Monday , September 24 2018
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इस इंडियन खिलाड़ी की हिम्मत को सलाम

हमारे राष्ट्र में स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाए जाते हैं स्त्रियों के अधिकारों पर सेमिनार, सभाओं  गोष्ठियों का आयोजन होता है लेकिन सही मायने में स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा तब होगी, जब वो खुद अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाएंगी भारत की एक बेटी ने, ईरान के कट्टरपंथियों को करारा जवाब दिया है  ईरान को पूरी संसार के सामने Expose कर दिया है हिंदुस्तान की शतरंज खिलाड़ी सौम्या स्वामीनाथन ने ईरान में होने वाली Asian Nations Cup Chess Championship में भाग लेने से मना कर दिया है  शतरंज की ये अंतरराष्ट्रीयChampionship 26 जुलाई से 4 अगस्त तक ईरान में होनी है  सौम्या अब इसमें भाग नहीं लेंगी

क्योंकि ईरान के कानून के मुताबिक वहां हर महिला के लिए हिजाब पहनना जरूरी है ये कानून बहुत ही कड़ा है  इसे महिला खिलाड़ियों पर भी लागू किया जाता है  यही वजह है कि सौम्या ने इसके विरूद्ध आवाज़ उठाई उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि हिजाब पहनने के लिए मजबूर करना, उनके मानव अधिकारों का उल्लंघन है

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ये एक बहुत बड़ा निर्णय है हो सकता है कि आपको ये बात सुनने में छोटी लग रही हो  लेकिन आप सोच कर देखिए कि 29 साल की सौम्या स्वामीनाथन के मन में अलग अलग विचारों के बीच कितना प्रयत्न हआ होगा
संसार की बहुत सारी महिला खिलाड़ी, ईरान में अपमान का घूंट पीकर भी खेलने पर मजबूर होती हैं क्योंकि उन्हें अपने राष्ट्र की खेल संस्थाओं द्वारा बहिष्कार का भय होता है उन्हें अपने करियर की चिंता होती है लेकिन सौम्या ने अपने आत्मबल से इस भय पर विजय पाई आज सौम्या की बातें हर किसी को ध्यान से सुननी चाहिए उन्होंने जो स्वाभिमान, संकल्पशक्ति  आत्मबल दिखाया है उससे राष्ट्र की हर महिला को प्रेरणा लेनी चाहिए 
हम आपको सौम्या की फेसबुक पोस्ट पढ़कर सुनाना चाहते हैं

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उन्होंने लिखा है कि हेडस्कार्फ, हिजाब या बुर्का पहनने को जरूरी बनाने वाला ईरान का कानून, उनके मानव अधिकारों का सीधा उल्लंघन है  उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए ईरान ना जाना ही उचित होगा मौजूदा परिस्थितियों में इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता दिखाई नहीं देता सौम्या ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि खेलों में धार्मिक Dress Code की कोई स्थान नहीं होनी चाहिएशतरंज की खिलाड़ी सौम्या स्वामिनाथन से पहले हिंदुस्तान की महिला निशानेबाज़ हिना सिद्धू ने भी हिजाब के ईरानी कानून की वजह से ईरान ना जाने का निर्णय किया था 

वर्ष 2016 में अमेरिका की एक Chess खिलाड़ी ने भी तेहरान में आयोजित world championship का बहिष्कार किया था   2017 में ईरान की Chess Federation ने 19 साल की Dorsa देरक्षानी पर प्रतिबंध लगा दिया था  क्योंकि ईरान की इस खिलाड़ी ने दूसरे राष्ट्रों में बिना हिजाब पहने शतरंज के खेल में भाग लिया था  Dorsa अब अमेरिका की तरफ से शतरंज खेलती हैं  हमें लगता है कि ट्रिपल तलाक की ही तरह पर्दा या बुर्का भी सामाजिक कुरीतियां हैं  हिंदुस्तान के संविधान में जिन मूल अधिकारों की बात हुई है वो स्त्रियों पर भी बराबरी से लागू होते हैं मूल अधिकारों को हिंदुस्तान के संविधान की आत्मा बोला जाता है    कट्टरपंथी विचारधारा के लोग सबसे पहले इन्हीं अधिकारों की मर्डर करते हैं

