चेहरा मसला और इतनी तेज थप्पड़ मारा कि उसके
कान से खून बहने लगा। मुंह खोलने पर निर्वस्त्र कर उनका बनाया वीडियो वायरल करने की धमकी दी। इसके अलावा

कानपुर के सजेती थाने के दरोगा पच्चा लाल को हत्यारों या हत्यारे ने 87 बार चाकू से गोदा गया। सिर से लेकर पेट,
गर्दन और पीठ पर गहरे जख्म मिले। आंतें बाहर को आ गईं थीं। जख्मों से -रु39याव इतना वीभत्स लग रहा था कि
पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर और कर्मचारी भी दंग रह गए।पोस्टमार्टम की रिपोर्ट देखने से यह पता चलता है कि
कातिल किसी भी सूरत में दरोगा को जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे। गर्दन तक रेत दी गई थी। आंतें बाहर
निकालकर कई टुकड़े कर दिए गए थे। हत्या करने के तरीके और चाकू से अंधाधुंध वार से लगता है कि कातिल की
दरोगा से कोई खुन्नस थी। अब एक उदाहरण और देना चाहूगा मामला रायबरेली के थाना बछरावा से जुड़ा है।
एक पचास साल से पुराने मंदिर के मामले में कई बार आने जाने के रास्ते को लेकर विवाद है। एक बार मामला थाने
पहुंचा पुलिस ने खाना पूर्ति कर इतिश्री कर ली। इसी मामले मंे पीड़ित ने जब पुनः विधानसभा अध्यक्ष के माध्यम से
पत्रचार कर राहत की मांग की तो फिर डीएम एसपी से होते हुए पत्र थाने तक पहुंचा और उस पर फिर -िसजय़लाई बरती गई। अब
प्र-रु39यन उठता है कि जिस रास्ते को लेकर चालीस पैतालिस साल से विवाद नही था तो उसमें अचानक विवाद क्यो हुआ। अखिर
पुलिस इस मामले को लटकाकर क्या सिरफुट्टवल या किसी बड़ी घटना का इंतजार कर रही है। क्या पुलिस का यह फर्ज नही
बनता कि लेखपाल और राजस्व के किसी अधिकारी को बुलाकार गांव के बुजुर्गो से जानकारी लेकर उस मामले का
पट्ाक्षेप करा देती नही पुलिस तो विवाद ब-सजय़ने का इंतजार करती दिखती है।इस तरह के हजारों उदाहरण है। पुलिस द्वारा
अपनी -रु39याक्ति का दुरुपयोग करके व्यक्तिगत लाभ कमाना ही पुलिस द्वारा भ्र-ुनवजयटाचार है। यह भ्र-ुनवजयटाचार एक वि-रु39यो-ुनवजया प्रकार का है
क्योंकि इसमें कानून का पालन कराने के लिए जिम्मेदार अधिकारी अपनी नैतिक जिम्मेदारी से मुकरते हुए भ्र-ुनवजयट आचरण
करते हैं। यह वि-रु39यो-ुनवजया इसलिए है क्योंकि पुलिस के भ्र-ुनवजयट आचरण से कानून और व्यवस्था की स्थिति खराबह होती है,
मानवाधिकार प्रभावित होते हैं, लोगों का न्याय से वि-रु39यवास उठता है। पुलिस द्वारा किए गये भ्र-ुनवजयटाचार कई तरह के
होते हैं, जैसे घूस लेना।पुलिस जनता की रक्षा के लिए होती है। -रु39याहर में जब कोई चोर, गुंडा या आतंकवाद
देखा जाता है तो जनता पुलिस को बुलाती है और उसे सबक सिखाना चाहती है मगर दिल्ली में कुछ उल्टा है। दिल्ली
की जनता का मानना है कि दिल्ली पुलिस चोर से हफ्ता लेती है इसलिए जनता को दिखाने के लिए वारदात स्थल से चोर को
पकड़ते हैं लेकिन चैकी ले जाकर उसे छोड़ देते हैं, चोर को पुलिस के हवाले देने में कोई फायदा नहीं
है। ऐसे में जनता खुद ही चोर को मार-ंउचयपीटकर छोड़ देती है। यह कारण था कि सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधारों
