Monday , December 17 2018
Loading...

अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चे ऑयल के भाव आकस्मित तेज

हाल में अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चे ऑयल के भाव आकस्मित बहुत ज्यादा तेज हो गए. ऑयल का एक बड़ा आयातक राष्ट्र होने के चलते इसकी कीमतें बढ़ने से हिंदुस्तान के लिए चिंताएं बढ़ने लगती हैं. न केवल राष्ट्र का व्यापार घाटा  उसके चलते चालू खाते का घाटा (करेंट एकाउंट डेफिसिट या सीएडी) बढ़ जाता है, बल्कि इसके चलते रुपये में भी कमजोरी आती है. पिछले वर्ष भर में अगर कच्चे ऑयल की वैश्विक कीमतें करीब 50 डॉलर से बढ़ कर 80 डॉलर के आस-पास आ गई हैं तो इस वर्ष जनवरी से अब तक डॉलर-रुपये की विनिमय दर जनवरी के करीब 63.3-63.6 रुपये के आस-पास से बढ़ कर हाल में 68.65 रुपये तक हो गई.

Image result for अंतरराष्ट्रीय मार्केट में ऑयल

कमजोरी के पीछे का एक पहलू

Loading...

हालांकि रुपये की कमजोरी के पीछे एक पहलू यह भी है कि डॉलर में अन्य राष्ट्रों की मुद्राओं के सापेक्ष भी मजबूती आई है. इसके अतिरिक्त अमेरिका में बांडों पर कमाई (यील्ड) बढ़ने के चलते विदेशी निवेशकों के लिए खुद अमेरिकी मार्केट ज्यादा सुन्दर हो गया है. वहीं इंडियन शेयर मार्केट ऊंचे स्तर पर होने के कारण यहां शेयरों का मूल्यांकन उन्हें महंगा लगने लगा है.इसके चलते विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआइआइ) इंडियन शेयर मार्केट में लगातार बिकवाली करके वह पैसा वापस ले जा रहे हैं. जब वे पैसा वापस ले जाते हैं तो हिंदुस्तान से डॉलर बाहर जाते हैं, जिसके चलते रुपया निर्बल होता है.

loading...

2014 के बाद कच्चे ऑयल की कीमत

जहां तक कच्चे ऑयल की कीमतों की बात है, वर्ष 2014 के बाद पहली बार कच्चे ऑयल की मूल्य 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गई. हालांकि अब भी यह वर्ष 2013 में दिखे 120 डॉलर के ऊंचे भाव से बहुत ज्यादा दूर है, लेकिन 2015  2016 के निचले स्तरों से इसमें बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हो चुकी है. जनवरी 2016 में तो कच्चे ऑयल के भाव कुछ समय के लिए 30 डॉलर प्रति बैरल के भी नीचे चले गए थे, हालांकि उन स्तरों से यह तेजी से ऊपर भी आया था. मोटे तौर पर बोला जाए तो वर्ष 2015 की दूसरी छमाही से लेकर 2017 की दूसरी छमाही तक यह मोटे तौर पर 40 से 60 डॉलर के दायरे में बना रहा. वर्ष 2017 के अंतिम महीनों में यह 60 डॉलर के ऊपर निकला  हाल में 80 डॉलर तक चढ़ गया. मगर इन पंक्तियों के लिखने के समय तक यह फिर से कुछ नरम हुआ है  75 डॉलर के पास आ गया है.

महंगे ऑयल का असर

अब जरा देखें कि कच्चे ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का क्या प्रभाव हिंदुस्तान पर हुआ? राष्ट्र में कच्चे ऑयल का आयात वित्त-वर्ष 2012-13 में 144.5 अरब डॉलर का था, जो कच्चे ऑयल की कीमतों में गिरावट के साथ-साथ 2015-16 तक घटते-घटते 65.9 अरब डॉलर का रह गया था. मगर उसके बाद यह फिर से बढ़ने लगा  2017-18 में यह 87.4 अरब डॉलर का रहा है. एक मोटा आकलन यह है कि कच्चे ऑयल की कीमतें अगर 10 डॉलर बढ़ती हैं तो हिंदुस्तान के सालाना आयात बिल में 8 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हो जाती है. आयात की राशि बढ़ने से राष्ट्र का व्यापार घाटा (ट्रेड डेफिसिट) बढ़ता है. व्यापार घाटा बढ़ने का सीधा मतलब होता है चालू खाते का घाटा (करेंट एकाउंट डेफिसिट या सीएडी) बढ़ जाना, क्योंकि व्यापार घाटा इसका सबसे बड़ा घटक है. यही कारण है कि अर्थव्यवस्था के जानकारों ने इस वर्ष चालू खाते का घाटा 1.9 फीसदी से बढ़ कर करीब 2.5 फीसदी हो जाने का अंदेशा जताना प्रारम्भ कर दिया है.

