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बुज़ुर्गों का तर्क है कि मिल-जुलकर खाने से होती बरकत

बुज़ुर्ग अक्सर कहते हैं खाना हमेशा सबके साथ मिल-बांट कर खाना चाहिए. तन्हा खाना अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. बुज़ुर्गों का तर्क है कि मिल-जुलकर खाने से बरकत होती है. लेकिन मॉडर्न रिसर्च बताती हैं कि हम ग्रुप में बैठ कर ज्यादा खाना खाते हैं. हम उन व्यंजनों का जायका भी ले लेते हैं, जिन्हें हम अकेले में शायद कभी ना खाएं.Image result for बुज़ुर्गों का तर्क है कि मिल-जुलकर खाने से होती बरकत

वैसे साथ मिलकर खाने का चलन बहुत पुराने जमाने से रहा है. जब इंसान शिकार करके पेट पालता था, तब भी वो झुंड में बैठकर खाता था. रिसर्च तो ये भी साबित करती है कि अकेले खाना खाने से इंसान डिप्रेशन  तनाव का शिकार हो जाता है. कहते हैं कि साथ बैठने-उठने वालों के खान-पान की आदतें भी हम पर अपना प्रभाव डालती हैं.

हेल्थ मनोचिकित्सक जॉन दी कास्त्रो ने वर्ष 1994 में करीब 500 लोगों पर रिसर्च की. इस रिसर्च सैम्पल में अकेले खाना खाने वाले  लोगों के साथ खाने वाले दोनों शामिल थे. पाया गया कि ग्रुप में खाने वालों ने खाना ज्यादा खाया. एक  रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि ग्रुप में खाने वाले 40 फीसद लोग ज्यादा आइसक्रीम खाते है. 10 फीसद लोगों ने मैक्रोनी ज्यादा खाई. जबकि जो लोग अकेले बैठ कर खाना खाते हैं वो इन चीजों को कई मर्तबा हाथ तक नहीं लगाते.

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क्या है वजह?

क्या वजह है कि जब हम किसी  के साथ खाना खाते हैं तो ज्यादा खा लेते हैं? कास्त्रो के मुताबिक जब कई लोग मिलकर खाते हैं, तो खाने के साथ गुफ्तगू का दौर भी चलता रहता है. जिसके चलते हमारा हाथ कई बार खाते-खाते रुकता जाता है. इससे खाने का समय बढ़ जाता है.

बड़े समूहों में खा रहे लोग  ज्यादा वक्त लगाते हैं जिसके चलते जहन तक पेट भरने का संदेश नहीं पहुंच पाता. जबकि जो लोग छोटे ग्रुप में खाते हैं या अकेले खाना खाते हैं, वो जल्दी अपना खाना समाप्त कर लेते हैं. इस तरह वे ज्यादा खाना खाने से बच जाते हैं.

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वर्ष 2006 में इसी तरह का एक  इस्तेमाल किया गया. करीब 132 लोगों को खाने के लिए एक निश्चित समय दिया गया. सभी प्रतिभागियों को दो या चार के ग्रुप में बांटा गया था, जबकि कुछ को तन्हा छोड़ा गया. लेकिन रिसर्च के नतीजों ने साबित किया कि समय सीमा होने की वजह से सभी ने लगभग बराबर मात्रा में खाना खाया.

इससे साबित होता है कि जब हम खाने में समय ज्यादा देते हैं, तो खाते भी ज्यादा है. अक्सर समारोह के दौरान जब बहुत से लोग इकट्ठा होते हैं, तो सभी के साथ घूमते-फिरते कुछ ना कुछ खाते रहते हैं.इस थोड़े-थोड़े खाने में ही हम अपनी भूख से ज्यादा खा लेते हैं,  इसका हमें अंदाजा तक नहीं होता.

