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‘खुद को अभिव्यक्त करने का ये सबसे अच्छा तरीका’

भाषा ज़िंदगी से बहुत अलग होती है. मैं इन दोनों को एक-दूसरे में कैसे मिला सकती हूं! स्मृति समेत साहित्य में हर वस्तु पुरानी होती है. जो बोला नहीं जा सकता, उसे लिखा जाता है, क्योंकि लेखन एक मौन गतिविधि है, जो सिर  हाथ के जरिये की जा सकती है. मैं हमेशा स्वयं से कहती हूं कि मुझमें काफी भावनाएं नहीं हैं. यहां तक कि जब कोई वस्तु मुझे प्रभावित करती है, तो मैं उससे थोड़ी दूर हो जाती हूं.

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मैं बिल्कुल भी नहीं रोती. ऐसा नहीं है कि रोने वाले लोगों की तुलना में मैं ज्यादा साहसी हूं. रोने वालों के पास साहस होता है, जबकि मैं कायर हूं. हालांकि अंतर बहुत कम है, मैं अपनी ताकत का प्रयोग न रोने के लिए करती हूं. जब मैं स्वयं भावुक होती हूं, तो पीड़ित पक्ष को उठाती हूं,  कहानी में उसकी मरहम पट्टी करती हूं, जो विलाप नहीं करता है. मेरा मानना है कि दुख से मानव ज़िंदगी में सुधार नहीं आ सकता. ज़िंदगी में कभी न कभी आपके ऊपर इतना बोझ आ जाता है कि आप उसे झेल नहीं सकते.

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ऐसी ही परिस्थितियों में मैंने लिखना प्रारम्भ किया था, क्योंकि शब्दों को छोड़कर खुद को अभिव्यक्त करने का  कोई उपाय मेरे पास नहीं था. मैंने हमेशा केवल अपने बारे में लिखा है. लिखते वक्त खुद लेखक को यह पता नहीं होता है कि उसकी रचना कैसी है. जब लेखन पूर्ण हो जाता है, तभी इसका पता चलता है. एक समय मैं यह सोच रही थी कि जिस तरह से हम कार्य करते हैं, संसार में लोगों को उससे अलग तरीके से बिना किसी रक्षक के चलना चाहिए, जहां लोगों को अलग तरीके से सोचने  लिखने की इजाजत हो.

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