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1989 नहीं भूले हूं, खुदा के लिए बस करो’

“24 अक्टूबर 1989, दिन के 12 बज रहे थे। भागलपुर शहर के पर्बती इलाके से रामजन्मभूमि आंदोलन के शिला पूजन का एक जुलूस शुरू हुआ था।” भागलपुर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष सज्जाद अली ने जब पिछले महीने 17 मार्च को केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित चौबे की ‘शोभा यात्रा’ के दौरान सांप्रदायिक तनाव को देखा तो उन्हें बरबस ही 1989 का वो जुलूस याद आ गया और आंखोंदेखी बताने लगे। “जुलूस में जमकर नारे लगाए जा रहे थे। नारे पूरी तरह से डराने वाले थे। जुलूस शहर में दस्तक देने वाला था। जुलूस में शामिल भीड़ की नीयत को आसनी से महसूसस किया जा सकता था। जुलूस ततारपुर की तरफ बढ़ रहा था। ततारपुर मुस्लिम इलाका है। जुलूस को ततारपुर वालों ने रोका। मुस्लिम स्कूल के पास पुलिस ने भी रोकने में मदद की।”

“पुलिस ने जुलूस का नेतृत्व कर रहे लोगों से कहा कि ततारपुर वाले अड़े हुए हैं और वो चौक के बाद जुलूस को जाने नहीं देंगे। गुस्से में लोगों ने पुलिस पर बम फेंका। वो बम पटाखे थे। इससे धुएं का गुबार बना जिसमें एसपी, डीएम सब छुप गए। उस वक्त भागवत झा आजाद कांग्रेस के सांसद हुआ करते थे।” “उन्होंने मुसलमानों को पैसे देकर जुलूस को रोकने के लिए तैयार किया था। उन्हें लगा था कि कुछ होगा तो पैसे देकर समझौता करा दिया जाएगा और मुसलमानों का वोट आसानी से हासिल कर लिया जाएगा। लेकिन मामला हाथ से निकल गया। जुलूस ने पर्बती से ही मुसलमानों को मारना शुरू कर दिया था और तीन दिनों तक कत्लेआम चलता रहा।”

शहर का माहौल

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उनके साथ बैठे कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष गिरीश प्रसाद सिंह कांपती आवाज में बताते हैं कि कैसे भागवत झा आजाद और शिवचंदर झा ने आपसी टकराव में शहर का माहौल खराब किया था जबकि दोनों कांग्रेस के नेता थे। गिरीश सिंह कहते हैं कि दोनों मुसलमानों के नेता बनना चाहते थे।
शहर के मुसलमान 17 मार्च को अर्जित चौबे के जुलूस में नारे और उसकी मंशा की तुलना 1989 के शुरुआती दिनों से कर रहे हैं। गिरीश सिंह कहते हैं कि उस वक्त शहर के एसपी बिहार के वर्तमान डीजीपी केएस द्विवेदी थे। जैसे प्रशासन ने अभी चौकसी दिखाकर हालात को नियंत्रण में कर लिया, वैसा तब नहीं किया गया था।

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सांप्रदायिक तनाव

1989 के दंगे में मुसलमानों के खिलाफ दो जातियों के बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की बात कही जाती है। वो हैं- यादव और गंगोता। कामेश्वर यादव को शहर इसी रूप में जानता है। वो लंबे समय तक जेल में भी बंद रहे। इस बार भी अर्जित चौबे की शोभा यात्रा के बाद जो सांप्रदायिक तनाव फैला उसे लेकर मुसलामानों का कहना है कि यादवों ने जुलूस का साथ दिया। जिस नाथनगर इलाके में शोभा यात्रा के दौरान तनाव फैला था, वहीं मोहम्मद अकबर ने एक छोटा-सा क्लिनिक खोल रखा है। अकबर 17 मार्च के सांप्रदायिक तनाव के बारे में कहते हैं, “लोग जमकर मुस्लिम विरोधी नारे लगा रहे थे। अगर इस जुलूस को बहुसंख्यक हिंदू का साथ मिला होता तो हालात अनियंत्रित हो जाते। हालांकि यादवों ने जुलूस का साथ दिया, लेकिन तांती जाति के हिंदू उनके साथ नहीं गए।”

रामनवमी के मौके पर

प्रशासन पूरे वाकये को तात्कालिक घटना से आगे बढ़कर देख रहा है। भागलपुर (प्रमंडल) के कमिश्नर राजेश कुमार का कहना है कि जुलूस तात्कालिक कारण हो सकता है। उन्होंने कहा कि प्रशासन देखने की कोशिश कर रहा है कि बस्तियों में क्या हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भीतर ही भीतर कोई आक्रोश का मामला तो नहीं है जिसे शोभा यात्रा से हवा मिली। उनका कहना है कि अगर मामला जुलूस बनाम एक खास समुदाय का होता तो हालात ज्यादा गंभीर होते क्योंकि जुलूस में शामिल हिंसक भीड़ की मानसिकता बिना सोचे समझे काम करती है।

