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मानसून से रिश्ता अब टूटने की कगार पर

मानसून को लेकर एक बार फिर राहत देती भविष्यवाणियां सामने आ गई हैं. व्यक्तिगत एजेंसी स्काईमेट की तरफ से दावा किया जा रहा है कि इस वर्ष जून से सितंबर के बीच चार महीने की अवधि में 70 फीसद बारिश होगी. इस एजेंसी के अनुसार यह सामान्य मानसून की भविष्यवाणी है. यानी इस दौरान सूखे की संभावना नहीं रहेगी, पर दक्षिणी पूर्वोत्तर हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है.
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अक्सर इस बात पर राहत जताई जाती है कि अगर मानसून ठीकठाक बीत रहा है तो राष्ट्र की जीडीपी पर कोई निगेटिव प्रभाव पड़ने की संभावना भी नहीं रहती है. मानसून में बादल खूब बरसेंगे तो फसल अच्छी होगी, ग्रोथ रेट तेज भागेगी  अच्छे दिन आकर ही रहेंगे. स्कूटर, बाइक, टीवी, फ्रिज से लेकर जूते-कपड़े बनाने-बेचने वाली कंपनियां भी इस भविष्यवाणी के आधार पर अपने मुनाफे का अंदाजा लगाने लगती हैं. राज्यों के बीच पैदा जल विवादों  जनता के बीच अक्सर होने वाले जल-दंगों से परेशान रहने वाली सरकारें इन मौसमी अंदाजों को देख-सुनकर अपने माथे से पसीना पोंछती नजर आती हैं, क्योंकि इनसे उन्हें कुछ सुकून मिलता दिखता है. उन्हें लगता है कि किसान अब सिंचाई के पानी की कमी का रोना नहीं रोएंगे  जनता पानी की मांग करते हुए सड़क पर नजर नहीं आएगी.

भविष्यवाणियां तो पहले भी हुईं, लेकिन
विडंबना यह है कि ऐसी राहतभरी भविष्यवाणियां पहले भी कई बार हुई हैं, लेकिन न तो किसानों के कष्ट कम होते हैं  न राज्य अपने हिस्से का एक बूंद पानी दूसरों को देने के मामले में जरा भी उदार नजर आते हैं. ऐसे में सवाल है कि मानसून की भविष्यवाणी  उनसे मिलने वाली राहतों के बीच बिगड़े समीकरणों की वजह क्या है?

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100 फीसद सही भविष्यवाणी संभव नहीं
हालांकि इस मामले में एक हकीकत यह है कि तमाम उपग्रहों  सुपर कंप्यूटरों के संजाल के बावजूद मौसम  मानसून के अंदाज को सौ फीसद सही समझ पाना बेहद कठिन है. चाहे जितनी सटीक भविष्यवाणी का दावा किया जाए, पर हकीकत यह है कि मानसून के दौरान बारिश  उसके पैटर्न में थोड़ी-बहुत ऊंच-नीच का खतरा हमेशा मौजूद रहता है. इसलिए नीतियां बनाते समय या भविष्यवाणी के आधार पर राहतों का आकलन तय करते समय इस उतार-चढ़ाव के लिए स्पेस रखना महत्वपूर्ण है. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जलवायु बदलाव जैसे कारकों की वजह से पूरी संसार का मौसमी-चक्र तेजी से बदल रहा है.

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मानसून से रिश्ता अब टूटने की कगार पर
अगर इन बातों को हाशिये पर रखा जाएगा  इनके आधार पर तैयारियां नहीं की जाएंगी तो मानसून पर हमारी डगमगाती निर्भरता कम होने के बजाय  बढ़ सकती है, पर इसके कई पहलू हैं जो साबित करते हैं कि मानसून जैसी बारिशों से रिश्ता अब टूट की कगार पर है. जैसे कई राष्ट्रों ने ऐसी फसलों पर ध्यान देना भी प्रारम्भ कर दिया है, जिनके लिए पानी की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती. उधर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई  जंगलों में अतिक्रमण के चलते बारिश अपना रास्ता बदल रही है. हिंदुस्तान में ही अब तक जो उत्तर-पूर्वी एरिया बारिश के लिए जाना जाता था, दावा है कि आगे चलकर ये इलाके सूखा झेंलेंगे  अपने सूखेपन के लिए मशहूर राष्ट्र के मध्य-पश्चिमी हिस्से जबर्दस्त नमी के लिए जाने जाएंगे.

