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गैर भाजपाई वोटों को लामबंद करने की कवायद में है बसपा

मध्य प्रदेश में पांच माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी विरोधी वोट को लामबंद करने की कवायद तेज हो गई है. यूपी के सीमावर्ती  बसपा (बसपा) के प्रभाव वाले जिलों में कांग्रेस पार्टी ने बीएसपी से समझौता के कोशिश तेज कर दिए हैं. 2013 के चुनाव में बीएसपी 4 सीटें जीतकर करीब एक दर्जन सीटों पर दूसरे जगह पर थी. यही वजह है कि बीएसपी की ताकत को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने वोटों का बिखराव रोकने का फैसला किया है.

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बसपा के असर वाले जिले

पिछले चुनाव में मुरैना जिले के अंबाह  दिमनी में बीएसपी ने जीत दर्ज की थी. इसके अतिरिक्त रैगांव (सतना)  मनगवां (रीवा) सीट भी उसके खाते में आईं. रीवा जिला मुख्यालय पर बीएसपी प्रत्याशी दूसरे जगह पर था. 12-13 सीटें ऐसी थीं जहां बीएसपी छोटी अंतर से ही पीछे रही. इनके अतिरिक्तसीधी, सिंगरौली, कोलारस, श्योपुर, अशोकनगर, भिंड, ग्वालियर ग्रामीण, दतिया, रीवा, सतना, छतरपुर  टीकमगढ़ जिले की सीटों पर बीएसपी नतीजे प्रभावित करने की स्थिति बना चुकी है.

बसपा को बढ़त दिलाने वाले फैक्टर

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बीएसपी का जनाधार बढ़ाने वाले कारणों में मुख्य रूप से उसका जातिगत वोट बैंक है. खासतौर पर अनुसूचित जाति वर्ग के जाटव  अहिरवार समाज में उसकी जबरदस्त पैंंठ है. मुरैना, भिंड  विंध्य के कुछ जिलों में बीएसपी ने सवर्ण जातियों विशेष रूप से ब्राह्मण समाज को अपने टिकट पर मैदान में उतारा. परशराम मुद्गल, बलवीर दंडोतिया अथवा रीवा में केके गुप्ता इसके उदाहरण हैं. कुछ  सीटों पर बीएसपी ने यह इस्तेमाल दोहराया. इससे क्षेत्रीय  जातिगत समीकरण उसके पक्ष में रहे. बीएसपीका टिकट पाने वाले सवर्ण नेता की पृष्ठभूमि कांग्रेस पार्टी अथवा बीजेपी की रही जिससे उसे लोकल पूर्व पार्टी के जनाधार का फायदा मिला. जातिगत वोट के अतिरिक्त बीएसपी का पारंपरिक वोट भी उसके खाते में जुड़ गया. इस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों में त्रिकोणीय अथवा चतुष्कोणीय मुकाबले की स्थिति में बीएसपी फायदे में रही.

आगामी चुनाव की रणनीति

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मप्र की विंध्य, बुंदेलखंड, भिंड, मुरैना  ग्वालियर अंचल की सीटों पर विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए गैर भाजपाई दलों को एकजुट करने की कवायद तेज हो गई है. नवनियुक्त प्रदेश कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष इसी रणनीति पर कार्य कर रहे हैं, बीएसपी सुप्रीमो मायावती से उनके राजनीतिक संबंधों के चलते वह समझौते की जमीन तैयार करने में जुटे हैं. बीएसपी के राजनीतिक विश्लेषक ऐसी सीटों पर ज्यादा फोकस कर रहे है जहां उसका मजबूत जनाधार है  पिछली बार मतों के थोड़े अंतर से उनकी पार्टी पिछड़ गई थी. संभावित सीटों पर राजनीतिक समीकरण खंगाले जा रहे हैं.

गैर भाजपाई दलों को करेंगे एकजुट

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मध्‍यप्रदेश कांग्रेस पार्टी के मीडिया विभाग अध्‍यक्ष मानक अग्रवाल का कहना है कि यहां कांग्रेस पार्टीगैर भाजपाई दलों को एकजुट करके ही चुनाव लड़ेगी. इस विषय में प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ पहले ही स्पष्ट शब्दों में यह बात कह चुके हैं. हम वोटों का बिखराव नहीं होने देंगे.

निर्णायक किरदार निभाएगी बसपा

वहीं मध्‍यप्रदेश बीएसपी इकाई के अध्‍यक्ष नर्मदा प्रसाद का कहना है कि 2013 में हम डेढ़ दर्जन सीटों पर जीत के बिल्कुल करीब थे. इस बार प्रदेश के कई जिलों में बीएसपी चुनावी नतीजों से चौंकाएगी  अपना खाता खोलेगी. गवर्नमेंट बनाने में बीएसपी निर्णायक किरदार निभाएगी.

2013 में यह था मिले मतों का प्रतिशत

गौरतलब है कि बीजेपी को कुल 1 करोड़ 51लाख 89 हजार 894 वोट, कांग्रेस पार्टी को 1 करोड़ 23 लाख 14 हजार 196 वोट  बीएसपी को 21लाख 27 हजार 959 वोट मिले थे.

भाजपा – 44.85 प्रतिशत

कांग्रेस- 36.38 प्रतिशत

बसपा- 6.29 प्रतिशत

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