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सरकार का अन-रु39यान!

-रु39याीतला सिंह
जब हम यह पंक्तियां लिख रहे हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनके कई मंत्री व सांसद आदि अन-रु39यान पर हैं-ंउचयराजधानी
दिल्ली से लेकर दे-रु39या के विभिन्न क्षेत्रों के कई प्रमुख स्थानों पर। वे विपक्ष द्वारा संसद के संचालन में पैदा की गयी
बाधा से नाराज हैं और उसे खुद को हासिल जनादे-रु39या के खिलाफ बता रहे हैं। इससे पहले सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी
कांग्रेस गांधी समाधि पर अपने अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में उपवास कर चुकी है और सरकार के अन-रु39यान का मजाक
उड़ा रही है।प्रसंगव-रु39या, यह एक सर्वथा नया उदाहरण है, जब प्रधानमंत्री जैसे दे-रु39या के सर्वोच्च पदाधिकारी को अन-रु39यान
का सहारा लेना पड़ा है। इससे पहले अन-रु39यानों के विभिन्न प्रयोग सरकारों द्वारा नहीं, उनके विरोधियों द्वारा ही
किये जाते रहे हैं। इस सिलसिले में महात्मा गांधी और अन्ना हजारे आदि के नाम लिये जायें तो उनके अन-रु39यान
व्यवस्थाजन्य परिवर्तनों से सम्बद्ध थे, जिनका दे-रु39या की जनता ने आमतौर से स्वागत किया था। लेकिन प्रधानमंत्री का
अन-रु39यान, जैसा घो-िुनवजयात भी किया गया है, ऐसे किसी पवित्र उद्दे-रु39यय से नहीं, विपक्ष के राजनीतिक विरोध से प्रेरित है। वे दे-रु39या
को यह संदे-रु39या देना चाहते हैं कि विपक्ष की भूमिका, खासकर संसद के संचालन के संदर्भ में, लोकतांत्रिक
मान्यताओं के अनुरूप नहीं रह गयी है।
ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि असहज स्थितियों में प्रासंगिक माने जाने वाले आन्दोलन निरंतरता या कि दीर्घकालिक
स्वरूप ग्रहण कर लें तो उन्हें कैसे उचित ठहराया जायेगा?
लोकतंत्र जनआन्दोलन से कतई पृथक नहीं हो सकता और अन-रु39यान के औजार तो सरकार और मालिकों के खिलाफ पहले
भी इस्तेमाल किये जाते रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में जिस कार्यपालिका को स्थायी तत्व माना गया है और जिसके राजनीति
से परे रहने की व्यवस्था है, वह भी विसंगतियां बताकर आन्दोलन पर उतरे तो उसे कितना उचित माना जाये? इस प्र-रु39यन पर

चर्चा या विचार करें तो केन्द्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों के अतिरिक्त सार्वजनिक क्षेत्र के, जिसका नियमन और
नियंत्रण सरकार द्वारा ही होता है, कर्मचारियों के आन्दोलन को किस रूप में देखा जाये?
रेलवे दे-रु39या का सार्वजनिक क्षेत्र का सबसे बड़ा प्रति-ुनवजयठान है, जो कई बार आन्दोलनों के रास्ते पर जा चुका है। इसी
प्रकार राज्यों की परिवहन सेवाओं तथा अन्य प्रति-ुनवजयठानों में भी, जो सार्वजनिक उपयोगिता से सम्बद्ध हैं, हड़तालें
हो चुकी हैं। केन्द्र और राज्यों में कार्यरत कर्मचारियों के पास भी संगठन बनाने, चलाने और आन्दोलनों
की राह पर जाने जैसे विकल्प हैं और आलम यह है कि पुलिस जैसे सुरक्षा बल भी आन्दोलन के रास्तों पर चल चुके हैं।
उत्तर प्रदे-रु39या में तो 1974 में प्रदे-रु39याीय स-रु39यास्त्र पुलिस बल का आन्दोलन भी, जिसे विद्रोह की संज्ञा दी गयी थी, हो
चुका है। तब आन्दोलित संगठन से जुड़े पुलिसकर्मियों की सेवाएं भी समाप्त की गयी थीं। फिर भी उनके इस सवाल
का कोई संगत जवाब नहीं मिल पाया कि आन्दोलनों के अधिकार से उन्हें ही विरत क्यों रखा जाये? केन्द्र और
राज्यों के कर्मचारी तथा सरकार द्वारा संचालित संस्थानों में सेवारत कर्मचारी आंदोलन के अधिकार का उपयोग कर
सकते हैं तो उसके एक समूह को ही इससे परे मानना कैसे उपादेय है?
