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जानिए POCSO एक्ट में क्या कहा वृंदा करात, शिवराज सिंह, सलमान खुर्शीद ने

देश में बच्चियां कितनी असुरक्षित हैं इसकी खबरें लगातार सुर्खियों में छाई हुई हैं। जम्मू कश्मीर के कठुआ से आई खबर के बाद सूरत, फिर एटा, इंदौर से लेकर छत्तीसगढ़ और मेघालय तक में बच्चियों के साथ बलात्कार के दरिंदगी की घटनाओं ने देश को हिला कर रख दिया है। इन वारदातों से देश में फैले आक्रोश के मद्देनजर केंद्र सरकार ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामले में मौत की सजा के प्रवाधान को मंजूरी दे दी है।

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केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में पॉक्सो (POCSO- protection of children against sexual offences) एक्ट में बदलाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। केंद्र सरकार के इस फैसले पर अगल-अगल राजनीतिक दलों और संस्थानों की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेता वृंदा करात ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए बलात्कारियों का समर्थन करनेवालों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। करात ने कहा, “सैद्धांतिक तौर पर माकपा मृत्युदंड के खिलाफ है। अपराध के अत्यंत दुर्लभ मामलों में मृत्युदंड का प्रवाधान पहले से ही मौजूद है। वास्तविक मुद्दा यह है कि सरकार के कुछ सदस्य बलात्कारियों का समर्थन कर रहे हैं। ‘बलात्कारियों के रक्षकों’ को दंड दिया जाना चाहिए।”

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करात ने आगे कहा, “मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए सरकार यह मुद्दा लाने की कोशिश कर रही है। मैं इससे सहमत नहीं हूं क्योंकि इसकी बहुत कम विश्वसनीयता है। हम चाहते हैं कि सजा सुनिश्चित की जा सके। यह मुद्दा उन मसलों का जबाव नहीं दे पा रही है जिससे भारतीयों के दिमाग उत्तेजित हैं।”

वहीं राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा है कि वो सरकार के इस कदम का स्वागत करती हैं।

साथ ही उन्होंने कहा, “लेकिन मुख्य चुनौती कानून को लागू करने की है। मैं अभी भी सुझाव दूंगी कि फास्ट ट्रैक कोर्ट होने चाहिए ताकि जल्द से जल्द न्याय मिल सके।”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का कहना है कि न्यायपालिका के जरिये इस मुद्दे को सुलझाने में बहुत मदद नहीं मिलने वाली, इस समस्या की जड़ का समाधान करना होगा।

उन्होंने कहा, “यह एक संवेदनशील मुद्दा है और हाल में हुई घटनाएं शर्मनाक हैं। सरकार को अपने फैसले पर फिर से विचार करना चाहिए। हमें ऐसे अपराधों के मूल कारण को खोजने की जरूरत है क्योंकि न्यायपालिका सिर्फ एक सीमा तक ही मदद कर सकती है।”

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