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भारत-चीन सीमा तक क्यों नहीं पहुंच पा रहीं बोफोर्स तोपें?

अगर भविष्य में हिंदुस्तान  चाइना के बीच कभी युद्ध हुआ, तो हमारी बोफोर्स तोपें, बॉर्डर तक नहीं जा पाएंगी ये सुनकर दंग होने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि ये एक कड़वा सत्य है  इसके बारे में आज आपको पूरी जानकारी होनी चाहिए ख़बर ये है, कि सेना की लगातार कोशिशों के बावजूद, हिंदुस्तान चाइना की सीमा पर बोफोर्स तोपें पहुंचाने में बहुत कठिनाई हो रही है

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भारतीय सेना ने पिछले कुछ सालों में दो बार, बोफोर्स तोप को अरुणाचल प्रदेश के किबिथू  Line Of Actual Control पर मौजूद कुछ दूसरी Posts तक ले जाने की प्रयास की है लेकिन ये कोशिशें सफल नहीं हो पाईं क्योंकि पूरे इलाके में सड़कों  पुलों की हालत बहुत बेकार है

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कुछ जगहें तो ऐसी हैं, जहां ज़मीन के धंसने का ख़तरा हमेशा बना रहता है ऐसी जगहों पर स्थायी सड़कें बनाना बहुत कठिन है  जो सड़कें मौजूद थी वो भी ध्वस्त हो चुकी हैं Experts के मुताबिक, बोफोर्स तोपें अक्सर ऐसी जगहों पर पहुंचकर अटक जाती हैं

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बोफोर्स तोपों की आवाजाही का Trial, अरुणाचल प्रदेश के Tezu  Kibithu के बीच किया गया थाये दूरी लगभग 225 किलोमीटर की थी लेकिन बेकार सड़क होने की वजह से सिर्फ 40 से 50 मीटर की दूरी के बाद बोफोर्स तोपों को Gun-Towing Vehicles पर लादना पड़ता था

आम तौर पर सेना के किसी Convoy को ये दूरी तय करने में दो दिनों का वक्त लग जाता है ऐसे में बोफोर्स जैसी भारी तोपों को कितना वक्त लगेगा, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है कठिनाई इस बात की है, कि ऐसे इलाकों में सिर्फ हल्के वज़न वाले हथियारों को ही By Air यानी वायु मार्ग से ले जाया जा सकता है High Altitude वाले इलाकों में बोफोर्स तोप को सिर्फ सड़क मार्ग से ले जाना ही संभव होता है

सेना लंबे समय से चाहती है, कि बोफोर्स तोपों की तैनाती LAC से सटे संवेदनशील इलाकों में की जाए लेकिन उसकी ये ख़्वाहिश पूरी नहीं हो पा रही है हालांकि LAC के कुछ इलाक़ों में बोफोर्स पहले से ही तैनात है लेकिन कुछ संवेदनशील इलाक़ों में बोफोर्स को पहुंचाना संभव नहीं है इसके लिए सेना को अभी दो-लेन वाली सड़कों  Class-70 पुलों का निर्माण काम पूरा होने का इंतज़ार करना होगा

Class-70 सड़कें  पुल, का निर्माण ख़ास तरीके से किया जाता है  इनके ज़रिए भारी-भरकम तोपें  टैंक सरलता से ले जाए जा सकते हैं इन तोपों  टैंकों का वज़न आम तौर पर 70 टन के आसपास होता है इसलिए इसे Class 70 बोला जाता है

अरुणाचल प्रदेश, हिंदुस्तान का वो भाग है, जिसकी सीमाएं म्यांमार, भूटान  तिब्बत से मिलती हैंजिस तरह कश्मीर पर पाक की नज़र रहती है, अच्छा उसी तरह अरुणाचल प्रदेश भी चाइना हिंदुस्तान के बीच सीमा टकराव का केंद्र है अरुणाचल प्रदेश पर चाइना लगातार अपना दावा करता रहता है लेकिन, जम्मू व कश्मीर की तरह अरुणाचल प्रदेश भी हिंदुस्तान का अभिन्न अंग है