यह तर्क दिया जा सकता है कि सुरक्षाबलों में अनु-रु39याासनहीनता सामाजिक अव्यवस्था की जनक और सरकारी कार्यपद्धति को समाप्त
करने का कारण हो सकती है। इसीलिए उनके आन्दोलन पर प्रतिबन्ध भी लागू करने पड़ते हैं, लेकिन उनके
कर्मचारियों के रो-ुनवजया, गुस्से और असहजता के मूल कारणों के समाधान के लिए क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था विद्यमान
है, जिसका वे उपयोग कर सकें? यह तर्क अति महत्वपूर्ण और आव-रु39ययक है कि क्या सैनिकों को भी आन्दोलन के अधिकार
दिये जायें? तब दे-रु39या की रक्षा कैसे संभव होगी और उसकी भावी व्यवस्था का संचालन कैसे होगा? लेकिन जब किन्हीं
समस्याओं के समाधान की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होगी तो सार्वजनिक रो-ुनवजया आन्दोलनों के रूप में अभिव्यक्त
होगा ही और वे हिंसात्मक भी हो सकते हैं। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय के पांच प्रमुख न्यायाधी-रु39याों ने
पहली बार प्रेस कांन्फ्रेस करके चीफ जस्टिस के खिलाफ रो-ुनवजया का सार्वजनिक प्रद-रु39र्यान किया तो उनके खिलाफ न कोई मामला
बना, न उन्हें रा-ुनवजयट्रपति ने ही तलब किया। क्योंकि इस प्रकार का कोई विधिक व्यवस्था ही विद्यमान नहीं थी। ऐसे
में राज्य स्वयं अन-रु39यान, उपवास या विरोध के अन्य माध्यमों के प्रयोग पर उतर आये तो स्वाभाविक ही उनसे जुड़े
समाधान के प्र-रु39यन उठेंगे। हमारे संविधान में व्यवस्था संचालन की जो व्यवस्था है, उसमें सरकार नामक संस्थाएं
नियामक, नियंत्रक और कार्यसंचालक हैं। वे इसे भूल खुद आन्दोलित होने लगें तो पुराना सवाल फिर से प्रासंगिक
हो उठेगा कि माली ही पामाली करे, तो परिणाम क्या होगा? हम जानते हैं कि जिस सरकार की राज्य के संचालन के लिए
कल्पना की गयी ह,ै वह अपरिमित अधिकारों वाली है। जहां तक संसद जैसे प्रतिनिधि सदन का प्र-रु39यन है, उसको तो अधिकार
विभाजन से भी परे रख कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के स्वरूप निर्धारण से लेकर नियंत्रण तक के अधिकार तथा
वि-रु39यो-ुनवजयााधिकार दिये गये हैं। इनका वह समय-ंउचयसमय पर आव-रु39ययकता के अनुसार उपयोग भी करती रहती है। इसका उदाहरण यह
है कि उत्तर प्रदे-रु39या विधानसभा अपने वि-रु39यो-ुनवजयााधिकारों के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधी-रु39याों तक को तलब कर चुकी
है, क्योंकि सदन द्वारा जिस व्यक्ति को एक सप्ताह की सजा दी गयी थी, वे उसकी जमानत पर सुनवाई करने से बाज नहीं आये
थे। यह प्र-रु39यन भी समाधान के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक गया था और उसका सु-हजयाया समाधान यही था कि राज्य की
विभिन्न संस्थाएं एक दूसरे के अधिकारों एवं वि-रु39यो-ुनवजयााधिकारों में दखल देने से बचें। मुद्दे पर लौटें तो
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह एक दिन का अन-रु39यान या कि उपवास जनता को ही निर्णायक मानकर किया गया हो तो भी
मु-िरु39यकल यह है कि यह महात्मा गांधी के समय से अन-रु39यानों से जुड़ी आती आत्म-रु39याुद्धि या प-रु39यचाताप की भावना का
प्रतिनिधित्व नहीं करता। तभी तो बाकायदा एलान किया गया है कि यह अन-रु39यान करने वालों के नहीं विपक्ष के दो-ुनवजयाों
के निवारण के लिए किया जा रहा है। जनता को इस बात के लिए प्रेरित करने हेतु कि वह सत्ता के विरोधियों को पहचाने
और दंडित करें। सोचिये जरा कि ऐसा तब है, जब जनता विपक्ष को पहले ही उसके किये की भरपूर सजा सुना चुकी है।
लोकतंत्र में चुनाव आते हैं तो आमतौर पर ऐसा ही होता है कि सर्वोच्च अधिकार से सम्पन्न जनता अपने विवेक का
प्रयोग करके, अगर सत्तारू-सजय़ों से नाराज है तो, उन्हें कन्धे से उतार और विपक्ष में फेंककर अपनी पसन्द के लोगों
को सत्ता सौंप देती है। अब जिन्हें वह विपक्ष में रहने की सजा दे चुकी है, प्रधानमंत्री के कहने से और कौन-ंउचयसी
सजा दे देगी? फिर क्या किसी व्यक्ति या संस्थान को उसके एक कुसूर के लिए दो बार दंडित करना उचित ठहराया जा सकता है?

