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लोकतंत्र को ऐसे मत मूल्यांकित कीजिए

-रु39याीतला सिंह
इधर एक दे-रु39या, एक चुनाव का नारा लगातार चर्चाओं में है, जबकि उत्तर प्रदे-रु39या की योगी आदित्यनाथ सरकार की राय है कि
इस नारे में स्थानीय निकायों को भी -रु39याामिल किया जाये और प्रदे-रु39या विधानसभा का अगला चुनाव 2024 के
लोकसभा चुनाव के साथ कराया जाये। यह तभी संभव होगा, जब वर्तमान प्रदे-रु39या विधानसभा का कार्यकाल दो व-ुनवजर्या
और ब-सजय़े। यह पूरी तरह अनुचित व असंवैधानिक होगा, इसीलिए मुख्य विपक्षी सपा के अध्यक्ष अखिले-रु39या यादव ने पूछा है कि
अगला विस चुनाव 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ ही क्यों न हो? इससे इतना ही तो होगा कि वर्तमान
विधानसभा का कार्यकाल दो व-ुनवजर्याों में सिमट जायेगा। एक दे-रु39या, एक चुनाव के पीछे दिया जा रहा मुख्य तर्क चुनावों
पर खर्च का है। कहा जा रहा है कि इससे एक ही खर्चे में दोनों चुनाव हो पायेंगे और बचत विकासकार्यों में लग
सकेगी। लेकिन सवाल है कि क्या हमने लोकतांत्रिक -रु39याासनपद्धति को सस्ती होने के कारण चुना है? इस लिहाज से तो
राज-रु39यााही या ताना-रु39यााही ही सर्वोत्तम हैं, जिनमें एक ही व्यक्ति सारे निर्णायक दायित्व निभा देता है और संसद या
विधानमण्डलों के चुनाव की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन जिन भी दे-रु39याों में ये -रु39यााहियां हैं, उनका रूप हिन्दू
पद-ंउचयपाद-रु39यााही का हो, सर्वहारा का, एक पार्टी -रु39याासन का या कोई और, लोग उन्हें गले लगाने के बजाय त्याग ही रहे
हैं। इस्लाम में खलीफा को आद-रु39र्या मानकर पूरी व्यवस्था उसे ही सौंपी जाती थी, लेकिन इस्लाम की स्थापना के
बाद वह खलीफा राज भी 28 व-ुनवजर्याों ही चल सका। इसी तरह एकदलीय -रु39याासनपद्धति सर्वथा स्वीकार्य होती तो किसी भी दे-रु39या
में आन्तरिक विद्रोह नहीं पनपता और दूसरे दे-रु39या के सैनिक हस्तक्षेप के बगैर उसकी स्थिति परिवर्तित ही नहीं होती।
हां, लोकतांत्रिक विचारों में भी पूर्ण साम्य नहीं है। ब्रिटेन के सबसे पुराने लोकतंत्र में अभी भी
-रु39यलोकतांत्रिक-रु39य प्रधानमंत्री की सरकार का प्रमुख राजा ही होता है। अमेरिका में भारत की भांति स्थायी कार्यपालिका,

अराजनीतिक होना जिसका गुण बताया जाता है, नहीं है। वहां राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन समग्र व्यवस्था का परिवर्तन
माना जाता है और निर्वाचित व्यवस्था ही कार्यपालिका में अपने सहयोगियों का नियमन व नियंत्रण करती है। लेकिन
दुनिया की सभी लोकतंत्र समर्थक व्यवस्थाएं इसे स्वीकार नहीं करती। कई में राजव्यवस्था को संविधान के
प्रावधानों के अनुसार संचालित करने का दायित्व स्थायी कार्यपालिका का है, जबकि राजनीतिक सरकारें आती-ंउचयजाती रहती
हैं। भारतीय संविधान में केन्द्र और राज्य दो अलग तत्व माने गये हैं। इनमें राज्य मुख्य -रु39याक्ति है और केन्द्र