रामनवमी से एक महीना पहले शहर में भगवा क्रांति नाम के एक संगठन का जन्म हुआ। उसने रामनवमी के मौके पर विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया और राम की विशाल मूर्ति भी बनवाई थी। भगवा क्रांति का प्रशासन से जुलूस निकालने को लेकर टकराव की भी स्थिति बनी। राजेश कुमार ने कहा कि ऐसे संगठनों पर तीखी नजर रखना बहुत ज़रूरी होता है। उन्होंने भगवा क्रांति के एक आमंत्रण पत्र को दिखाते हुए कहा कि वो इस कार्ड के प्रिंटर के नाम की तलाश करते रहे, लेकिन कहीं मिला नहीं।

सियासी जमीन

एक चीज यहां दिलचस्प दिखी कि अर्जित चौबे की शोभा यात्रा और उसके बाद फैले सांप्रदायिक तनाव को लेकर मुसलमान समुदाय खुलकर नाराजगी और आशंका जाहिर कर रहा है, लेकिन हिंदू समुदाय के लोग बात करने से बच रहे हैं। हिंदू पत्थरबाजी के बारे में तो बताते हैं, लेकिन किसकी गलती थी और शोभा यात्रा निकालना कितना सही था या गलत इस पर कोई भी टिप्पणी करने से बचते दिखे। बीजेपी के जिला अध्यक्ष रोहित पांडे का कहना है कि टकराव या तनाव की स्थिति शोभा यात्रा के दौरान नहीं बल्कि उसके बाद पैदा हुई है।

वहीं पर मौजूद बीजेपी के एक और नेता ने कहा कि नाथनगर में दोनों समुदायों के बीच पहले का ही कुछ मामला था और शोभा यात्रा बहाना बन गई। कई लोगों का मानना है कि अर्जित चौबे शहर में राजनीतिक जमीन को मुकम्मल करना चाहते हैं, इसलिए वो इन चीजों का सहारा ले रहे हैं। साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में अर्जित ने भागलपुर शहर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन कांग्रेस के अजित कुमार शर्मा से हार गए थे।

‘मुसलमान और पाकिस्तान’

निहालुद्दीन 80 के दशक में बीजेपी में थे। निहालुद्दीन ने बीजेपी के टिकट पर महगामा विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था। महगामा अब झारखंड में है। अर्जित की शोभा यात्रा को लेकर निहालुद्दीन कहते हैं, “बीजेपी और अर्जित जैसे नेताओं के पास दो ही साबुन बचे हैं जिनसे नहाकर ये खुद को खरा बनाना चाहते हैं।” “ये साबुन हैं- मुसलमान और पाकिस्तान। पर इन्हें अब समझ लेना चाहिए कि हिंदू भी इनकी नफरत की राजनीति को समझ चुके हैं। ये 1989 नहीं है कि हिंदुओं को भड़का दिए और वो मुसलमानों के खिलाफ गोलबंद हो गए।”

भागलपुर (प्रमंडल) के कमिश्नर राजेश कुमार को लगता है कि शहर में ऐसे तनावों पर नियंत्रण पाना बहुत मुश्किल नहीं है, लेकिन गांवों में हुआ तो आसान नहीं होगा। राजेश कुमार कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों की कुछ मस्जिदों से भागलपुर नहीं जाने का एलान किया गया था। उन्होंने कहा कि ऐसी घोषणाओं से अफवाहों को बल मिलता है। राजेश कुमार चाहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में पनपने वाले सांप्रदायिक तनावों या अफवाहों पर कड़ी नजर रखी जाए।

‘शोभा यात्रा’ के बाद

शहर के अहमदनगर में रहने वाली मलका बेगम अर्जित चौबे की ‘शोभा यात्रा’ के बाद फैले सांप्रदायिक तनाव से डरी हुई हैं। अक्टूबर, 1989 में उनके चंधेरी गांव में दंगाइयों ने करीब 60 मुसलमानों को मार दिया था। मलका ने अपनी आंखों से माता-पिता की हत्या होते देखी थी। मलका को दंगाइयों ने मरा हुआ समझकर छोड़ दिया था। वो एक तालाब में दर्जनों लाशों के साथ घंटों रही थीं। ये सब कहते हुए मलका की आवाज फंस-सी जाती है। कुछ देर रुकती हैं और रोते हुए कहती हैं कि इंसानियत का जरा भी ख्याल है तो खुदा के लिए शहर में ऐसे जुलूस मत निकालो। वो कहती हैं, “मैं क्षत-विक्षत लाशों के बीच तालाब में रही हूं। अपने खून के साथ अपने लोगों के खून से तालाब का पानी लाल हो गया था। अब बस करो। अब नहीं।”

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