कितने गंभीर हैं हालात

क्या मौजूदा दशा वर्ष 2013 जैसे बेकार हो गए हैं? ऐसा नहीं लगता. उस समय चालू खाते का घाटा 6 फीसदी के ऊपर चल रहा था. दूसरी ओर विकास दर एकदम सुस्त हो गई थी.इसलिए रुपये की कमजोरी घरेलू वजहों से कम, वैश्विक कारणों से ज्यादा है, पर इतना जरूर है कि अगर रुपये की कमजोरी बनी रही तो इसके चलते अर्थव्यवस्था पर दबाव बनेगा. इस समय राष्ट्र में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें बढ़ना लोगों के असंतोष का एक बड़ा कारण बना हुआ है. पहली नजर में जनता की यह नाराजगी अच्छा लगती है कि जब कच्चे ऑयल के भाव घट रहे थे, तब गवर्नमेंट ने इसका फायदा जनता को नहीं दिया  खुदरा कीमतें उतनी नहीं घटने दी. इसके बदले गवर्नमेंट ने तब उत्पाद (एक्साइज) शुल्क बढ़ा कर अपना खजाना भरने को प्राथमिकता दी. इस समय जब कच्चे ऑयल की कीमतें बढ़ रही हैं तो उसका बोझ जनता पर डाला जा रहा है  खुदरा कीमतें बढ़ाई जा रही हैं. अगर गवर्नमेंट जनता को समझाना भी चाहे कि उत्पाद शुल्क बढ़ा कर उसने राजकोषीय घाटा (फिस्कल डेफिसिट) नियंत्रित किया, सब्सिडी घटाई  ईरान से ऑयल खरीद की पुरानी उधारी चुकाई तो ये सब बातें जनता नहीं समझने वाली है. इनसे अर्थशास्त्रियों  रेटिंग एजेंसियों की वाहवाही मिल सकती है, जनता का समर्थन नहीं मिलने वाला! लिहाजा इस मुद्दे की राजनीतिक संवेदनशीलता को देखते हुए गवर्नमेंट को कुछ ऐसा रास्ता निकालना ही होगा, जिसमें वह जनता को राहत देते हुए भी अर्थशास्त्र के नजरिये से कोई बड़ी गलती न करे.

कीमत वृद्धि का सिलसिला

यहां एक बड़ा सवाल यह है कि क्या कच्चे ऑयल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहेंगी या इससे भी आगे जाकर 100 डॉलर के आसपास पहुंच जाएंगी? बहुत ज्यादा जानकार ऐसे अंदेशे जता रहे हैं, पर दूसरी ओर यह मानने वालों की भी कमी नहीं है जो इसमें मौजूदा उछाल को एक तात्कालिक झटका मान रहे हैं. उनके हिसाब से लंबी अवधि में कच्चे ऑयल की कीमतें फिर से 65-70 डॉलर के औसत पर आ जाएंगी. कारण यह है कि 80 डॉलर जैसी ऊंची मूल्य पर कच्चे ऑयल का भाव टिके रहना कठिन है. जैसे ही ऑयल की कीमतें 60-65 डॉलर के ऊपर जाती हैं, अमेरिका में शेल गैस यानी चट्टानों के बीच से निकाली जाने वाली गैस के उत्पादकों के लिए भाव अनुकूल हो जाते हैं  वे अपना उत्पादन बढ़ाने लगते हैं. इसलिए जानकारों के मुताबिक जरूरी यह नहीं है कि आकस्मित किसी उछाल में कच्चे ऑयल का भाव ऊपर कहां तक चला जाता है, बल्कि वे इस बात को महत्व देंगे कि भाव आखिरकार किस दायरे में ठहरता है. अगर भाव फिर से निचले दायरे में ठहर जाते हैं तो गवर्नमेंट को इस मुसीबत से बहुत ज्यादा हद तक अपने-आप निजात मिल जाएगी, लेकिन गवर्नमेंट इस उम्मीद में हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रह सकती. उसे दूसरी संभावनाओं को ध्यान में रख कर अपनी तैयारी करनी ही होगी.

