Tuesday , November 20 2018
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उफान पर पहुंचा अविश्वास का माहौल

देश में आधार से संबंधित आंकड़ों के दुरुपयोग को लेकर पहले से ही आशंकाएं जताई जा रही थीं कि अब डाटा लीक की खबरों ने अविश्वास के माहौल को उफान पर पहुंचा दिया है. गड़े मुर्दे उखाड़ने वालों को भी सक्रिय होने का मसाला मिल गया. 21वीं सदी जिस तेजी से इलेक्ट्रॉनिक युग में तब्दील हुई है, ऐसे में आंकड़ों के किसी भी रूप में व कहीं भी फीड होने के बाद उनके दुरुपयोग से जुड़ी संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है. आज मोबाइल फोन व इंटरनेट की बदौलत कनेक्टिविटी का जो जाल आभासी संसार में बनता जा रहा है उससे संबंधित पहलुओं को समझना आज के परिप्रेक्ष्य में बेहद महत्वपूर्ण हो गया है. मसलन यदि आपने अपने कार्यालय के कंप्यूटर पर कुछ खोजने का कोशिश किया है तो आपकी इस खोज का रिकॉर्ड आपके मोबाइल फोन या आपके घर के कंप्यूटर पर देखकर आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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यह कार्य संबंधित सॉफ्टवेर कंपनियां हमारे मोबाइल नंबर, ईमेल व इंटरनेट इत्यादि को आपस मे लिंक करके या जोड़कर करती हैं. तर्क उपभोक्ताओं को ज्यादा सुविधा व बेहतर सेवा देने का दिया जाता है, लेकिन इससे जुड़ी बात यह भी है कि इन सूचनाओं का प्रयोग किसी सरकारी या प्राइवेट एजेंसी द्वारा भी किया जा सकता है. आवश्यकता के मार्केट में व्यक्तियों व संस्थाओं से संबंधित आंकड़ों के मकड़जाल से खेलने वाले नित-नए सॉफ्टवेयरों का कारोबार भी जोर पकड़ता जा रहा है. ये सॉफ्टवेयर आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर जनता की पसंद-नापसंद का पता लगाकर उसे तरह-तरह से प्रभावित करने की प्रयास करते हैं व समय समय पर हमारी रुचि से संबंधित सूचना व उत्पाद सुझाते रहते हैं.

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फिर जहां पॉलिटिक्स चारों व छाई हो वहां हमारी राजनीतिक पसंद-नापसंद का विश्लेषण किया जाना दंग करने वाली बात नहीं होनी चाहिए. हम हंिदूुस्तानी तो अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद जाहिर करने में कुछ ज्यादा ही मुखर हैं. वाट्स एप, ट्वीटर व फेसबुक के युग में विश्लेषण व भी सरल है. फिर यदि कोई राजनीतिक दल या आदमी जनता की राजनीतिक पसंद-नापसंद जानने के लिए वाट्स एप, ट्वीटर व फेसबुक जैसी कंपनियों को कोई व्यावसायिक प्रस्ताव दे तो लाभ-हानि के सिद्धांतों के आधार पर चलने वाली व्यावसायिक कंपनियों के रुख को भांपने में हमें ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिए, बशर्ते कि उसमें कोई कानूनी पेच आड़े न आता हो. ऐसे में किसी की भी राजनीतिक पसंद-नापसंद से खिलवाड़ की संभावनाओं से इन्कार कैसे किया जा सकता है.

