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इंदिरा गांधी से अदावत लेकर राष्ट्र के चौथे पीएम बने मोरारजी देसाई

नई दिल्ली . मोरारजी देसाई हिंदुस्तान के चौथे पीएम थे. खास बात यह है कि वह राष्ट्र के पहले गैर-कांग्रेसी नेता थे जो पीएम की कुर्सी तक पहुंचे. 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक यानी 2 वर्ष126 दिन तक वे राष्ट्र के पीएम रहे. आज यानी 10 अप्रैल को मोरारजी देसाई की पुण्यतिथि है. इसी दिन 1995 को उनका देहांत हुआ था. मोरारजी देसाई की पुण्यतिथि के मौका पर उनसे जुड़े कुछ खास किस्सों पर एक नजर

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कहते हैं कि सियासत की भाषा कभी सीधी नहीं होती है. जो आप देखते हैं वो हकीकत से कोसों दूर हो सकता है, या जो कुछ हो रहा होता है उसका प्रभाव दूरगामी होता है. राष्ट्र को आजाद हुए एक दशक से ज्यादा का वक्त हो चुका था. 1960 दशक इंडियन पॉलिटिक्स में कई परिवर्तन लेकर आया था.इंडियन पॉलिटिक्स में जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी का उभरना न केवल आम लोगों के लिए कौतुहल भरा था, बल्कि कांग्रेस पार्टी के फायर बिग्रेड नेताओं के लिए ये किसी अचंभे से कम नहीं था. उसके पीछे ठोस वजह भी थी, ये बात यच है कि इंदिरा गांधी की परवरिश राजनीतिक परिवार में हुई थी. लेकिन उस वक्त तक जमीनी पॉलिटिक्स से उनका सीधा वास्ता नहीं था.

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जब मोरारजी पीएम बनने से चूके
बताया जाता है कि कांग्रेस पार्टी के फायर बिग्रेड नेताओं में से एक रहे मोरारजी देसाई के पीएम बनने के दो मौके आए थे. लेकिन वो कुर्सी तक पहुंचने में पास नहीं हो सके. 1964 में जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री पीएम की कुर्सी तक पहुंच गए, वहीं 1967 में शास्त्री जी के निधन के बाद इंदिरा गांधी को ये मौका हाथ लगा.

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81 वर्ष की आयु में पीएम बने मोरारजी देसाई
देश के दूसरे पीएम लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद ये कयास लगाया जाने लगा कि पीएम की कुर्सी पर मोरारजी देसाई की दावेदारी पक्की है. लेकिन सच में वो पीएम बनते-बनते रह गए  इंदिरा गांधी राष्ट्र की तीसरी पीएम बनीं. मोरारजी देसाई के लिए ये किसी वज्रपात से कम नहीं था. ये बात अलग है कि इंदिरा गांधी की कुछ नीतियों से जनता इस कदर तंग आ चुकी थी कि कांग्रेस पार्टी से लोगों का मोह खत्म होता जा रहा था. विपक्षी दलों ने इंदिरा गवर्नमेंट के विरूद्ध मोर्चा खोला  1977 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को करारी पराजय का सामना करना पड़ा. इस बार मोरारजी के सितारे बुलंद थे. 81 वर्ष की आयु में उन्होंने पीएम पद की गद्दी संभाली. 1977 में जब वो राष्ट्रमंडल राष्ट्रों के सम्मेलन में लंदन गए तो वहां एक साक्षात्कार में उन हालातों का जिक्र किया, जिसकी वजह से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो चुकी थी.

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