उनका संघ। माना जाता है कि धर्म व विचारों की बहुलता और आस्थाओं की भिन्नता वाले इस दे-रु39या में राज्यों
का स्वरूप जनता की अलग-ंउचयअलग इच्छाओं के कारण एक जैसा नहीं हो सकता। इसीलिए जहां 80 लोकसभा सदस्य चुनने वाला
उत्तर प्रदे-रु39या जैसा बड़ा राज्य है, पूर्वोत्तर क्षेत्रों में निहायत छोटे-ंउचयछोटे राज्य भी हैं। विचारों और
स्वार्थों की भिन्नताओं के फलस्वरूप उस क्षेत्र में कई छोटे राज्य स्थानीय जनता की आव-रु39ययकताओं के अनुसार
बनाये गये हैं।इतिहास में जायें तो भा-ुनवजयाावार राज्यों के गठन के वक्त समस्त हिन्दी क्षेत्र को एक नहीं माना गया,
क्योंकि क्षेत्र की संस्कृति, वैचारिकता, रहन-ंउचयसहन, जीवनद-रु39र्यान और बोलियों में अन्तर थे। तब इस वैविध्य का बने रहना
आव-रु39ययक माना गया और इसके लिए जो राज्य थे, उनकी समाप्ति से परहेज किया गया। कभी आज का विदर्भ क्षेत्र भी मध्य
प्रदे-रु39या में था और उसकी राजधानी नागपुर में थी। बाद में उसे विभाजित करके मराठीबहुल महारा-ुनवजयट्र में -रु39याामिल
कर दिया गया, जबकि मध्य प्रदे-रु39या आज भी कायम है और दे-रु39या के बड़े भू-ंउचयक्षेत्रों में से एक है। यकीनन, लोकसभा,
विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ हों तो चुनाव खर्च बहुत घट जायेगा, लेकिन क्या इसके
लिए उन सिद्धान्तों, मान्यताओं, वि-रु39यवासों और स्वार्थों की बलि ली जा सकती है, जिनके आधार पर कभी केन्द्र, राज्य
और स्थानीय निकायों का गठन किया गया था? क्या अब उन सिद्धांतों की आव-रु39ययकता नहीं रह गई है?1975 में
संकटकाल में कुछ इन्दिरा समर्थकों ने कहा था कि सु-रु39याासन के लिए बेहतर होगा कि राज्यों में विधानसभाएं हों
ही नहीं, केन्द्र का ही -रु39याासन हो। तब विभिन्न दलों ने बड़े पैमाने पर इस विचार का विरोध किया और कहा था कि
राज्य नामक संस्था की स्वतंत्रताएं, अधिकार और कार्यप्रणाली केन्द्र से भिन्न नहीं होनी चाहिए क्योंकि एकल
चुनावपद्धति या -रु39याासन व्यवस्था वृहत्तर लोकभावना की पूरक और समर्थक नहीं है। चूंकि इस विरोध का -रु39यामन आसान
नहीं था इसलिए उसे और आगे नहीं ब-सजय़ाया गया। महारा-ुनवजयट्र के मुख्यमंत्री अब्दुलरहमान अन्तुले इस विचार के प्रमुख
प्रचारक थे, लेकिन वे इसके लिए ज्यादा समर्थन नहीं जुटा सके। उनका यह तर्क भी स्वीकार नहीं हुआ कि दे-रु39या के लिए
रा-ुनवजयट्रपति -रु39याासनप्रणाली ही सबसे उपयुक्त है, जिसमें वास्तविक -रु39याासक पूरे दे-रु39या की जनता का वि-रु39यवासप्राप्त होगा। वे कहते थे
कि विद्यमान चुनावपद्धति मतों के बिखराव के बीच उनकी सबसे बड़ी -सजयेरी पाने वाले की जीत पर आधारित है। इसमें ऐसे
व्यक्ति भी चुन लिये जाते हैं, जो अपनी जमानत तक नहीं बचा पाते। दू-िुनवजयात चुनावपद्धति का ही परिणाम है कि अभी तक
केन्द्र में कभी बहुमत के समर्थन वाली सरकार नहीं आ सकी। इसके बावजूद अभी तक न तो चुनावपद्धति बदली गई
