Tuesday , August 14 2018
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आसिफ के बिना इंडियन सिनेमा का हर इतिहास अधूरा

आसिफ की फ़िल्म ‘मुगल-ए-आजम’ इंडियन सिनेमा के सिर का ताज है. यह अपने दौर की सबसे बड़ी  यादगार फ़िल्मों में शुमार है. हिंदी सिनेमा के सौ वर्ष के इतिहास में अगर शीर्ष की पांच फ़िल्में चुनी जायें तो ‘मुगल-ए-आजम’ का नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा. हिंदी सिनेमा को यह माइलस्टोन फ़िल्म देने वाले डायरेक्टर के आसिफ का आज बर्थडे है.अगर वो आज हमारे बीच होते तो अपना 96 वां जन्मदिन मना रहे होते.

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के आसिफ का पूरा नाम था करीमुद्दीन आसिफ. उनका जन्म 14 जून, 1922 को हुआ था  9 मार्च, 1971 को वह इस संसार से रुख्सत हो गए. लेकिन, उन्होंने अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ दी कि जब तक धरती रहेगी लोगों की ज़ुबान पर ‘मुगल-ए-आजम’ का नाम रहेगा! के आसिफ निर्देशित इस फ़िल्म ने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के कई लोगों को प्रभावित किया, जिनमें संजय लीला भंसाली प्रमुख हैं. वे बताते हैं कि उन्होंने ‘बाजीराव मस्तानी’ इसी फ़िल्म को ट्रिब्यूट देने के लिए बनाई. इस फ़िल्म के क्लासिक शीशमहल दृश्य की प्रेरणा ना सिर्फ बाजीराव मस्तानी, बल्कि ‘प्रेम रतन धन पायो’ में भी ली गयी है. ‘मुगल-ए-आजम’ से जुड़ी एक दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म में युवा दिलीप कुमार का भूमिका निभाने के लिए उस्ताद जाकिर हुसैन से बात की गयी थी, लेकिन बाद में बात नहीं बन पायी तो यह भूमिका जलाल आगा ने निभाया. दिलीप कुमार के लिए भी यह फ़िल्म उनके कैरियर की सबसे महान फ़िल्मों में शामिल है.

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कहा जाता है, कि इस फ़िल्म के निर्माण में के आसिफ इस कदर अपनी आर्थिक स्थिति को बिगाड़ चुके थे, कि उन्होंने पान  सिगरेट भी क्रेडिट पर लेना प्रारम्भ कर दिया था. फ़िल्म में कृष्ण की जो मूर्ति प्रयोग की गई है, वो शुद्ध सोने से बनी थी. इससे पहले किसी फ़िल्म में इस तरह बारीकियों का ख्याल नहीं रखा गया था. बता दें कि फ़िल्म के गीत ‘मोहब्बत जिंदाबाद’ में मोहम्मद रफ़ी ने 100 कोरस सिंगर्स के साथ यह गाना गाया था. ऐसी कई कहानियां इस फ़िल्म को लेकर सुनने को मिलती हैं. इसीलिए ‘मुगल-ए-आजम’ सिनेमा की संसार का मास्टर पीस मानी जाती है. फ़िल्म में दिलीप कुमार, मधुबाला  पृथ्वीराज कपूर के भूमिका आज भी क्लासिक माने जाते हैं.

निर्देशक के आसिफ की फ़िल्म ‘मुगल-ए-आजम’ जिन्होंने देखी है, उन्हें इसका ये गाना ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ जरूर याद होगा. भव्य सेट में लगे शीशों में नृत्य करती अभिनेत्री मधुबाला के अक्स को देखकर दर्शक शीशमहल की शानो-शौकत से दंग रह गए थे. यूपी के इटावा से निकले आसिफ ने मुंबई में एक ही फ़िल्म से ऐसा डंका बजाया कि उनके नाम के बिना सिनेमा का हर इतिहास अधूरा है!

