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जरूरी है पुतिन से संवाद

पु-ुनवजयपे-रु39या पंत
वरि-ुनवजयठ स्तंभकार
बात सबसे पहले रेखांकित करने लायक है, वह यह कि -िरु39याखर पर विराजमान नेताओं की कोई भी मुलाकात अनौपचारिक
नहीं होती. विदे-रु39या विभाग इनकी जमीन सावधानी से बहुत पहले से तैयार करता है. अकस्मात बहुपक्षीय सम्मेलनों वाली
नाटकीय मुलाकातें भी पूर्व नियोजित ही होती हैं. इसके साथ ही यह बात भी याद रखने लायक है कि पुतिन के प्रति
नरेंद्र मोदी का रु-हजयान एकाएक नहीं हुआ है. वह ओबामा को बराक-ंउचयबराक कहकर भले ही पुकारते रहे हों, उनके
उत्तराधिकारी ट्रंप को डोनाल्ड कहने का लालच उनको अभी तक नहीं हुआ है. ट्रंप के रा-ुनवजयट्रपति बनने के बाद
से भारत के हितों के प्रति अमेरिका की संवेदन-रु39याून्यता के मद्देनजर दूसरे विकल्प तला-रु39याना दूरद-रु39र्याी बुद्धिमत्ता ही है,
जिसमें मीन-ंउचयमेख निकालना न्यायसंगत नहीं दिखता. यह मोदी की लाचारी-ंउचयकमजोरी नहीं, भारत की मजबूरी ही कही
जा सकती है.इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि भारत की अमेरिका को रूस के माध्यम से संतुलित करने की राजनयिक
मनोकामना आसानी से पूरी हो सकती है. जबसे पुतिन ने सत्ता संभाली है, उनका रुख यूरोप की तरफ अधिक रहा है.
यूक्रेन में हस्तक्षेप हो अथवा क्रीमिया पर कब्जा या फिर पूर्वी यूरोप के अपने कभी उपग्रह रहे राज्यों पर यूरोपीय
समुदाय से अलग-ंउचयथलग रहने के लिए दबाव ब-सजय़ाना उनके राजनय ने सोवियत संघ के दिनों वाली रूस की यूरे-िरु39यायाई पहचान
घटायी है. भारत के लिए इससे भी चिंताजनक बात यह है कि पुतिन के रूस ने पाकिस्तान तथा भारत के बीच समसामीप्य वाली
नीति अपनायी है. उसने पाकिस्तान के साथ हथियारों का सौदा कर भारत को यह संदे-रु39या दिया है कि यदि वह सैनिक
साज-ंउचयसामान की खरीद कहीं और से करता है, तो रूस के अन्य दे-रु39याों के साथ सामरिक सौदों पर आपत्ति नहीं कर सकता. यह
नकारा नहीं जा सकता कि राफेल लड़ाकू विमानों के बेड़े का सौदा हो या इस्राइल के साथ इस क्षेत्र में ब-सजय़ती
घनि-ुनवजयठता यह रूस के साथ वि-रु39यो-ुनवजया रि-रु39यतों को हा-िरु39याये पर डालनेवाली ही साबित हुई है. यहां विस्तार से इस बात का
वि-रु39यले-ुनवजयाण असंभव है कि सोवियत संघ के विखंडन के बाद भारत को इस मामले में कितनी अड़चनों का सामना करना
पड़ा है या फिर देरी के कारण खरीद की कीमत में कितना नुकसानदेह इजाफा हुआ है, जिसका खामियाजा दोस्ती के
नाम पर भारत को भुगतना पड़ा है.
बहरहाल, अंतररा-ुनवजयट्रीय संबंध व्यक्तिगत मित्रता पर नहीं, रा-ुनवजयट्रहित की अतियथार्थवादी कसौटी पर ही कसे जाते हैं. सो
ओबामा हों या पुतिन, -रु39याी जिनपिंग, नवाज -रु39यारीफ हों या -िरु39यांजो एबे हों, मोदी के करि-रु39यमे या इन नेताओं के साथ
-रु39याारीरिक भा-ुनवजयाा में हाव-ंउचयभाव से संपादित संवाद की चर्चा व्यर्थ है. आकलन इसका होना चाहिए कि दोनों
दे-रु39याों के हितों का सन्निपात इस समय कितना हो रहा है और निकट भवि-ुनवजयय में इसके बने रहने की कितनी संभावना
है?भारत इस बात से भी आ-रु39यांकित रहा है कि पुतिन के -रु39याासनकाल में रूस के संबंध चीन के साथ निरंतर सामान्य यानी
बेहतर हुए हैं. चीन साइबेरिया के तेल गैस भंडार का सबसे आक-ुनवजर्याक ग्राहक है और भारत सखालिन में उससे होड़
नहीं ले सकता. रूस चीन के वन बेल्ट वन रोड का विरोधी नहीं, जबकि भारत को इससे बड़ा खतरा महसूस होता है.
