Tuesday , August 21 2018
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विपक्ष से दे-रु39या की अपेक्षा

भूपेंद्र यादव
राज्यसभा सदस्य
रा-ुनवजयट्रीय महासचिव, भाजपा
उच्चतम न्यायालय का एससी,एसटी एक्ट पर निर्णय आने के बाद दे-रु39या में एक प्रकार की तनाव की स्थिति पैदा हो गयी है. कुछ
दिनों से न्यायपालिका के निर्णय अनेकानेक कारणों से चर्चा का वि-ुनवजयाय बन रहे हैं. प्रत्येक केस की स्थिति भिन्न
होती है, उनके तथ्य, प्रकरण आदि भी भिन्न होते हैं, ऐसे में कानूनी तौर पर वि-रु39यो-ुनवजया ध्यान इस बात पर दिया जाता है
कि चाहे कोई भी मामला हो, संबंधित कानूनी प्रक्रिया का सम्यक प्रकार से पालन हुआ है या नहीं. किसी एक घटना या
मामले को आधार मानकर एक ऐतिहासिक सामाजिक वि-ुनवजयाय को एक आदे-रु39या द्वारा निरस्त कर देना न्यायपूर्ण निर्णय की कसौटी पर
सही सिद्ध नहीं होता. जिनको भी दे-रु39या की संवैधानिक -रु39याक्तियों पर वि-रु39यवास है, वे उन तथ्यों को भली-ंउचयभांति जानते
हैं और समाज-ंउचयहित में संवैधानिक मूल्यों के प्रचार-ंउचयप्रसार को नैतिक दायित्व मानते हैं. यह राजनीतिक स्वार्थ का
वि-ुनवजयाय नहीं है, यह हमारी आंतरिक -रु39याांति व सुरक्षा का वि-ुनवजयाय है, परंतु दुर्भाग्य से राजनीतिक विरोध इतना नकारात्मक
हो चुका है कि संवैधानिक संस्थाओं से जुड़ा प्रत्येक मुद्दा, जिस पर कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, उसे
नजरअंदाज कर किसी भी मुद्दे को सामाजिक तनाव के रूप में परिणत करके सरकार पर थोपने की विपक्ष द्वारा नकारात्मक राजनीति
निंदनीय है. न्यायपालिका का निर्णय उसका अपना स्वतंत्र निर्णय है, जिस पर नि-िरु39यचत रूप से सरकार द्वारा यथासंभव कार्यवाही की
जा रही है. जब जेएनयू में दे-रु39या-ंउचयविरोधी नारे लगे, तब जरूरत थी कि विपक्ष के नेता छात्रों को यह सम-हजयाते कि दे-रु39या के हित
में नारे लगाने चाहिए, लेकिन वे दे-रु39या-ंउचयविरोधी नारे लगने को ही सरकार की विफलता के रूप में प्रचारित करने लगे.
ऐसे ही, गत व-ुनवजर्याों में जब कुछ लेखकों ने एक सोची-ंउचयसम-हजयी रणनीति के तहत पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया, तब
विपक्ष को सकारात्मक भूमिका निभाते हुए आगे आकर कहना चाहिए था कि यह एक सा-हजयी संस्कृति का दे-रु39या है, परंतु विपक्ष
ने उसे भी सामाजिक तनाव का वि-ुनवजयाय बना दिया. इतने बड़े दे-रु39या में हम एक बड़ी सांस्कृतिक परंपरा को लेकर चल रहे
हैं. हमारे दे-रु39या में संस्कृति का जो इतिहास लिखा गया है, उनमें किसी भी व्यक्ति के जीवन के अच्छे-ंउचयबुरे दोनो
पक्षों की चर्चा की गयी है, क्योंकि दोनों के जीवन में स्वाभाविक रूप से चयन के अवसर रहते हैं, परंतु मनु-ुनवजयय अपनी

