Wednesday , September 26 2018
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संजय मिश्रा को प्रसिद्ध होना लगता ख़राब जीना चाहते साधारण जिन्दगी

कभी बेहद संजीदगी  गंभीरता तो कभी बेलौस बनारसी अंदाज के साथ एक्टिंग के अपने पूरे रंग और अंदाज में नजर आए. ये थे गोलमाल के बबली, आंखों देखी के राजे बाऊजी  अंग्रेजी में कहते हैं के एक आयु बाद प्यार की परवान चढ़ने वाले यशवंत बत्रा.
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जी हां, मशहूर फिल्म एक्टर संजय मिश्रा. उनकी एक फिल्म सफल जल्दी ही आने वाली है. बीएचयू में आयोजित फिल्म फेस्टिवल में आए संजय मिश्रा शनिवार की शाम अमर उजाला ऑफिस में थे.संवाद के दौरान मिश्रा ने शुरुआती कॅरियर से लेकर 30 वर्ष के अनुभव को साझा किया.

करीब एक घंटे की वार्ता में लगा ही नहीं कि जैसे उनसे कहीं बनारस छूटा हो, पूरा बनारसीपन. यही वजह है कि उन्हें यह बात कचोटती हैं कि अब बनारस में ही बनारस नहीं रहा. उन्हें साफ कहा, ‘रजा ई बनारस हौ, एकरा के मत छेड़ा’ कहते हैं बनारस शहर नहीं चरित्र है.

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मेरे चरित्र पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा है. बनारस मेरा दोस्त है, मेरी मां हैं. ये शहर मां के आंचल जैसा है, जहां मैं खुद को सुरक्षित महसूस करता हूं. बनारस को उसके उसी चरित्र में रहने देना चाहिए.

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गलियां, गंगा घाट, पान, भांग सब में एक अलग ही रंग है, उसे उसी रंग में रहने देना चाहिए. उन्होंने बोला कि अब तो प्रसिद्ध होना भी बहुत खलता है. मुझे भी मन करता है कि गंगा के किनारे आराम से बैठूं  घाट के किनारे तफरीह करूं. अब यह संभव नहीं हो पाता है.

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इंडियन संस्कृति  कला हो रही समाप्त

एक सवाल के जवाब में उन्होंने बोला कि ये सिनेमा का सबसे सार्थक दौर चल रहा है. फिल्मों से जुड़ाव बढ़ रहा है. दर्शक वर्ग भी बढ़ा है. फर्क बस ये आया है कि पहले फिल्म देखने जाना उत्सव सरीखा हुआ करता था  आज मोबाइल  लैपटॉप में सिमट गया है.

हाल ही में बनी फिल्म ‘अंग्रेजी में कहते हैं’ बनारस में ही शूट हुई थी लेकिन यहां रिलीज नहीं हो पाई.वजह, इसे नेट  मोबाइल पर देखा जा रहा है  फिल्म लागत से ज्यादा कमाई कर चुकी है. वहीं गवर्नमेंट भी कम बजट की फिल्मों के प्रमोशन में मदद नहीं कर रही है.

मुंबई में मराठी फिल्मों को शासन का बहुत सपोर्ट मिलता है. बकौल संजय मिश्रा इंडियन संस्कृति कला समाप्त हो रही है. बुनियादी चीजों को छोड़ने का परिणाम है कि हम इसे संस्कृति, कला पर्यावरण के नुकसान के रूप में भुगत रहे हैं.

20 वर्ष बाद आने वाली पीढ़ी को क्या देंगे, ये नहीं सोच रहे. आवश्यकता है कि समाज ने जो दिया है, हम उसे लौटा दें. युवाओं को उनकी साफ सलाह है कि वे बॉलीवुड में हीरो नहीं बल्कि एक्टर बनने के लिए आएं.

केवल एक्टर बनने के लिए आएंगे तो निराशा हाथ मिल सकती है. नए इस्तेमाल हो रहे हैं, उनका भाग बनकर भी युवा अपना मुकाम हासिल कर सकते हैं.

अब तो जिंदगी केवल दो मिनट की हो गई है. सभी को सब कुछ जल्दी जल्दी चाहिए. संगीत, भोजन  कला में इसके कारण कई परिवर्तन आए हैं. जब आरंभ की थी तो मेरे पास च्वाइस नहीं थी जो मिला उसको लपक लिया. जब चाहत समाप्त होने के बाद जागती है तो उसका अलग ही मजा है.

गोलमाल काल्पनिक चरित्र है  आंखो देखी और कड़वी हवा हमारे आसपास के चरित्र हैं. दर्शक अब आंखो देखी, कड़वी हवा  मशान जैसी फिल्में देखना चाहते हैं. जिंदा रहने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि खुद को सक्रिय रखिए. जब तक हम सक्रिय हैं तब तक युवा हैं. जानना प्रारम्भ किजिए  सुनने की क्षमता रखिए.

कहते हैं कि हर किसी की बॉयोपिक नहीं बन सकती है. जिसकी जिंदगी में कहानी है, ड्रामा है  रोमांच है वही बॉयोपिक सभी के लिए आकर्षण का केंद्र होती है. चकाचौंध वाली जिंदगी का नाम है संजय दत्त. संजय दत्त की बॉयोपिक में रणवीर कपूर ने शानदार कार्य किया है. रणवीर ने संजय दत्त के बॉयोपिक को पर्दे पर बेहतरीन ढंग से जीवंत किया है. ऐसी फिल्मों से बॉक्स कार्यालय पर कई भ्रम टूट रहे हैं  कुछ नए भ्रम बन भी रहे हैं.
मिश्रा की ख्वाहिश है कि उनकी पहचान कलाकार के रूप में ही रहे. कहते हैं कि जीना  मरना इसी रूप में चाहता हूं. मुझे जो भूमिका मिला, पूरी गंभीरता से किया. जब ताकत थी तो कार्य नहीं था, आज ताकत नहीं है तो कार्य है.

कहते हैं ना कि  चाहत समाप्त होने के बाद जब जागती है तो उसका अलग मजा है. उनकी एक ख़्वाहिश यह भी है कि वे साईं बाबा की किरदार निभाएं, जिसमें उनके मानवीय  कल्याणकारी पक्ष को दर्शाया जाए.

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