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हम जानते हैं कि जो लोग सत्ता में बैठे है,ं अपरिमित -रु39याक्ति और अधिकारों से युक्त हैं। न्यायिक विवेक के आधार पर
विभिन्न स्थितियों में उचित निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र भी। जिन्हें विधायी संस्थाएं कहा जाता है, उनका वि-रु39यवास
भी उन्हें प्राप्त है और वे विभिन्न स्थितियों व अवसरों के लिए व्यवस्थाएं बनाने का अधिकार भी रखते हैं।
जिन्हें रा-ुनवजयट्रपति या राज्यपाल जैसा संवैधानिक व्यक्ति माना जाता है, वे भी सरकार की मंत्रिपरि-ुनवजयाद के पराम-रु39र्या के अनुकूल
ही कार्य करते हैं। सो, आंदोलित सत्ताधी-रु39याों से यह सवाल तो बनता है कि वे जो अतिरिक्त नियामक -रु39याक्ति चाहते हैं,
कहीं वह ताना-रु39यााही की कोटि में तो नहीं आता?
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हम, नाली के कीड़े.. .
सूचना क्रांति और सो-रु39याल मीडिया के इस जमाने में कहा जाता है कि खबरें पलक -हजयपकते ही एक जगह से दूसरी जगह पहुंच
जाती है। इस वाक्य को अब सुधार लेना चाहिए कि खबरें पहुंचती नहीं है, पहुंचाई जाती हैं और अगर मं-रु39याा गलत हो
तो खबर को महीनों तक दबाकर भी रखा जा सकता है। जैसे जम्मू-ंउचयक-रु39यमीर के कठुआ में बच्ची से गैंगरेप और हत्या
की खबर को फैलने से रोका गया। 10 जनवरी को घुमंतू गुज्जर समुदाय की बच्ची का अपहरण कर एक हफ्ते तक उसे मंदिर
में बंधक रखा गया और इस दौरान न-रु39याीली दवाएं खिलाकर बार-ंउचयबार गैंगरेप किया गया।
इसके बाद बड़ी क्रूरता से उसकी हत्या भी कर दी गई। 17 जनवरी को बच्ची की ला-रु39या बरामद हुई। जब उसके परिजन
अपनी बच्ची को दफनाने की तैयारी कर रहे थे, तब उन्हें कुछ हिंदू कट्टरपंथियों ने धमकाया, जिसके बाद उन्हें
7 मील दूर, दूसरे गांव में दफन करना पड़ा। इस मामले को विपक्ष के विधायक मियां अल्ताफ ने विधानसभा में भी
उठाया, लेकिन कठुआ से बीजेपी विधायक राजीव जसरोटिया ने विधानसभा में कहा कि ये गुज्जरों का पारिवारिक विवाद
है। गुज्जर नेता मियां अल्ता$फइस पर बेवजह की राजनीति कर रहे हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने 23 जनवरी को मामले
की जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच को सौंपा। जिसमें दिल दहलाने वाली बातें सामने आईं। भरोसा ही नहीं होता
कि एक मासूम बच्ची के साथ, जो मन और -रु39यारीर दोनों से ही नाजुक थी, इस तरह पि-रु39यााचों जैसा व्यवहार कोई कर सकता
है। दिल्ली में कुछ साल पहले जो निर्भया कांड हुआ था, उसने तथाकथित तौर पर दे-रु39या को -हजयक-हजयोर दिया था।
निर्भया के साथ हुए गैंगरेप के बाद नाराज लोग सड़कों पर उतर आए थे। लेकिन बच्ची के साथ जो बर्बरता की गई,
उसकी तो खबर ही दे-रु39या में तीन महीने बाद पता चल रही है। ये है डिजीटल इंडिया का एक चेहरा। ऐसे कई चेहरे, कई
मुखौटे हमने और च-सजय़ा रखे हैं। हम दुनिया के सामने उदार, धर्मपरायण समाज हैं। हमारे नेता खुलेआम मंदिर,