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गरिमा अनुकूल चुनाव कर चरित्र बनाता है. ऐसे में, अगर केवल अच्छे पक्ष को ही जीवन का एकांतिक सत्य मान लेते हैं,
तो यह भी अनुचित है और बुरे पक्ष को ही पकड़कर बैठ जाते हैं, तो यह भी उचित नहीं कहा जा सकता. समय, काल
और परिस्थिति के हिसाब से इतिहास में घटनेवाली घटनाओं से हमें आनेवाले समय का आकलन करना होगा. मूल्यों
का चुनाव करना होगा.
आनेवाला समय भारत में एक ऐसा समय होना चाहिए, जिसमें हम नवीन प्रौद्योगिकी और तकनीक के साथ अपने सांस्कृतिक
मूल्यों को लेकर आगे ब-सजय़ें. हम बहुत से मामलों में दुनिया की नकल करते जा रहे हैं, परंतु हमारे सांस्कृतिक
मूल्य आज वै-िरु39यवक मांग बन रहे हैं. दुनिया भारत को देखने के लिए आती है, तो वह इसलिए नहीं आती कि भारत ने
कोई बहुत बड़ी भौतिक तरक्की कर ली है, बल्कि भारत के पास जो एक सांस्कृतिक जीवनधारा है, वह दुनिया को अपनी
ओर खींचती है और वैचारिक रूप से प्रभावित करती है. हमने सदियों से उदार समरस जीवन को जीया है स्वार्थ, हिंसा,
प्रलोभन के -ुनवजयाड्यंत्र हुए हैं, परंतु वे स्वीकार्य मूल्य नहीं रहे. आज हमारी स्वस्थ परंपरा के वि-ुनवजयाय हमारे
वि-रु39यवविद्यालयों से गायब होते जा रहे हैं. मानविकी वि-ुनवजयायों का महत्व हम प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्रों में समाप्त करते जा रहे
हैं. जबकि मानविकी मानवीय उत्कृ-ुनवजयटता को प्राप्त करने की विधा है. जीवन की सहजता और सरलता को हम खोते जा रहे
हैं. आज की जो सबसे बड़ी समस्या है, वह तरक्की की नहीं, साधनों के समान बंटवारे की है. केंद्र की सरकार ने अपने
चार साल के -रु39याासन में इस बात का वि-रु39यो-ुनवजया ध्यान रखा है कि साधनों का बंटवारा अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से हो. प्रत्येक
व्यक्ति तक जीवन की न्यूनतम सुविधाएं पहुंच जायें.बिजली के लिए सौभाग्य योजना हो, चिकित्सा के लिए इंद्रधनु-ुनवजया
योजना हो, आर्थिक स-रु39याक्तिकरण के लिए जनधन योजना हो, भ्र-ुनवजयटाचार न हो इसके लिए आधार योजना हो, साधनों के
समान वितरण हेतु ऐसी ही बहुत सी नीतियों और योजनाएं इस सरकार द्वारा लागू की गयी है. अनेक कर के बजाय एक कर हो,
इसके लिए जीएसटी लाया गया. लेकिन, कभी भी इन वि-ुनवजयायों पर विपक्ष की तरफ से कोई तार्किक उत्तर या चर्चा नहीं की
गयी है. विपक्ष द्वारा उन्हीं वि-ुनवजयायों को मुद्दा बनाया गया, जो भावनात्मक रूप से समाज में तनाव पैदा करते हों.यही
कारण है कि पिछले चार साल से कांग्रेस लगभग हर चुनाव हारी है. दे-रु39या में नकारात्मक तथा अलोकतांत्रिक दु-ुनवजयप्रचार न
हो, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान दिवस प्रत्येक व-ुनवजर्या मनाने का निर्णय लिया. यदि दे-रु39या में संविधान के
प्रावधानों के प्रति वास्तविक जानकारी का विस्तार हो जाये, तो अफवाहों से तनाव ब-सजय़ने की घटनाओं पर स्वतः रोक
लग जायेगी. आ-रु39यचर्य है कि लगातार हारनेवाले राहुल गांधी आज कांग्रेस के सेनापति बन गये हैं. जिस व्यक्ति की तीन
पी-िसजय़यां गणतंत्र दिवस परेड की साक्षी हों, वह एनसीसी नहीं जानता. राहुल गांधी की यह जानकारी द-रु39र्यााती है कि वे
भारत, भारतीय युवा और सेना के प्रति कितने गंभीर हैं. कांग्रेस सांकेतिक उपवास को भी तीन-ंउचयचार घंटे का ही
मानती है. उनके प्रमुख नेता सुबह से -रु39यााम तक भी राजघाट पर किसी प्रकार का संयम या स्वनियंत्रण नहीं दिखा पाये और
पेट पूजा के बाद उपवास करनेवाले उपवास की परिभा-ुनवजयाा ही बदल रहे हैं. हम उपवास करने या न करने पर अपनी राय रख सकते
हैं, परंतु दो समय के भोजन समय में अंतराल लेना तो उपवास नहीं कहा जायेगा. कांग्रेस की यदि यही नीति है, तो यह
उसे ही मुबारक! दे-रु39या कांग्रेस की इन कुरीतियों से बहुत आगे ब-सजय़ चुका है और दे-रु39या में सबको साथ लेकर आगे
ब-सजय़ना चाहिए. इस दे-रु39या की संसद सब वि-ुनवजयायों का सही तरीके से सकारात्मक जवाब दे सकती है, लेकिन दुर्भाग्यव-रु39या विपक्ष
उसको भी नहीं चलने दे रहा है. संसद चले, वि-ुनवजयायों पर चर्चा हो और अपनी ऐतिहासिक सामाजिक विरासत को हम आगे
ब-सजय़ायें, यही दे-रु39या की अपेक्षा है.

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