Tuesday , November 13 2018
Loading...
Breaking News

-िरु39याक्षा की चिंताजनक स्थिति

आ-रु39याुतो-ुनवजया चतुर्वेदी
किसी भी दे-रु39या की आर्थिक और सामाजिक प्रगति उस दे-रु39या की -िरु39याक्षा पर निर्भर करती है. -िरु39याक्षित समाज ही आगे ब-सजय़ता है.
अच्छी -िरु39याक्षा के बगैर बेहतर भवि-ुनवजयय की कल्पना नहीं की जा सकती. अगर दे-रु39या की -िरु39याक्षा नीति अच्छी है, तो उस दे-रु39या को
आगे ब-सजय़ने से कोई रोक नहीं सकता. अगर -िरु39याक्षा नीति अच्छी नहीं होगी, तो विकास की दौड़ में वह दे-रु39या पीछे
छूट जायेगा. राज्यों के संदर्भ में भी यह बात लागू होती है. यही वजह है कि -िरु39याक्षा की वजह से हिंदी पट्टी के
राज्यों के मुकाबले दक्षिण के राज्य हमसे आगे हैं. हम सब यह बात बखूबी जानते हैं, बावजूद इसके पिछले 70
व-ुनवजर्याों में हमने अपनी -िरु39याक्षा व्यवस्था की घोर अनदेखी की है. हाल में -हजयारखंड, बिहार और सीबीएसइ समेत अनेक
बोर्डों के नतीजे आये हैं, लेकिन एक गंभीर बात उभरकर सामने आयी है कि इस बार विज्ञान में उत्तीर्ण होने
वाले छात्रों का प्रति-रु39यात बहुत कम है. बिहार में 12वीं की परीक्षा में विज्ञान में लगभग 45 फीसदी छात्र उत्तीर्ण
हो पाये हैं. यही स्थिति -हजयारखंड की है. यहां भी 12वीं में विज्ञान प-सजय़ने वाले लगभग 48 फीसदी छात्र पास हो
पाये हैं यानी बिहार और -हजयारखंड दोनों राज्यों में विज्ञान प-सजय़ने वाले आधे से अधिक छात्र फेल हो गये हैं.