मंटो ने के आसिफ के बारे में एक स्थान लिखा है कि उन्होंने कुछ ख़ास किया तो नहीं था, पर खुद पर भरोसा इतना था कि सामने वाला हर इंसान घबरा जाता था. के आसिफ ने अपने ज़िंदगी में सिर्फ दो फ़िल्में ही बनाई. ‘फूल’ (1945)  ‘मुगल-ए-आजम’ (1960). उनकी पहली फ़िल्म तो कोई कमाल नहीं कर सकी लेकिन दूसरी फ़िल्म ‘मुगल-ए-आजम’ पर इतने फूल बरसे जिसकी महक आज भी ताज़ा है!

इस फ़िल्म को बनाने में उन्हें 14 वर्ष लगे थे. ‘मुग़ल-ए-आज़म’ उस दौर की सबसे महंगी फ़िल्म थी, जिसकी लागत तक़रीबन 1.5 करोड़ रुपये बताई जाती है. फ़िल्म से जुड़ा एक यह किस्सा भी बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है कि जब फ़िल्म के एक दृश्य में पृथ्वीराज कपूर को रेत पर नंगे पांव चलना था  उस दृश्य की शूटिंग राजस्थान में हो रही थी जहां की रेत तप रही थी.उस दृश्य को करने में पृथ्वीराज कपूर के पांव पर छाले पड़ गए थे. जब ये बात के आसिफ को पता चली तो उन्होंने भी अपने जूते उतार दिए  नंगे पांव गर्म रेत पर कैमरे के पीछे चलने लगे. इस तरह के समर्पण के कई किस्से फ़िल्म से जुडी हुई हैं!

एक यह किस्सा भी बहुत ज्यादा मशहूर है कि संगीतकार नौशाद इस फ़िल्म के लिए बड़े अधीन अली साहब की आवाज़ चाहते थे, लेकिन अधीन अली साहब ने ये कहकर मना कर दिया कि वो फ़िल्मों के लिए नहीं गाते. लेकिन, के आसिफ ज़िद पर अड़ गए कि गाना तो उनकी ही आवाज में रिकॉर्ड होगा. उनको मना करने के लिए अधीन साहब ने कह दिया कि वो एक गाने के 25000 रुपये लेंगे. बता दें कि उस दौर में लता मंगेशकर  रफ़ी जैसे गायकों को एक गाने के लिए 300 से 400 रुपये मिलते थे. आसिफ साहब ने उन्हें बोला कि अधीन साहब आप बेशकीमती हैं, ये लीजिये 10000 रुपये एडवांस. अब अधीन अली साहब के पास कोई बहाना नहीं था. इस तरह से वो फ़िल्म में गाने को राज़ी हुए!

बहरहाल, आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि यह फ़िल्म कई लोगों के ज़िंदगी में परिवर्तन लेकर आया. इस फ़िल्म के बाद से ही दिलीप कुमार  मधुबाला का 9 वर्ष पुराना रिश्ता ख़त्म हो गया. बताते चलें कि दोनों कलाकरों ने पूरी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक दूसरे से बात तक नहीं की. इसी दौरान के आसिफ ने दिलीप कुमार की बहन अख्तर बेगम से विवाहकर ली. एक बार अख्तर बेगम  आसिफ में झगड़ा हुआ. दिलीप बचाव करने पहुंचे तो आसिफ ने कह दिया कि अपना स्टारडम मेरे घर से बाहर रखो, दिलीप कुमार उनकी इस बात से इतने नाराज हुए कि वो फ़िल्म के प्रीमियर तक में नहीं गए थे. उन्होंने ये फ़िल्म भी रिलीज़ होने के 10 वर्ष बाद देखी.

‘मुगल-ए-आजम’ यह फ़िल्म 5 अगस्त 1960 को रिलीज़ हुई थी  इसे उस वर्ष फ़िल्मफेयर से बेस्ट फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला. ‘मुगल-ए-आजम’ के बाद के आसिफ ने एक  फ़िल्म ‘लव एंड गॉड’ पर कार्य प्रारम्भ किया लेकिन, तमाम उतार-चढ़ावों से गुजरती यह फ़िल्म अधूरी ही रह गई!

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