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ये 2 बड़ी बीमारियों हो सकती है देर में सोने से

जल्दी व देर से सोने वाले लोगों की स्वास्थ्य पर एक नया अध्ययन हुआ है जिसके नतीजे ‘निशाचरों’ को परेशान कर सकते हैं. इस अध्ययन में सामने आया है कि देर रात तक जागने वालों को जल्दी मौत का खतरा होता है. इसके अतिरिक्त उन्हें मनोवैज्ञानिक रोग व सांस लेने संबंधी दिक्कतें भी हो सकती हैं. लेकिन क्या देर रात तक जागना वाकई आपके लिए बुरा है? क्या इसका मतलब है कि ‘रात के उल्लुओं’ को अपनी आदत बदलकर प्रातः काल की गौरैया बन जाना चाहिए?

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दफ़्तर के दिनों में कमबख़्त अलार्म की कर्कश ध्वनि आपको बिस्तर से उठाकर अलग कर देती है. शनिवार आते-आते आप नींद के मारे थक चुके होते हैं व फिर अपने रोज के समय से ज़्यादा सोते हैं. यह सुनने में सामान्य लगता है, लेकिन यह इस बात का इशारा है कि आपको पर्याप्त नींद नहीं मिल रही व आप ‘सोशल जेट लैग’ के शिकार हैं. ‘सोशल जेट लैग’ हफ़्ते के दिनों के मुकाबले छुट्टी के दिन में आपकी नींद का अंतर है, जब हमारे पास देर से सोने व देर से उठने की ‘सहूलियत’ होती है.

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सोशल जेट लैग जितना ज़्यादा होगा, स्वास्थ्य की दिक्कतें उतनी ज़्यादा होंगी. इससे दिल की बीमारी व मेटाबॉलिक परेशानियां हो सकती हैं. म्यूनिख की लुडविग-मैक्समिलन यूनिवर्सिटी में क्रोनोबायोलॉजी के प्रोफेसर टिल रोएनबर्ग के मुताबिक, “यही वो चीज है जिसके आधार पर ऐसे अध्ययन प्रातः काल देर से उठने वालों के लिए स्वास्थ्य से जुड़े खतरे ज़्यादा बताते हैं.”

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स्लीप एंड सर्कैडियन न्यूरोसाइंस इंस्टीट्यूट व नफील्ड लेबोरेट्री ऑफ आप्थलमोलॉजी के प्रमुख रसेल फोस्टर कहते हैं कि अगर आप प्रातः काल जल्दी उठने वालों से देर रात तक कार्य करवाएं तो उन्हें भी सेहत की दिक़्कतें होंगी.

‘यह इंसान का जीव विज्ञान है’

तो देर रात जागने वाले क्या करें? क्या वीकएंड पर मिलने वाली अपनी बेशकीमती लंबी नींद का त्याग कर दें? प्रोफेसर रोएनबर्ग कहते हैं, “यह सबसे बेकार बात होगी.” वह मानते हैं कि देर रात तक जागना अपने आप में बीमारियां पैदा नहीं करता. वह कहते हैं, “अगर आप पांच दिनों तक कम सोए हैं तो आप अपनी नींद की भरपाई करेंगे ही व ऐसा आप तभी कर पाएंगे जब आपके पास वक़्त होगा.”

ऐसा इसलिए भी है कि हमारे सोने-जागने का समय सिर्फ़ आदत या अनुशासन का मसला नहीं है. यह हमारी बॉडी क्लॉक पर निर्भर करता है जिसका 50 प्रतिशत भाग हमारे जीन तय करते हैं. बाकी 50 प्रतिशत भाग हमारा पर्यावरण व आयु तय करती है। इंसान बीस की आयु में देर से सोने के चरम पर होता है व आयु बढ़ने के साथ हमारा बॉडी क्लॉक पहले की ओर खिसकता जाता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ सरे में क्रोनोबायोलॉजी के प्रोफेसर मैल्कम वॉन शांत्ज कहते हैं, “हमने ये मान लिया है कि देर तक जागने वाले लोग किसी कार्य के नहीं होते व आलसी होते हैं, लेकिन असल में यह इंसानी जीवविज्ञान है.” यही विज्ञान है जो उल्लुओं व प्रातः काल चहचहाने वाले पक्षियों को भी प्रभावित करता है.

जानकार मानते हैं कि वीकएंड पर जल्दी उठ जाने से आप अपनी जेनेटिक प्रवृत्तियों से नहीं उबर पाएंगे बल्कि इससे आप अपनी नींद से व वंचित ही होते रहेंगे. इसके बजाय अपने बॉडी क्लॉक को गुमराह करने का बेहतर उपाय रोशनी से जुड़ा है. हमारा बॉडी क्लॉक सूरज के उगने व छिपने से प्रभावित होता है, लेकिन हम में से बहुतों को दिन में कम सूरज की रोशनी नसीब होती है व रात में कृत्रिम प्रकाश ज़्यादा मिलता है.

इससे हमें नींद जल्दी नहीं आती. यह देर रात तक जागने वालों की आम समस्या है, जो पहले से ही अपने जीव विज्ञान के चलते ‘देरी’ के शिकार होते हैं. प्रातः काल सूरज की रोशनी लेकर व रात में कृत्रिम रोशनी – खास तौर पर हमारे फोन व लैपटॉप से आने वाली नीली रौशनी- से खुद को बचाकर हम अपने बॉडी क्लॉक को जल्दी नींद बुलाने की ट्रेनिंग दे सकते हैं.

नींद पर वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले कहते हैं कि इसमें दफ़्तरों, स्कूलों व समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे रात में जागने वालों को स्वीकार करें. इसकी आरंभ इस तरह हो सकती है कि ज़्यादा कर्मचारियों को शाम से देर रात तक कार्य करने की इजाजत दी जाए.

इसके अतिरिक्त प्रोफेसर फॉस्टर के मुताबिक, लोग अपने बॉडी क्लॉक के हिसाब से दफ़्तरों में कार्य करेंगे तो यह ज़्यादा तर्कपूर्ण होगा. इससे कर्मचारियों का प्रदर्शन भी बेहतर होगा व चौबीस घंटे चलने वाले कारोबार को इससे लाभ ही होगा.

प्रोफेसर रोएनबर्ग एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं, “यह समाज का कार्य है कि वह इसका ख़्याल रखे. यह समाज का कार्य है कि वह इमारतों में व रोशनी बढ़ाए, साथ ही नीली रोशनी को कम करे ताकि लोग अपने बॉडी क्लॉक को बदले बिना टीवी देख सकें.”

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