Friday , November 16 2018
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एससी-एसटी एक्ट पर निर्णय से निर्बल पड़ा कानून

केंद्र गवर्नमेंट ने सुप्रीम न्यायालय से बोला है कि अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पर उसके हालिया आदेश से राष्ट्र को भारी नुकसान हुआ है. निर्णय से राष्ट्र में आक्रोश, बैचेनी का भाव पनपा है. सामाजिक समरसता को भी गहरी चोट पहुंची है. गवर्नमेंट ने 20 मार्च के आदेश को वापस लेने की गुहार लगाई है.
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अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम न्यायालय को दी लिखित दलील में दावा किया कि निर्णयने एससी-एसटी एक्ट को निर्बल किया है. साथ ही बोला कि 20 मार्च का वह आदेश वापस लिया जाए, जिसमें एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच  आरोपी को गिरफ्तारी से संरक्षण दिया गया था. 20 मार्च को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के दुरुपयोग के मद्देनजर सुप्रीम न्यायालय ने अधिनियम के तहत मिलने वाली शिकायत पर स्वत: एफआईआर  गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. साथ ही अग्रिम जमानत के प्रावधान को जोड़ दिया था.

सुप्रीम न्यायालय ने बोला था कि एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच होनी चाहिए. साथ ही सरकारी अधिकारियों की अरैस्ट से पहले नियुक्त करने वाली अथॉरिटी से अनुमति लेनी होगी. 3 अप्रैल की सुनवाई में जस्टिस आदर्श कुमार गोयल  यूयू ललित की पीठ ने बोला था कि हमने अधिनियम के किसी भी प्रावधान को कमतर नहीं किया है. जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं उन्होंने हमारे आदेश को पढ़ा नहीं है. पीठ ने सभी पक्षकारों को लिखित दलीलें पेश करने का आदेश देते हुए सुनवाई टाल दी थी.

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एससी-एसटी कानून के विरूद्ध है आदेश: केंद्र

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केंद्र गवर्नमेंट ने सुप्रीम न्यायालय से बोला कि आदेश को लेकर राष्ट्र में बड़े पैमाने पर भ्रम की स्थिति है. लिहाजा, इसमें सुधार की आवश्यकता है. एससी-एसटी वर्ग के लोग सताए हुए हैं. इस आदेश के बाद संबंधित मामले में पुलिस का रवैया टालमटोल वाला होगा. मुकदमे दर्ज नहीं होंगे.गवर्नमेंट ने बोला है कि शीर्ष न्यायालय का निर्णय एससी-एसटी अधिनियम के उल्टा है  तत्काल एफआईआर और अग्रिम जमानत न होने के कानून के उलट है.

अदालत नहीं बना सकती कानून: केंद्र

गवर्नमेंट ने बोला कि संविधान में कार्यपालिका, विधायिका  न्यायपालिका का अधिकार निहित है.न्यायालय कानून नहीं बना सकती. न्यायालय ने अपने आदेश से कानून में ही संशोधन कर दिया है, जबकि न्यायालय न्यायिक स्तर पर कानून में संशोधन भी नहीं कर सकती.

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