गुजरात-राजस्थान में अब ज्यादा बारिश हो रही
आइआइटी बांबे बारिश के 112 वर्ष के आंकड़ों का हिसाब लगाकर बता चुकी है कि राष्ट्र के कुल 632 में से 238 जिलों में बरसात का पैटर्न बदल चुका है. बदले हुए पैटर्न को राजस्थान गुजरात में भी देखा जा सकता है, जहां 1901 से 2013 के बीच राजस्थान में 9 फीसदी तो गुजरात में 26.2 फीसदी ज्यादा बारिश दर्ज की गई है. पिछले कुछ सालों में इन दोनों प्रदेशों में सौ से ज्यादा लोगों ने अपनी जान बारिश के कारण गंवाई है.

अच्छी बारिश वाले इलाकों में पड़ रहा सूखा
अमेरिका स्थित मेसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने अपने एक शोध में बताया कि बीते 15 वर्षों में हिंदुस्तान के उत्तरी  मध्य इलाकों में अच्छा पानी बरसा है, लेकिन इसका जोर उन इलाकों में ज्यादा है, जो हाल तक सूखे रहते थे. साफ है कि मानसून के इस नए ट्रेंड को ध्यान से समझने  प्रभावित इलाकों के लिए ठोस रणनीति बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि इसी दौरान उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, असम, जम्मू- कश्मीर, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश  नगालैंड जैसे ज्यादा बारिश वाले राज्यों में हर दूसरे-तीसरे वर्ष सूखे की नौबत आ रही है  किसान अपनी सूखी फसलों का मुआवजा मांगने लगे हैं.

देश का 40 फीसद भाग मानसून पर निर्भर
आज भी राष्ट्र की खेती के 40 फीसद हिस्से को मानसून पर निर्भर बताया जाता है, पर सच्चाई यह है कि अन्न पैदा करने वाले ज्यादातर उत्तर इंडियन राज्यों, पंजाब, यूपी, हरियाणा, बिहार आदि में सिंचाई के दूसरे विकल्प मौजूद हैं, जिससे मानसूनी वर्षा पर उनकी निर्भरता घटी है. पहले खेतों की सिंचाई बादलों से होने वाली वर्षा  उन नहरों पर टिकी थी जो सूखे की स्थिति में खुद भी सूख जाती थीं, लेकिन 1960 के बाद से ट्यूबवेल के जरिये खेतों को सींचा जाने लगा जिन पर मानसून प्राय: कोई प्रभाव नहीं डालता.

आज समस्या केवल उन्हीं इलाकों में है जहां सिंचाई के लिए ट्यूबवेल जैसे साधनों का उपयोग नहीं किया जा रहा है  जहां किसान पूरी तरह से नहरों और मानसून पर आश्रित हैं.हालांकि ट्यूबवेल से सिंचाई का एक पक्ष यह है कि धीरे-धीरे कई इलाकों में भूजल स्तर गिरता जा रहा है, जो मानसून में कमी के चलते  संकटपूर्ण स्थिति में पहुंच जाएगा. इसलिए सिंचाई के गैर-परंपरागत विकल्पों पर  कार्य करने की आवश्यकता है, जैसे नदीजोड़ो योजनाओं को अमल में लाया जाए, ताकि राष्ट्र का कोई खेत सिंचाई के अभाव में सूखने न पाए.आवश्यकता ऐसी योजनाओं की है, जिससे राष्ट्र के किसी एक इलाके में आई बाढ़ से जमा हुए पानी को उन इलाकों में पहुंचाया जाए जहां उसकी आवश्यकता है.

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

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