पर अपने दि-रु39याानिर्दे-रु39याों की अनदेखी का संज्ञान लेकर बिल्कुल सही किया। अच्छा होता कि वह समय रहते यह देखता कि उसके
दि-रु39याानिर्दे-रु39याों पर अमल क्यों नहीं हो रहा है? 2006 में पुलिस सुधारों को लेकर दिए गए उसके सात सूत्रीय
दि-रु39याानिर्दे-रु39याों से बचने की को-िरु39या-रु39या तत्कालीन केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा की गई। एक-ंउचयदो राज्यों को
छोड़कर बाकी सबने पुलिस सुधारों की दि-रु39याा में आगे ब-सजय़ने के बजाय तरह-ंउचयतरह के बहाने ही बनाए। इस बहानेबाजी के
मूल में थी पुलिस का मनमाफिक इस्तेमाल करने की आदत। दरअसल राजनीतिक दलों की इस आदत ने ही पुलिस सुधारों
की राह रोके रखी। राजनीतिक दलों की इसी प्रवृत्ति के चलते पुलिस सुधार संबंधी दि-रु39याानिर्दे-रु39या एक तरह से ठंडे बस्ते
में पड़े रहे। वैसे तो मोदी सरकार को पुलिस सुधार को अपने एजेंडे पर लेना चाहिए था, लेकिन उसने -रु39याासन तंत्र
को दुरुस्त करने की अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद अब तक ऐसा नहीं किया। चूंकि केंद्र सरकार समेत राज्य सरकारें पुलिस
सुधारों के प्रति गंभीर नहीं थीं इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाहक पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति पर रोक लगाकर
बिल्कुल सही किया। यह अजीब है कि सुप्रीम कोर्ट के दि-रु39याानिर्दे-रु39याों में कार्यवाहक पुलिस प्रमुख का कोई जिक्र न
होने के बाद भी कई राज्य इस पद पर नियुक्ति करने में लगे हुए थे। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदे-रु39या के तहत अब सभी राज्य
पुलिस प्रमुख यानी डीजीपी की नियुक्ति के तीन माह पहले -रु39याी-ुनवजर्या पुलिस अधिकारियों के नाम संघ लोक सेवा आयोग को
भेजेंगे। अब यदि एक बार पुलिस प्रमुख की नियुक्ति सही तरह से हो जाती है और उसका कार्यकाल भी कम से कम दो व-ुनवजर्या तय
हो जाता है तो फिर यह उम्मीद की जा सकती है कि वह पुलिस की कार्यप्रणाली को दुरुस्त करने के कुछ ठोस उपाय कर सकता
है। अभी तो पुलिस प्रमुख अपनी कुर्सी बचाने की चिंता में ही अधिक रहते हैं और इसका परिणाम यह होता है कि
थाने बिकते है। सत्तारू-सजय़ दलों के नेताओं का थानों पर कब्जा हो जाता है। अब सत्तारू-सजय़ नेताओं को भी यह
सम-हजयना होगा कि पुलिस सुधारों से और अधिक समय तक बचा नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर यह बता
रहा है कि किस तरह जो काम कार्यपालिका को करने चाहिए वे न्यायपालिका को करने पड़ रहे हैं। पुलिस सुधार की
अनदेखी के इस मामले में आखिर राजनीतिक दल किस मुंह से यह कह सकते हैं कि न्यायपालिका अपनी सीमा लांघ रही है? यह
भी ध्यान रहे कि जहां सत्तारू-सजय़ दल पुलिस सुधारों से कन्नी काटते रहे वहीं विपक्षी दल भी इस पर मौन साधे रहे।

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लेकिन जो घटनाएं सामने आ रही वह इस बाॅत का संकेत है कि पुलिस सुधारों के प्रति अब सरकार गम्भीर न हुई तो
परिणाम बहुत घातक होगें।
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