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जानिए बिश्नोई समाज व काले हिरण के बीच क्या है गहरा संबंध

ब्लैक बक यानी काला हिरण या इंडियन मृग, कृष्णमृग बहुसिंगा की एक प्रजाति है. ये बहुसिंगा प्रजाति की इकलौती जीवित प्रजाति है. इसका जूओलॉजिकल नाम एंटीलोप सर्विकपारा है.इंडियन उपमहाद्वीप में इसकी चार प्रजातियां पाई जाती है. अपने घुमावदार सींगों के कारण ये सुंदर हिरणों में एक है. नर तीन से चार घुमाव वाले सींग  गहरे भूरे या काले रंग का जबकि मादा बिना सींग के पीलापन लिए भूरे रंग की होती है. यह राजस्थान का राज्य-पशु भी है.Image result for काला हिरण शिकार मामला: जानिए बिश्नोई समाज व काले हिरण के बीच क्या है गहरा संबंध

 

शिकार पर रोक

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20 वीं सदी के दौरान, अत्यधिक शिकार, वनों की कटाई  हरे- भरे घास  जलयुक्त स्थलों की कमी के कारण काले हिरण की संख्या तेजी से घटी. इसे देखते हुए हिंदुस्तान गवर्नमेंट ने 1972 के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची एक में डाल कर काले हिरण के शिकार को प्रतिबंधित कर दिया.

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राजस्थान के दो अभ्यारण्य में इनकी संख्या करीब 6300 है.

-1947 में इंडियन उपमहाद्वीप संख्या थी 80 हजार

25 हजार राष्ट्र में काले हिरण की संख्या (अनुमानित)

-1964 में घटकर 8000 रह गई

-19वीं सदी के अंतिम सालों में सिर्फ पंजाब के जल संपन्न क्षेत्रों में 8 से दस हजार काले हिरण थे.

– बांग्लादेश में हो चुके हैं विलुप्त

मान्यता

जोधपुर का बिश्नोई समाज काले हिरण को अपने गुरु ईश्वर जंबाजी उर्फ जंबेश्वर का अवतार मानते हैं. वे काले हिरण  वृक्षों के लिए अपनी जान तक दे सकते हैं. 1451 में जन्मे जंबाजी उर्फ जंबेश्वर ईश्वर ने सभी जीव-जंतुओं के प्रति दयाभाव, साफ-सफाई, समर्पण, शाकाहार  सच्चाई समेत अपने अनुयायियों के लिए 29 धर्मादेश दिए थे.

इन 29 धर्मादेशों (बिश = 20  नोई = 9) का अनुपालन करने वालों को ही बिश्नोई बोला गया.बताया जाता है कि 1643 में होलिका दहन के लिए पेड़ काटने के विरोध में बुचोजी ने अपने प्राण त्याग दिए थे.

तेज गति से बचाते जान

हिरण की अन्य प्रजातियों की ही तरह ही बहुत तेज दौड़ते हैं. इस कारण केवल चीता ही उनका सरलता से शिकार कर सकता है. हालांकि, पहाड़ी कुत्ते और सियार भी इनके बच्चों को अपना शिकार बना लेते हैं.

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