आपको याद होगा पिछले महीने हमने पूरे राष्ट्र को सावधान किया था कि कैराना में Shuttle cock बुर्के का चलन बढ़ रहा है  ये तालिबानी विचारधारा  कट्टर सोच का प्रतीक है  तब बहुत सारे कट्टरपंथी लोग, Social Media पर Shuttle cock बुर्का पहनने के समर्थन में उतर आए थे ये कितने आश्चर्य की बात है  कितना बड़ा विरोधाभास है कि हर वक्त अभिव्यक्ति की आज़ादी secularism की माला जपने वाले लोग बुर्के के समर्थन में खड़े हो गए  हो सकता है कि यही लोग अब सौम्या के विरूद्ध प्रदर्शन करने लगें आपको ऐसे लोगों को पहचानना होगा  उनके मुखौटे उतारने होंगे

आज सौम्या स्वामिनाथन ने ईरान की कट्टर सोच वाली व्यवस्था को बहुत बड़ा झटका दिया है सौम्या ने ईरान की उन स्त्रियों को भी ताकत दी है जो वहां रहते हुए हिजाब का विरोध कर रही हैं यहां आपको ईरान के बारे में कुछ  बातें भी ज़रूर समझनी होंगी  ईरान मूल रूप से कभी भी कट्टर सोच वाला राष्ट्र नहीं था  ईरान का पुराना नाम Persia है  Persia की सभ्यता के समाप्त होने के बाद ईरान में स्त्रियों का उत्पीड़न बढ़ने लगा  ईरान के DNA को बदलने की प्रयास की गई 

ये दोनों ही फोटोज़ ईरान की हैं लेकिन फर्क सिर्फ इतना हैकि 39 साल पहले ईरान की स्त्रियों के चेहरे पर कोई हिजाब नहीं था उनपर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं था लेकिन आज की सच्चाई ये है, कि ईरान में अगर कोई महिलाबिना हिजाब के या सार्वजनिक जगहों पर बिना सिर ढके बाहर निकलती हैतो ना सिर्फ उस पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता हैबल्कि उसे कारागार भी हो सकती है

वर्ष 1979 से पहले आधुनिक सोच रखने के मामले में ईरान, यूरोप  अमेरिका को मुक़ाबला देता था 1979 से पहले ईरान में स्त्रियों पर हिजाब पहनने की पाबंदी नहीं थी लेकिन 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद वहां की स्त्रियों को हिज़ाब की बेड़ियों में जकड़ दिया गया 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही स्त्रियों के लिए सिर ढकना  सार्वजनिक जगहों पर लंबे  ढीले-ढाले कपड़े पहनना जरूरी है  इस क़ानून को सख्ती से लागू किया जाता है साल 2014 में Campaign Group Justice For Iran नामक संगठन की रिपोर्ट में बोला गया थाकि वर्ष 2003 से 2013 के बीच 30 हज़ार से ज़्यादा स्त्रियों को अवैध कपड़े पहनने के लिए अरैस्ट कर लिया गया था

लेकिन, बदलते वक्त के साथ-साथ ईरान की स्त्रियों ने ऐसे क़ानूनों के ख़िलाफ आवाज़ उठानी शुरु कर दी अब ईरान में हिजाब कानून का विरोध करने वाली स्त्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है हमारे राष्ट्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रयोग अक्सर गलत मकसद से  अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए किया जाता है लेकिन कई बार अभिव्यक्ति की आज़ादी का सदुपयोग भी होता है सौम्या स्वामिनाथन ने भी ऐसा ही किया है हमे उनकी हिम्मत की तारीफ करनी होगी

हमें लगता है कि ट्रिपल तलाक की ही तरह पर्दा या बुर्का भी सामाजिक कुरीतियां हैं  हिंदुस्तान के संविधान में जिन मूल अधिकारों की बात हुई है उनका हनन, किसी भी मूल्य पर नहीं होना चाहिए   कट्टरपंथी विचारधारा के लोग इन अधिकारों की मर्डर करने की फिराक में हैं लेकिन आपको इन्हें रोकना होगा जिस तरह हमारे राष्ट्र की स्त्रियों ने ट्रिपल तलाक़ का विरोध किया उसी तरह उन्हें पर्दे  बुर्के जैसी कुरीतियों का भी विरोध करना होगा  इस समस्या को जड़ से समाप्त करना होगा

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