और न रा-ुनवजयट्रपति -रु39याासनप्रणाली ही स्वीकार्य हो सकी। इस समय जो लोग एक साथ लोकसभा और विधानसभाओं के
चुनाव कराये जाने के लिए अभियान चला और तर्क जुटा रहे हैं, उनके नायकों के बारे में कहा जाता है कि वे
लोकतंत्र को गुण के रूप में स्वीकार नही करते। करते तो कम से कम उनकी पितृ संस्थाएं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर
आधारित होतीं ही और व्यक्ति, जाति या धर्म पर श्रे-ुनवजयठता ही उनका गुण नहीं होता।
फिर एक दे-रु39या, एक चुनाव के साथ यह अंदे-रु39याा भी जुड़ा हुआ है कि इसमें कोई एक ऐसा नेता तो पूरे दे-रु39या में
स्वीकार्यता और पहुंच बना लेगा, लेकिन उसकी -रु39यआभा-रु39य में कितने ही छोटे या नये नेता अप्रासंगिक व अस्वीकार्य करार
दिये जाने के कारण हा-िरु39याये में चले जायेंगे। तब भा-ुनवजयाा, जाति, धर्म या क्षेत्रीय आव-रु39ययकताओं पर आधारित दलों के
सामने भी यह प्र-रु39यन उठेगा कि वे रा-ुनवजयट्रीय मुद्दों से जुड़ें या क्षेत्रीय हितों को ही निर्णायक बनाये रखें। लोकतंत्र
में समान सोच की एकरूपता निर्णायक नहीं हो सकती इसलिए एक दे-रु39या, एक चुनाव के बाद भी स्थानीय नेतृत्वों और
सरकारों के खिलाफ विभिन्न मुद्दों पर विक्षुब्धों के आन्दोलन होंगे ही। उनके आधार पर सरकारों का वि-रु39यवास
भी आता-ंउचयजाता ही रहेगा। तब एक साथ चुनाव की बाध्यता के कारण क्या रा-ुनवजयट्रपति -रु39याासन ही सारी असहमतियों का जवाब
होगा? यदि नहीं तो एक साथ चुनाव कैसे होगा या स्थानीयताओं, उनसे जुड़े विचारों व स्वतंत्रताओं के महत्व
की रक्षा कैसे हो पायेगी? नहीं हो पायेगी तो उससे कितने वि-ुनवजयाफल पैदा होंगे? अभी तो दे-रु39या के केन्द्र में भी
सारी सरकारें पांच व-ुनवजर्या तक नहीं चल पा रही हैं। 1977 में चुनी गई जनता पार्टी सरकार गिरी, तो 1980 में

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लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हुए। फिर 1989 में चुनी गई नवीं लोकसभा में वि-रु39यवनाथप्रताप सिंह व चन्द्र-रु39योखर
सरकारों के पतन के बाद 1991 में फिर लोकसभा चुनाव कराये गये। ऐसे ही 1996 के बाद 1998 और फिर 1999 में
भी लोस चुनाव हुए।
जाहिर है कि एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में चुनाव खर्च का तर्क देने वाले सम-हजयते नहीं हैं कि लोकतांत्रिक
-रु39याासनपद्धति की स्वीकार्यता या अस्वीकार्यता का मुख्य आधार उसका सस्ती या महंगी होना या कि महंगे चुनाव नहीं हैं।
ठीक है कि चुनावों में सबसे ज्यादा कालाधन ही प्रयुक्त होता है और राजनीतिक दलों में भी साम्य व एकरूपता नहीं
है। फिर भी लोकतांत्रिक -रु39याासनपद्धति की स्वीकार्यता व सार्थकता को चुनाव खर्चों के आधार पर मूल्यांकित करना
किसी भी दृ-िुनवजयट से उचित नहीं है।
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