Friday , June 22 2018
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मां की याचिका खारिज कर ‘बेटे’ को किया आजाद

केरल न्यायालय ने बोला है कि किसी ट्रांसजेंडर को भी समान विचार वाले आदमी के साथ घूमने या रहने का हक है  उसे मां-बाप के पास रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. जस्टिस वीचितंबरेश  जस्टिस केपी ज्योतिंद्रनाथ की पीठ ने एक ट्रांसजेंडर की मां की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की याचिका ठुकराते हुए यह निर्णय दिया.
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ट्रांसजेंडर की मां ने याचिका दायर कर दावा किया था कि उसके 25 वर्षीय ‘बेटे’ को ट्रांसजेंडर समुदाय के कुछ लोगों ने गैरकानूनी तरीके से बंधक बना रखा है. इस मामले में पीठ ने सुप्रीम न्यायालय के एक निर्णय का हवाला देते हुए बोला कि इंडियन संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बोलने अभिव्यक्ति की आजादी किसी आदमी को ट्रांसजेंडर की तरह रहने का अधिकार देती है.

पिछले हफ्ते पीठ ने ट्रांस-वीमेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए मेडिकल जांच में उसे मानसिक समस्या होने की पुष्टि होने के बाद उसे अपनी ख़्वाहिश के अनुसार रहने की अनुमति दी थी. बताते चलें कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका किसी आदमी को गैरकानूनी कब्जे से छुड़ाकर आजाद करने के लिए दायर की जाती है.

इस मामले में याचिकाकर्ता ने गुहार लगाई थी कि वह अपने ‘बेटे’ को औरत के लिबास में नहीं देख सकती है  न ही उसे ‘अरुंधति’ नाम से बुला सकती है. महिला ने यह भी दलील दी कि उसके बेटे में घर वापसी के प्रति कोई रुझान नहीं है  वह दूसरे ट्रांसजेंडरों के साथ घूम रहा है जिससे उसका सेक्स बदलवाने की संभावना है.

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