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शोर-शराबा सेहत के लिए नुकसानदेह बीमारी है

मेरे एक परिचित शख्स उस समिति का भाग थे, जो उच्च कोर्ट द्वारा गठित की गई थी. मुंबई का ध्वनि प्रदूषण कम करने के लिए सुझाव देना उस समिति का कार्य था. वह एक मैरिज हॉल के पास अपना कार्य कर रहे थे. रिपोर्ट टाइप करने में उन्हें मेरी आवश्यकता पड़ी. उनकी रिपोर्ट टाइप करते हुए मुझे पहली बार ध्वनि प्रदूषण की भयावहता का पता चला. एक जानकारी में इतनी ताकत थी कि उसके बाद हर रोज शहर का शोर-शराबा मुझे परेशान करने लगा.
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करीब दो वर्ष बाद 2002 में मैं अपने उन्हीं परिचित के साथ ध्वनि प्रदूषण कम करने की दिशा में कार्य करने लगी. उनकी कानूनी जानकारी का फायदा लेते हुए सबसे पहले मैंने न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके शहर के कुछ इलाकों को शांत एरिया घोषित कराने में अदालती सफलता हासिल की. जब मेरा पहला ही कोशिश प्रभावशाली रहा, तो मुझे कई लोगों ने बधाई के साथ शोर से होने वाली खुद की परेशानियों से अवगत कराया.

मैं उनके लिए कार्य करने को तैयार तो थी, पर समस्या की व्यापकता को देखते हुए लगा कि मुझे इस कार्य के लिए एक औपचारिक ढांचा बनाना होगा. परिणाम स्वरूप 2006 में आवाज फाउंडेशन की आरंभ हो गई. यह संस्था मेरे द्वारा पिछले चार सालों से मुंबई में ध्वनि प्रदूषण के विरूद्ध चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों का संगठित रूप थी. हिंदुस्तान जैसे राष्ट्र में कोई भी प्रोग्राम बिना गाजे-बाजे के नहीं आयोजित होता. धार्मिक पर्व-त्योहार भी ध्वनि प्रदूषण के बड़े कारक हैं. मैं शहर के विभिन्न समुदायों में जाकर उनसे ध्वनि प्रदूषण के बारे में बात करने लगी.

उनसे बात करने पर मुझे पता चला कि वे सभी शोर से परेशान हैं  परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन वे इसलिए चुप हैं, क्योंकि इस शोर के पीछे बहुत प्रभावशाली लोग होते हैं.  धर्म आदि के मामले में कौन टांग अड़ाए! मुझे समझ में आ गया कि बिना जोखिम लिए कोई परिवर्तन नहीं आ सकता, उसके लिए भी महत्वपूर्ण है कि गवर्नमेंट द्वारा बनाए गए कानूनी प्रावधानों पर अमल हो. जनहित याचिका का सही इस्तेमाल करना मुझे आता था. 2009 में उच्च कोर्ट ने मेरी ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य गवर्नमेंट को ध्वनि प्रदूषण को लेकर कड़े आदेश दिए.

हमारी संस्था के कार्य का प्रभाव दिखने लगा था. दरअसल आवाज पहली ऐसी संस्था थी, जिसने हिंदुस्तान में ध्वनि प्रदूषण को लेकर डाटा इकट्ठा किया था. तब से लेकर आज तक मैं न्यायालय के अतिरिक्त अनेक रचनात्मक उपायों से लोगों को ध्वनि प्रदूषण के विरूद्ध जागरूक करती रहती हूं.कई लोग मुझे यह समझते हैं कि मैं उत्सवों के रंग में खत्म डालने वाली कार्यकर्ता हूं. कुछ लोग मेरे कार्य में धार्मिक कोण भी निकाल लेते हैं, मगर मुझे अपना कार्य पता है.

मैं जानती हूं कि त्योहार खुशियों के लिए होते हैं  शोर-शराबा सेहत के लिए नुकसानदेह बीमारी है, जिसका उत्सव से कोई लेना-देना नहीं. मैं इसी बीमारी को मिटाने में जुटी हूं. लोगों को जागरूक करने के लिए मैं मुंबई की सड़कों पर एक विशेष ऑटोरिक्शा संचालित कराती हूं, जिसकी बॉडी पर सैकड़ों हॉर्न लगाए गए हैं. ये हॉर्न लोगों का ध्यान इस तरफ ले जाते हैं कि सड़कों पर हॉर्न का किस तरह बेजा प्रयोग किया जाता है. इस ऑटो पर ‘हॉर्न नॉट ओके प्लीज’ लिखा है. साथ ही मैंने रेत खनन माफियाओं के खिलाफ भी अपनी मुहिम छेड़ रखी है.

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