कच्चे ऑयल की कीमतें बढ़ने का कारण

कच्चे ऑयल की कीमतें बढ़ने का एक कारण यह है कि तेल-उत्पादक राष्ट्रों द्वारा उत्पादन में कटौती कर दी गई है. इसके अतिरिक्त अमेरिका  ईरान के बीच तनाव बढ़ा है अमेरिका ने ईरान पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिए हैं. इसके चलते भी ऑयल की आपूर्ति घटी है. हिंदुस्तान ईरान से बहुत ज्यादा ऑयल आयात करता है, इसलिए अमेरिकी प्रतिबंध की काट नहीं मिलने पर हिंदुस्तान के लिए कठिन बढ़ेगी. मगर यह इस पर निर्भर करता है कि हिंदुस्तान अमेरिकी प्रतिबंध को कितना तवज्जो देता है. पहले भी ऐसे मौके आए हैं, जब हिंदुस्तान ने अमेरिका  ईरान के आपसी तनाव से खुद को दूर रख ईरान से व्यापार जारी रखा है. पहले भी हिंदुस्तान ईरान से रुपये में भुगतान करके ऑयल आयात करता रहा है.गवर्नमेंट को यह देखना होगा कि कैसे वह वैकल्पिक उपायों से ईरान से आने वाली आपूर्ति को जारी रखे. अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते यह भी हो सकता है कि ईरान हिंदुस्तान को कुछ छूट पर ही अपना ऑयल बेचने को तैयार हो जाए.

रुपये को संभालने के उपाय

अगर इंडियन मुद्रा में ईरान से रुपये में ऑयल खरीदने की व्यवस्था फिर से बन पाती है तो इससे डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति को संभालने में मदद मिलेगी. अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से ईरान हिंदुस्तान से वस्तुओं के आयात के बदले ऑयल देने के लिए भी तैयार हो सकता है. वेनेजुएला ने भी हिंदुस्तान को रुपये में ऑयल की बिक्री करने पर राजी होने के इशारा दिए हैं. अगर हिंदुस्तान गवर्नमेंट इस तरह के कूटनीतिक तरीकों में पास रहती है तो इससे चालू खाते के घाटे में भी उतनी वृद्धि नहीं होगी, जितनी अभी संभावना लग रही है. साथ ही इन कदमों से डॉलर की तुलना में रुपये में आ रही कमजोरी भी थमेगी.

महंगाई  आर्थिक वृद्धि दर पर असर

हालांकि रुपये की विनिमय दर बढ़ने के चलते भी महंगाई  आर्थिक वृद्धि दर पर कुछ प्रभाव होगा. सबसे पहले तो आयात की जाने वाली तमाम चीजें महंगी हो जाएंगी. अपने पूंजीगत विस्तार के लिए आयात पर निर्भर रहने वाले उद्योगों के लिए नयी उत्पादन क्षमता स्थापित करना महंगा हो जाएगा. जिन कंपनियों ने विदेशी मुद्रा में ऋण (एफसीबी) ले रखे हैं, उनके लिए भी ब्याज का बोझ बढ़ जाएगा. ऐसा बहुत ज्यादा ऋण सरकारी कंपनियों ने बुनियादी ढांचा निर्माण के लिए भी लिया है,  इसके चलते बुनियादी ढांचा बनाने की लागत बढ़ जाएगी. जिन सरकारी कंपनियों के एफसीबी के लिए गवर्नमेंट ने सार्वभौम गारंटी दे रखी है, उनके लिए प्रभावी ब्याज दर बढ़ने की सूरत में सरकारी घाटे पर भी प्रभाव पड़ेगा.

रुपये की विनिमय दर पर वैश्विक मार्केट का असर

पर रुपये की विनिमय दर पर जहां वैश्विक मार्केट का बड़ा प्रभाव होता है, वहीं गवर्नमेंट  आरबीआइ की सोच  रणनीति भी इसे प्रभावित करती है. मनमोहन सिंह की गवर्नमेंट के समय डॉलर-रुपये की विनिमय दर को फरवरी 2013 में करीब 53 रुपये के स्तर से अगस्त 2013 में करीब 69 रुपये तक जाने दिया गया. यानी केवल छह-सात महीनों में रुपये का लगभग 30 फीसदी अवमूल्यन कर दिया गया था, अवमूल्यन की कोई औपचारिक घोषणा किए बिना. बीजेपी गवर्नमेंट के रुझान को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि वह रुपये को ज्यादा निर्बल होने देने के पक्ष में रहेगी. इसलिए मोटे तौर पर यह आसार ज्यादा लगती है कि डॉलर-रुपये की विनिमय दर कभी-कभार की आकस्मित उछाल के अतिरिक्त सामान्य तौर पर 65-68 के दायरे में बनी रहे.

Loading...
loading...