Tuesday , November 20 2018
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9 वर्ष में 150 मामलों में मिली कामयाबी

कई साल पहले की बात है. नए घर में रंग-रोगन का कुछ कार्य अभी बाकी था, लेकिन मैं परिवार के साथ महाराष्ट्र के सतारा स्थित अपने नए घर में रहने के लिए आ चुका था. अपने तीन वर्ष के बेटे इशारा को उसके प्री-स्कूल में भेजने के बाद उस दिन मैं अपनी इंजीनियरिंग साइट पर व्यस्त था मेरी पत्नी नए घर में सामान व्यवस्थित करने में जुटी थी. मेरी पत्नी यह कार्य जिला परिषद के एक सरकारी स्कूल में शिक्षण के अपने पेशे के साथ किसी तरह संभाल रही थी.

हम सभी अपने नए आशियाने को लेकर बहुत उत्साहित थे. होते भी क्यों नहीं, शहर की घनी आबादी से दूर यह कितना प्यारा बंगला था  यहां शाम को इशारा के खेलने के लिए खासी स्थान भी थी.दोपहर के बारह बजे थे, यह वक्त था इशारा के स्कूल से घर वापस आने का. उस दिन कुछ देरी हुई, तो हम दोनों पति-पत्नी ने एक-दूसरे को फोन करके बच्चे के बारे में जानकारी ली. जब हम दोनों को यह मालूम हुआ कि किसी को बेटे की समाचार नहीं है, तब हमें चिंता हुई.

थोड़ी ही देर हुई कि करीब दो बजे घर के लैंडलाइन पर किसी अजनबी का फोन आया. हमें उस तरफ से बताया गया कि इशारा का अपहरण कर लिया गया है  वह हमें एक लाख रुपये के बदले मिलेगा. एक बार तो हमें इस पर विश्वास ही नहीं हुआ. लेकिन जल्द ही हमें घटना की सच्चाई का एहसास हो गया.बेटे के लिए मैं कोई भी मूल्य अदा करने को तैयार था. लेकिन मुझे यह भी अंदाजा था कि अपहरणकर्ताओं की बात एकदम से मान लेने पर इसकी क्या गारंटी है कि कल को कोई दूसरी मांग नहीं करेंगे या किसी दूसरे बच्चे के साथ ऐसा नहीं करेंगे! इसलिए महत्वपूर्ण था कि अपने बच्चे को सकुशल वापस पाने के साथ उन बदमाशों को भी कानून के हवाले किया जाए.

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इंसानी भेष में उस शैतान ने मेरे बच्चे की जान ले ली थी

मैंने रुपयों से भरा बैग अपहरणकर्ताओं के बताए जगह पर पहुंचा दिया. मुख्य सड़क से वह स्थानकुछ ही दूरी पर थी. बमुश्किल दो-तीन मिनट बाद हम दोबारा वहां पहुंचे, तो बैग गायब था. पुलिस की सारी योजना धरी की धरी रह गई  अपहरणकर्ता भागने में सफल रहा. जिसका भय था, वही हुआ, पैसे देने के बावजूद मेरा बेटा मुझे वापस नहीं मिला.
डेढ़ महीने बीते थे कि अपहरणकर्ता ने दूसरी मांग रखी. इस बार मैंने पुलिस के साथ मिलकर अपहरणकर्ता को दबोच लिया. अपहरणकर्ता लकड़ी का कार्य करने वाला एक कारीगर निकला, जो मेरे दफ्तर में भी कार्य कर चुका था. लेकिन तब तक बहुत ज्यादा देर हो चुकी थी. इंसानी भेष में उस शैतान ने मेरे बच्चे की जान ले ली थी.

मैं चाहता था कि जो मेरे साथ हुआ, वह किसी भी परिवार के साथ न हो. इसके लिए मैंने एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी खोली, जो मेरे जैसे पीड़ित परिवारों की फ्री मदद करती है. मेरे पास कोई प्रशिक्षित जासूस नहीं है, लेकिन मैं इस बात में यकीन करता हूं कि परिवार के सदस्यों की जानकारी के आधार पर बहुत ज्यादा कुछ किया जा सकता है  मैंने ऐसा किया भी है. हालांकि हर बार लोग मेरी मदद लेने को तैयार नहीं होते, उन्हें मेरे कार्य पर संदेह भी होता है. फिर भी कई तरह के जोखिम उठाते हुए मैंने पिछले नौ वर्ष में डेढ़ सौ मामलों में अनेक परिवारों को वह खुशी दी है, जो कभी मुझसे छिन गई थी.

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