Tuesday , December 11 2018
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क्राइम ठहराने के विरूद्ध सुप्रीम न्यायालय पहुंचे आईआईटी विद्यार्थी

प्रतिष्ठित इंडियन प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) के 20 पूर्व  वर्तमान विद्यार्थियों ने सुप्रीम न्यायालय में आईपीसी की धारा 377 को चुनौती दी है, जो एक ही लिंग के दो बालिगों को आपसी सहमति से अप्राकृतिक शारीरिक संबंध बनाने को क्राइम ठहराती है.
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विभिन्न आयुवर्गों वाले इन याचिकाकर्ता विद्यार्थियों में वैज्ञानिक, अध्यापक, उद्यमी  शोधकर्ता शामिल हैं. इन समेत सभी पुरुष और महिला समलैंगिक  ट्रांसजेंडर्स (एलजीबीटी) का दावा रहा है कि यौन स्थिति का अपराधीकरण ‘शर्म की भावना, आत्म सम्मान को ठेस पहुंचने  कलंक लगने’ के परिणाम के तौर पर सामने आता है.

इस याचिका को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ द्वारा सुने जाने की आसार है, जो पहले ही 8 जनवरी को बहुत सारे प्रसिद्ध लोगों और गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन की तरफ से शीर्ष कोर्टके साल 2013 में दिए गए फैसला के विरूद्ध लगाई दर्जनों याचिकाओं को एक 5 जजों की संवैधानिक पीठ के हवाले कर चुके हैं. साल 2013 के फैसला में सुप्रीम न्यायालय ने व्यस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक यौन संबंधों को फिर से आपराधिक घोषित कर दिया था.

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350 सदस्यों की एलजीबीटी एल्युमनी एसोसिएशन के सदस्य
सुप्रीम न्यायालय में लगाई गई वर्तमान याचिका सभी आईआईटी की एलजीबीटी एल्युमनी एसोसिएशन के प्रतिनिधि के तौर पर लगाई गई है, जिसके राष्ट्र के सभी आईआईटी में 350 से ज्यादा सदस्य होने का दावा है. याचिकाकर्ताओं में आईआईटी दिल्ली का 19 वर्षीय विद्यार्थी सबसे कम आयु का है तो साल 1982 में आईआईटी से पास आउट हो चुके एक सदस्य सबसे ज्यादा आयुके हैं.

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सरकार से जवाब मांग चुका है शीर्ष न्यायालय
शीर्ष कोर्ट ने 23 अप्रैल को एक होटल के मालिक केशव सूरी की याचिका पर कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय  सेहत मंत्रालय से इस मामले पर उनकी रिएक्शन मांगी थी. एक मई को भी सुप्रीम न्यायालय के सामने ट्रांसजेंडरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता आरिफ जफर, अशोक राव कवि  मुंबई के एनजीओ हमसफर ट्रस्ट समेत कई अन्य की दो याचिकाएं इस मुद्दे पर दाखिल की गई थीं.

दिल्ली न्यायालय कर चुका है वैध घोषित
दिल्ली न्यायालय ने 2 जुलाई, 2009 को अपने एक फैसला में होमोसेक्सुअल (समान लिंग में सेक्स) गतिविधियों को बालिगों की आपसी सहमति होने पर वैध घोषित किया था. न्यायालय ने इसे अवैधठहराने वाले 149 वर्ष पुराने कानून को मूल अधिकारों का हनन बताया था.

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