-रु39यांघाई सहकार संगठन में रूस, भारत, चीन साथ हैं, पर नाममात्र को ही. चीन की पाकिस्तान के साथ मैत्री अब भी
हमारे लिए जोखिम पैदा करती है. चीन के समर्थन से ही पाकिस्तान में पनाह लेनेवाले हाफिज सईद जैसे दह-रु39यातगर्दों पर
अंकु-रु39या लगाना कठिन हुआ है. कुल मिलाकर, हमारे लिए इस घड़ी यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हम हर विकल्प को अपने हित
में इस्तेमाल करें. पुतिन की अब तक की ‘बेरुखी’ के कारण आहत अहंकार वाली मुद्रा अख्तियार करना गंभीर भूल
होगी. याद रहे इस समय पुतिन को भी भारत की जरूरत है. ब्रिटेन में पूर्व रूसी गुप्तचर और उसकी बेटी पर कातिलाना
हमले के आरोप के बाद रूसी सरकार कटघरे में है. ब्रिटेन की सरकार ही नहीं, बहुतेरी अन्य यूरोपीय सरकारों ने पुतिन
की कड़ी आलोचना की है और उनके राजनयिकों को अपने दे-रु39या से निकाला है. इसके पहले भी अमेरिकी रा-ुनवजयट्रपति
चुनावों में रूसी खुफिया एजेंसियों के गैरकानूनी हस्तक्षेप के कारण पुतिन अमेरिका में -रु39यात्रुवत देखे जाने लगे

हैं, जो जान-ंउचयबू-हजयकर प-िरु39यचम से मुठभेड़ की मुद्रा में रहते हैं. यह खतरनाक टकराव मध्यपूर्व में साफ देखा जा सकता
है, जहां अमेरिका तथा रूस आमने-ंउचयसामने आर-ंउचयपार की लड़ाई लड़नेवाले फौजियों-ंउचयबागियों की मदद कर रहे हैं.
इस मोर्चे पर संवाद धौंस-ंउचयधमकी से ही जारी रहा है. भारत की एक समस्या और है. अमेरिका यदि ईरान के साथ परमाण्विक
सम-हजयौता खारिज करने के बाद उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है, तो भारत इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता,
क्योंकि ईरान से बड़ी मात्रा में हम तेल आयात करते हैं. इसके अलावा चाबहार बंदरगाह के निर्माण में भारत की
भागीदारी अफगानिस्तान में हमारी मौजूदगी के संदर्भ में और पाकिस्तान में चीनी भारत-ंउचयविरोधी
घेराबंदी को नाकाम करनेवाली रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. पुतिन के साथ सोची में मुलाकात से मोदी
अमेरिका को यह स्प-ुनवजयट संकेत देने का प्रयास कर रहे हैं कि अमेरिका ही भारत का एकमात्र ऐसा मित्र नहीं, जिस पर वह गा-सजय़े वक्त
में भरोसा कर सकता है. रही बात चीन के साथ मनमुटाव और प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में रूस के साथ सहयोग और सहकार
की, तो यह बात न भूलें कि चीन भी इस समय ट्रंप से खिन्न है. जिस वाणिज्य युद्ध का ऐलान ट्रंप ने किया है, उससे चीन
को भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है. चीन एक साथ सभी मोर्चों पर लड़ने की नादानी नहीं कर सकता.
थोड़े समय के लिए ही सही भारत, रूस तथा चीन के रा-ुनवजयट्रीय-ंउचयसामरिक हितों में संयोग नजर आ रहा है. मेरा मानना है
कि विदे-रु39या नीति तथा राजनय के मामले में दलगत पक्षधरता से ऊपर उठना जरूरी है. आप मोदी या भाजपा-ंउचयएनडीए के
विरोधी हो सकते हैं और आंतरिक मोर्चे पर खासकर आर्थिक नीति-ंउचयनिर्धारण में इस सरकार की आलोचना करने को
व्याकुल हों, पर मोदी की रूस यात्रा का अवमूल्यन मात्र पूर्वाग्रह या राजनीतिक पक्षधरता के कारण न करें. आज हमारे सर पर
लाल टोपी रूसी भले न हो, पर पुतिन एक महा-रु39याक्ति के सर्वोच्च नेता हैं, जिनके साथ संवाद जरूरी है.
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