यह चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि दे-रु39या के अधिकां-रु39या बच्चे विज्ञान प-सजय़ रहे हैं और इंजीनियर बनना चाहते हैं. दूसरी
ओर आइटी क्षेत्र की जानी-ंउचयमानी कंपनी टेक महिंद्रा के सीइओ सीपी गुरनानी ने बहुत गंभीर बयान दिया है.
उनका कहना था कि आइटी क्षेत्र के 94 फीसदी इंजीनियरिंग ग्रेजुएट बड़ी भारतीय आइटी कंपनियों के काबिल ही
नहीं हैं. गुरनानी कहते हैं कि नयी तकनीक के क्षेत्र में प्रवे-रु39या करना भारतीय आइटी कंपनियों के लिए बड़ी
चुनौती है, लेकिन जब इन सब बातों को देखते हुए नौकरी की बात आती है, तो बड़ी आइटी कंपनियां 94
फीसदी आइटी ग्रेजुएट भारतीयों को इसके योग्य नहीं पाती हैं. गुरनानी का कहना हैं कि नासकॉम के अनुसार
2022 तक साइबर सुरक्षा में लगभग 60 लाख लोगों की जरूरत पड़ेगी, लेकिन हमारे पास दक्ष लोगों की कमी है. दे-रु39या
के लिए ये संकेत अच्छे नहीं हैं. दे-रु39या में अब भी बहुत बड़ी संख्या में बच्चे इंजीनियरिंग की प-सजय़ाई करत रहे हैं.
हालांकि पहले की तुलना में इसमें कमी आयी है. इसकी एक वजह गली-ंउचयकूचे में खुले इंजीनियरिंग कॉलेज तो हैं ही,
इंजीनियरों की मांग में भारी कमी भी इसकी वजह है. तकनीकी -िरु39याक्षा की नियामक संस्था ऑल इंडिया काउंसिल फॉर
टेक्नघ्किल एजुके-रु39यान के अनुसार हाल में लगभग 200 इंजीनियरिंग कॉलेजों ने बंद करने के लिए आवेदन किया है. इन
कॉलेजों के बंद हो जाने के बाद इंजीनियरिंग की तकरीबन 80 हजार सीटों में कमी आ जायेगी. ऐसा आकलन है कि
पिछले चार व-ुनवजर्याों में इंजीनियरिंग कॉलेजों में तकरीबन 3.1 लाख सीटें कम हुईं हैं, क्योंकि इंजीनियरिंग की
प-सजय़ाई करने वाले छात्रों की संख्या में लगातार कमी आ रही है. एआइसीटीइ के अनुसार इंजीनियरिंग की प-सजय़ाई करने
वाले हर साल लगभग 75 हजार छात्र कम हो रहे हैं. कुल मिलाकर, हालात यह बता रहे हैं कि -िरु39याक्षा व्यवस्था में व्यापक
सुधार का वक्त आ गया है. आप गौर करें कि हमारे यहां हर साल एक कहानी दोहरायी जाती है कि किसी-ंउचयन-ंउचयकिसी बोर्ड
में कोई परचा लीक हो जाता है. इस बार सीबीएसइ की 12वीं की परीक्षा में पर्चा लीक हुआ और बच्चों को
अर्थ-रु39याास्त्र का इम्तिहान दोबारा देना पड़ा. पेपर लीक करने के पीछे कोई गैंग पूरी योजनाबद्ध तरीके से काम करता
है और हमारी व्यवस्था उससे निबटने में नाकामयाब रहती है, लेकिन हम इससे सबक लेते नजर नहीं आते. अक्सर हम बोर्ड
परीक्षाओं की अनियमितताओं पर रोकने में असफल हो जाते हैं. यह खबर न केवल बच्चों, बल्कि उनके माता-ंउचयपिता के
लिए भी तनाव पैदा करती है. ये परीक्षाएं कितनी अहम हैं कि इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों को
परीक्षा दिलवाने के लिए माता-ंउचयपिता अपने दफ्तरों से छुट्टी लेते हैं. हम सब जानते हैं कि 10वीं और 12वीं की
परीक्षाओं को लेकर बच्चे भारी तनाव में रहते हैं. कई बार यह तनाव दुखद हादसों को जन्म दे देता है, लेकिन
हमारी व्यवस्था बच्चों के भवि-ुनवजयय से खिलवाड़ करने वाले अपराधियों को कड़ी सजा नहीं दिलवा पाती. हमारे
विभिन्न बोर्ड में कोई एकरूपता भी नहीं है. सीबीएसइ के छात्रों के नंबर देखिए. उन्हें कितनी उदारता से नंबर
दिये जाते हैं. टॉपर 500 में 499 नंबर ला रहे हैं. 90 फीसदी नंबर लाने वाले बच्चों की संख्या बड़ी है. विज्ञान
को तो छोड़िए, आर्टस के बच्चे भी 100 में 100 नंबर लाते हैं. दूसरी ओर बिहार और -हजयारखंड बोर्ड के
नंबरों से उनकी तुलना करें, तो वे आसपास भी नहीं है. बिहार और -हजयारखंड के -िरु39याक्षकों की कड़ाई से नंबर
देने की आदत अभी तक छूटी नहीं है. नतीजा यह होता है दिल्ली वि-रु39यवविद्यालय जैसे संस्थानों में जहां प्रवे-रु39या का
एक बड़ा आधार नंबर होते हैं, वहां सीबीएसइ बोर्ड के बच्चों का बोलबाला रहता है. हम सब यह बात जानते हैं कि
बच्चों का प-सजय़ाना कोई आसान काम नहीं है. बच्चे, -िरु39याक्षक और अभिभावक -िरु39याक्षा की तीन महत्वपूर्ण कड़ी
हैं. इनमें से एक भी कड़ी के -सजयीला पड़ने पर पूरी व्यवस्था गड़बड़ा जाती है. हालांकि -िरु39याक्षक -िरु39याक्षा व्यवस्था
की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी हैं. -िरु39याक्षा के बाजारीकरण के इस दौर में न तो -िरु39याक्षक पहले जैसे रहे और न ही
छात्रों से उनका पहले जैसा रि-रु39यता रहा. पहले -िरु39याक्षक के प्रति न केवल विद्यार्थी, बल्कि समाज का भी आदर और कृतज्ञता का
भाव रहता था. अब तो ऐसे आरोप लगते हैं कि -िरु39याक्षक अपना काम ठीक तरह से नहीं करते. इसमें आं-िरु39याक सच्चाई भी
है कि बड़ी संख्या में -िरु39याक्षकों ने दिल से अपना काम करना छोड़ दिया है. वे अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर रहे
हैं. इसकी रोकथाम के उपाय करने होंगे, अध्यापकों को जवाबदेह बनाना होगा. परीक्षा परिणामों को उनके
परफॉर्मेंस और वेतनवृद्धि से जोड़ना होगा, पर यह भी सच है कि प्र-रु39याासन लगातार -िरु39याक्षकों का इस्तेमाल गैर -रु39यौक्षणिक
कार्यों में करता है. प्र-रु39याासनिक अधिकारी -िरु39याक्षा और -िरु39याक्षकों को हेय दृ-िुनवजयट से देखते हैं. यही नहीं, किसी भी
दे-रु39या के भवि-ुनवजयय निर्माता कहे जाने वाले -िरु39याक्षक का समाज ने भी सम्मान करना बंद कर दिया है. उन्हें दोयम दर्जे का
स्थान दिया जाता है. आप गौर करें तो पायेंगे कि टॉपर बच्चे प-सजय़ लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर और प्र-रु39याासनिक अधिकारी तो

Loading...

बनना चाहते हैं, लेकिन कोई -िरु39याक्षक नहीं बनना चाहता. साथ ही, इस दे-रु39या का यह दुर्भाग्य है कि -िरु39याक्षा कभी
चुनावी मुद्दा नहीं बनती. इसी उपेक्षा ने हमारी -िरु39याक्षा को भारी नुकसान पहुंचाया है.
0000

loading...
Loading...
loading...