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राजनीतिक दलों का तो मार्केट में उपलब्ध ऐसी सेवाओं के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है. यह आसार उस स्थिति में व भी प्रबल हो जाती है जब इन दिनों पॉलिटिक्स में सबकुछ चुनाव जीतने के इर्द-गिर्द ही केंद्रित होता जा रहा हो. इस प्रकार के प्रलोभन के प्रति किसी राजनीतिक दल के लिए अपने आपको रोके रखना सरल नहीं होता है. यद्यपि जो लोग आज भी पॉलिटिक्स में नैतिकता व शुचिता की बात करते हैं उन्हें इससे परहेज भले ही हो सकता है, लेकिन ऐसे लोगों की तादाद अब कुछ खास नहीं बची है. किसी समय चुनाव जीतना केवल सत्ता तक पहुंचने का साधन मात्र था, लेकिन अब यह साध्य भी बन चुका है. जहां येन केन प्रकारेण चुनाव जीतना पॉलिटिक्स की केंद्रीय गतिविधि का रूप लेता जा रहा हो वहां कैंब्रिज एनालिटिका जैसी एजेंसियों की भरमार होना कोई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए.

बात भरोसे या विश्वास की है व कायदा कहता है कि हमारे से संबंधित आंकड़ों का प्रयोग केवल उसी मकसद के लिए किया जाना चाहिए, जिसकी हमने इजाजत दी है. इस तर्क को अप्रत्यक्ष लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता के नुमाइंदों पर भी लागू किया जा सकता है, जहां जनता अपनी पसंद अपने प्रतिनिधियों के जरिये अभिव्यक्त करती है. किसी जमाने में तो प्रत्यक्ष लोकतंत्र का चलन था, जिसमें जनता खुद अपने लिए कानून तक बनाती थी, लेकिन मतदाताओं की संख्या बढ़ने के कारण अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली को ईजाद किया गया, जिसमें जनता अपनी पसंद-नापसंद जाहीर करने के लिए अपने नुमाइंदों को चुनने लगी. हिंदुस्तान जैसे बड़े मुल्कों में भी इस पद्धति को अपनाया गया व उम्मीद की गई कि जनप्रतिनिधि जनभावना के अनुरूप काम करेंगे, लेकिन जल्दी ही गड़बड़ होने लग गई व कुछ जनप्रतिनिधि जनभावना के उल्टा चलने लग गए.

सवाल उठा कि क्या ऐसे जनप्रतिनिधियों का आचरण जनता का भरोसा तोड़ने वाला नहीं है? जनता ने जिस भावना को ध्यान में रखते हुए इन्हें अपना नुमाइंदा बनाया था क्या इन्होंने अपने आचरण में उस जनभावना का कोई खयाल रखा? तो फिर इस श्रेणी के जन प्रतिनिधियों के आचरण को फेसबुक पर लग रहे आरोपों से जोड़कर देखने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. यहां भी तो भरोसा ही तोड़ा जा रहा है, कोई आंकड़ों को लेकर भरोसा तोड़ रहा है तो कोई जन भावनाओं को लेकर. इस लिहाज से ताजा बैंक घोटालों में भी जनता का भरोसा तोड़ा गया है. बैंक ने ऋण दिया तो था किसी कार्य के लिए, जबकि घोटालेबाजों ने उसका प्रयोग किसी व कार्य के लिए किया.

यहां बैंकों ने अपने खातेदारों का भरोसा तोड़ा व खातेदारों के पैसे को गलत तरीके से गलत लोगों को दिया व इन गलत लोगों ने भी उस पैसे का प्रयोग बैंक की भावना के उल्टा किया. इस तर्क को आगे बढ़ाकर उन सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों पर भी लागू किया जा सकता है जो जनभावना के प्रतिकूल कार्य करते हैं. पिछले कुछ दशकों से अधिकतर सरकारी कर्मचारियों का व्यवहार भी मठाधीशों जैसा होता जा रहा है जो जन सेवक व मुख्य सेवक की अवधारणा से कोसों दूर हैं. इसलिए अब जनता के टूटते भरोसे की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है. इसके लिए केवल कानून-कायदों से कार्य चलाने वाला नहीं है, बल्कि जनता को व सजग व जागरूक होना होगा ताकि उसे ‘इस्तेमाल की वस्तु’ मानकर चलाने वालों को जवाब मिल सके व वे समझ सकें कि इंसान एक विवेकशील प्राणी है.

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