मस्जिद की राजनीति करते हैं। ई-रु39यवर के नाम की -रु39यापथ लेते हैं। उपवास भी रखते हैं। लेकिन इसी समाज में एक बच्ची
को मंदिर में बंधक बना कर रखा जाता है, फिर चार-ंउचयछह लोग एक हफ्ते तक बार-ंउचयबार उसका रेप करते हैं। रेप करने के लिए
मेरठ से लड़के को जम्मू बुलाते हैं। पुलिसवाला बच्ची को मारने से पहले कहता है, एक बार और रेप करना चाहता
हूं। फिर बच्ची का गला दबाकर मारा जाता है और यह देखने के लिए वह मरी या नहीं, उसे पत्थर से कुचला जाता है।
इतने पर भी मन नहीं भरा तो बच्ची को इंसाफ दिलाने की को-िरु39या-रु39या करने वालों के खिलाफ प्रद-रु39र्यान किया जाता है।
इस प्रद-रु39र्यान में हिंदू समाज के लोग आगे-ंउचयआगे हैं और उनके हाथों में तिरंगा है। तिरंगे का इससे बड़ा अपमान
क्या होगा, कि उसे बलात्कारियों को बचाने के लिए लहराया जा रहा है। क्या ऐसे समाज को किसी भी तरह से सभ्य कहा जा
सकता है। हम तो नाली के कीड़े-ंउचयमकोड़ों से भी गए गुजरे हो गए हैं। जिस तरह कीड़े-ंउचयमकोड़े जिंदा रहने
के लिए कुछ भी खाते हैं, गंदगी में रहते हैं, परजीवी बने रहते हैं और फिर उसी में मर कर सड़ जाते हैं। हमारी
जिंदगी उनसे कुछ अलग तो है नहीं। हम भी केवल अपने जिंदा रहने, अपने लिए सुविधाएं जुटाने, अपने सुखों के
लिए जीते हैं और फिर अपने ही खोल में सिमटे हुए मर जाते हैं। सभ्य, जागरूक होने की कोई लालसा हमारे भीतर बची
ही नहीं है। हमारी इस स्वार्थवृत्ति का फायदा राजनेता उठाते हैं और ऐसे मासूमों को अपना -िरु39याकार बनाते हैं।
निर्भया मामले के बाद कुछ समय के लिए ऐसा लगा था कि समाज में थोड़ी चेतना आई है। लेकिन यह गलतफहमी थी।
समाज को धर्म की अफीम इतनी ज्यादा दे दी गई है कि उसमें चेतना बची ही नहीं है। कठुआ में बच्ची के साथ जो
हुआ, वह सोची-ंउचयसम-हजयी साजि-रु39या थी। 60 साल का सांजी राम, उसका बेटा, भतीजा, तीन पुलिसवाले इन सबने इस साजि-रु39या को

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अंजाम दिया, ताकि मुस्लिम खानाबदो-रु39या गुज्जर लोग कठुआ से चले जाएं। दरअसल ये लोग अपने भेड़, बकरियों,
घोड़ों के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमते हैं, नदियों के किनारे डेरा डालते हैं, जहां उनके जानवरों
को चरने के लिए घास मिल जाती है। लेकिन सांजी राम जैसे धर्म के अंधे लोगों को इनका अपने इलाके में आना
इतना खटका कि इनकी बच्ची को नि-रु39यााना बनाकर पूरे समाज को धमकाने की साजि-रु39या रच ली गई। बच्ची की हत्या ही
काफी नहीं थी कि अब इस मामले पर अब राजनीति हो रही है और हाथ में तिरंगा लेकर सांप्रदायिक तनाव भी खड़ा
किया जा रहा है। बच्ची के दुखी पिता इस प्रद-रु39र्यान को देखकर कहते हैं कि ऐसा लग रहा है मेरी बच्ची का फिर से बलात्कार
कर, उसे दोबारा कत्ल कर दिया गया है। इस बात को सुनने के बाद क्या अब भी हमें खुद को सभ्य कहने का हक है? हमें
कहना चाहिए, हम, नाली के कीड़े.. .अधर्म के संरक्षक.. .. सभ्य होने की चाह ही नहीं रखते हैं।