कुछ जानकारों का कहना है कि सिर्फ सोशल ग्रुप ही हमें ज्यादा खाने के लिए मजबूर नहीं करते.बल्कि कई मर्तबा अकेले बैठे लोग ज्यादा खा लेते हैं. कई लोग तो अजनबियों के साथ बैठकर भी ज्यादा खा लेते हैं. मिसाल के लिए जापान में की गई एक रिसर्च के दौरान कुछ लोगों को आईने के सामने या दीवार के सामने बैठकर पॉप-कॉर्न खाने को बोला गया. आईने के सामने पॉप-कॉर्न खाने वालों ने अपना खाना ज्यादा मजे लेकर खाया. शायद इसीलिए ज्यादातर रेस्टोरेंट चारों तरफ आईने लगाए रखते हैं, ताकि ग्राहक ज्यादा खाए,  ज्यादा खाने का ऑर्डर दे.

हरेक रिसर्च के नतीजे सौ फीसद सही हों ऐसा भी नहीं है. कुछ स्टडी दावा करती हैं कि ग्रुप में लोग कम खाते हैं. दरअसल जब हम तन्हा खाना खाते हैं, या किसी ऐसे शख्स के साथ खाना खाते हैं, जिसके खाने की आदतों से हम वाकिफ हैं, तो बेतकल्लुफ होकर खाते हैं. जबकि ग्रुप में जितने लोग होते हैं, उनकी खाने की आदतें अलग-अलग होती हैं. सभी संकोच में रहते हैं. कहीं ना कहीं दिमाग में सोच होती है कि मेरे खाने की आदत के बारे में सामने वाला कोई गलत राय कायम ना कर ले.

ऐसी बहुत सी स्टडी हैं जो ये साबित करती हैं कि मोटापे का शिकार बच्चे ग्रुप के बजाय अकेले में ज्यादा खाते हैं. इसी तरह जब मोटापे का शिकार नौजवान अपने ही जैसे वजनी लोगों के साथ होते हैं, तो चिप्स  बिस्कुट ज्यादा खाते हैं. शायद उन्हें तसल्ली रहता है कि वही अकेले मोटापे का शिकार नहीं हैं. लेकिन जब यही लोग दुबले-पतले लोगों के साथ होते हैं तो कम खाते हैं.

यही बात स्त्रियों में भी देखी गई है. जब महिलाएं मर्दों के साथ खाना खाती हैं तो कम कैलरी वाली चीजें खाती हैं. लेकिन जब सिर्फ स्त्रियों की साथ खाना खाती हैं तो बिना किसी परहेज के सब-कुछ खाती हैं. लिहाजा बोला जा सकता है कि समाज के तौर तरीके हमारे खान-पान की आदतों पर प्रभावडालते हैं. लेकिन ये किस हद तक प्रभाव डालते हैं, इस बारे में कोई रिसर्च अभी तक नहीं हुआ है.

ब्रिटेन की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुजैन हिग्स कहती हैं कि ग्रुप में बैठ कर खाने से बच्चों की आदतों पर गहरा प्रभाव पड़ता है. वो संतुलित आहार लेते हैं. बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है कि वो अपने बड़ों से खाने का तौर-तरीका सीखे. खास तौर से जो लोग लंबे वक्त तक जीते हैं, उनके खाने की आदतों पर जरूर गौर करना चाहिए.

आज जिस तरह की दावतें दी जाती हैं, उसमें ज्यादातर ऐसा खाना परोसा जाता है जो मोटापे को जन्म देता है. लोग भी मोटापे के खौफ से बेखबर जमकर खाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के आंकड़े बताते हैं कि संसार भर में करीब एक अरब लोग मोटापे का शिकार हैं. इनमें तीस करोड़ 40 लाख बच्चे शामिल हैं.

खाने की सही आदतें अपनाने के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, कि हम अपने दोस्तों का साथ छोड़ दें अकेले बैठ कर खाना प्रारम्भ कर दें. बल्कि हमें खुद इस बात का ध्यान देना चाहिए कि हम क्या खा रहे हैं  कितना खा रहे हैं. अगर कहीं पार्टी में जा रहे हैं तो भी ये सोच कर मत जाइए कि वहां जायकेदार पकवान मिलेंगे तो जमकर खाएंगे. याद रखिए अन्न पराया है, लेकिन पेट तो आपका अपना है. अच्छी स्वास्थ्य के लिए खाने पर कंट्रोल करना बहुत महत्वपूर्ण है.

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