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आज का रा-िरु39या फल
मे-ुनवजया:-ंउचय निकट संबंधों में -रु39यांकाओं को न हावी होने दें। भौतिक आकांक्षाओं की पूर्ति होने के
आसार हैं। नौकरी का वातावरण सुखद होगा। सगे-ंउचयसंबंधों के बीच प्रगा-सजय़ता ब-सजय़ेगी।
बृ-ुनवजयाभ:-ंउचय आर्थिक क्षेत्र में लाभ के आसार हैं। अवरोधित कार्य हल होते हुए नजर आएंगे। योजनाओं के
फलीभूत होने से मन प्रसन्न होगा। विद्यार्थियों के लिए ग्रहों की अनुकूलता लाभप्रद होगी।
मिथुन:-ंउचय सगे-ंउचयसंबंधों में कटु वचनों का प्रयोग न करें। माता के स्वास्य के प्रति सतर्क रहे। अच्छे कायरें द्वारा
प्र-रु39यांसा के पात्र बनेंगे। राजनीति से जुड़े लोगों को ग्रहों का सहयोग प्राप्त होगा।
कर्क:-ंउचय बीती बातों को भूलने की को-िरु39या-रु39या करें। रोजगार में कुछ अच्छे अवसर बनेंगे। भौतिक इच्छाएं
बलवती होंगी। अभिभावकों के भावनात्मक सहयोग से उत्साह ब-सजय़ेगा। आलस्य कतई न करें।
सिंह:-ंउचय नकारात्मक चिंताओं का त्याग करें। महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां अपनी पूर्ति हेतु मन पर दबाव बनाएंगी।
सकारात्मक सोच के साथ सकारात्मक दि-रु39याा की ओर केंद्रित हों।
कन्या:-ंउचय किसी नये कार्य की ओर आपका रु-हजयान ब-सजय़ेगा। किसी महत्वपूर्ण फैसले के लिए मन केंद्रित होगा। नवीन
योजनाओं द्वारा प्रगति के आसार बनेंगे। नौकरी का वातावरण सुखद होगा।
तुला:-ंउचय महत्वाकांक्षाएं मन पर प्रभावी होंगी। घरेलू कायरें में अत्याधिक व्यय का योग है। कार्यक्षेत्र में अति
व्यस्तता ब-सजय़ेगी। परिवार में कोई सुखद स्थिति मन को प्रसन्न रखेगी।
वृ-िरु39यचक:-ंउचय परिश्रम का समुचित लाभ प्राप्त होगा। पारिवारिक वातावरण सुखद व उत्साहपूर्ण होगा। महत्वपूर्ण
योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु प्रयत्न तीव्र होगा। जीवन साथी के स्वास्य के प्रति सतर्क रहे।
धनु:-ंउचय मन सुन्दर कल्पनाओं से प्रभावित रहेगा। नये संबंध के प्रति निकटता ब-सजय़ेगी। उपस्थित साधनों में
संतु-ुनवजयट एवं तृप्त रहने का प्रयत्न करें। घर में किसी मेहमान के आगमन से व्यय संभव।
मकर:-ंउचय विभागीय परिवर्तन से कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। अपने अन्दर धैर्य व वाणी में मधुरता
लावें। कुछ नई अभिला-ुनवजयााएं मन में जागृत होंगी। प्रियजनों का सानिध्य प्राप्त होगा।
कुंभ:-ंउचय राजनीति से जुड़े लोगों के लिए समय अनुकूल होगा। अच्छे कायरें के लिए प्र-रु39यांसनीय होंगे।
-रु39याासन-ंउचयसत्ता से लाभ के अवसर प्राप्त होंगे। कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने में मन दुविधाग्रस्त होगा।

मीन:-ंउचय आवे-रु39या में किये गये कार्य से मन को क-ुनवजयट संभव। भावनात्मक समस्याओं पर सगे-ंउचयसंबंधों के बीच खुलकर
बात करें। कुछ नये उत्साह व क्षमता की अनुभूति करेंगे। महत्वपूर्ण कार्य समय से पूरे करें।

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