अक्साइ चिन  अरुणाचल प्रदेश पर कब्ज़ा करने के इरादे से 1962 में चाइना ने हिंदुस्तान पर हमला किया था उस वक्त इंडियन सैनिकों के साथ-साथ अरुणाचल प्रदेश के लोगों ने भी अदम्य साहस के साथ चाइना का सामना किया था हिंदुस्तान वो युद्ध भले ही पराजय गया था, लेकिन उस युद्ध ने पूरे हिंदुस्तान को पूर्वोत्तर हिंदुस्तान के लोगों के साथ एकजुट कर दिया था लेकिन इसके बदले में 70 सालों में अरुणाचल प्रदेश में उतना विकास नहीं हुआ जितना राष्ट्र के दूसरे हिस्सों का हुआ आज भी चाइना की सीमा के पास मौजूद अरुणाचल प्रदेश के दूर दराज के कई इलाकों तक पक्की सड़कें नहीं पहुंची हैं  ना ही इन इलाकों में ऐसा Infrastructure तैयार हो पाया है, जिसकी मदद से कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सके

जबकि,  चाइना ने अरुणाचल प्रदेश सहित Line of Actual Control के इलाकों तक सड़कों का निर्माण कर लिया है

चीन ने LAC के साथ 4 हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा लंबी, पक्की सड़कों का जाल बिछा दिया है

भारत की सीमा से 50 से 100 किलोमीटर के दायरे में चाइना के 5 से ज़्यादा Operational एयरबेस हैं

अरुणाचल प्रदेश में हिंदुस्तान की सीमा से सिर्फ 30 किलोमीटर की दूरी पर चाइना का न्यांगची एयरपोर्ट है

तिब्बत होते हुए हिंदुस्तान की सीमा तक यानी अरुणाचल प्रदेश तक चाइना ने 58 हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा लंबा रोड नेटवर्क भी तैयार किया है

तिब्बत में अपने व्यापक रेल नेटवर्क के जरिए भी चीन, सीमा पर मौजूद अपने सैनिकों तक रसद हथियार पहुंचा सकता है

अपने रोड, रेल  हवाई नेटवर्क की बदौलत चाइना अपनी 30 सैन्य टुकड़ियों को इंडियन सीमा तक बिना वक्त गंवाए पहुंचा सकता है चाइना की ऐसी एक सैन्य डिविज़न में करीब 15 हज़ार सैनिक होते हैं

अरुणाचल प्रदेश के सरहदी इलाकों में रहने वाले लोग भी ऐसा ही विकास  ऐसी ही सुरक्षा हिंदुस्तानमें देखना चाहते हैं लेकिन सच क्या है, अब ये देखिए

एक योजना के तहत Line of Actual Control पर 73 Strategic Roads का निर्माण किया जाना था और क़रीब 4 हज़ार 643 किलोमीटर लम्बी सड़कें बनाई जानी थीं

इस प्लान को पहली बार साल 1999 में Approve किया गया 2006 में ये तय किया गया था, कि साल 2012 तक इन सभी 73 सड़कों का निर्माण कर लिया जाएगा

लेकिन सच्चाई ये है, कि 2018 में अब तक इनमें से सिर्फ 28 सड़कों का निर्माण पूरा हो पाया है

भारत की ज्यादातर सड़कें बॉर्डर से 60 से 80 किलोमीटर पहले ही समाप्त हो जाती हैं

भारत को अरुणाचल प्रदेश में चाइना की सीमा के पास ये लक्ष्य पूरा करने के लिए 2022 तक का समय लगेगा हालांकि केंद्र गवर्नमेंट ने Border Road Organization को आदेश दिए हैं, कि सड़क निर्माण का ये कार्य साल 2020 तक किसी भी हाल में पूरा कर लिया जाए

रणनीतिक तौर पर संवेदनशील इलाकों में इन्फ्रास्ट्रक्चर ना होने या निर्बल ढांचे की वजह से सुरक्षा बलों की ऑपरेशनल क्षमता कमज़ोर होती है इसलिए Zee Media की टीम ने सीधे Ground Zero से यानी अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम इलाकों  Line Of Actual Control के बिल्कुल क़रीब जाकर एक रिपोर्ट तैयार की है ताकि आप ये समझ सकें, कि हमारे राष्ट्र के सैनिकों को ना सिर्फ दुश्मनों से सावधान रहना पड़ता है, बल्कि टूटी-फूटी सड़कों  ख़राब इंफ्रास्ट्रक्चर से भी जंग लड़नी पड़ती है

अरुणाचल प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जिसकी आंखों के सामने चाइना की चमक दमक है  पैरों के नीचे सख़्त सच्चाइयों वाली ज़मीन है अरुणाचल प्रदेश के लोग आज़ादी से अब तक, 70 सालों से सहनशील बने हुए हैं वो कभी राष्ट्र छोड़कर जाने की बात नहीं करते  ना ही कभी हिंदुस्तान विरोधी नारे लगाते हैं क्योंकि हिंदुस्तान प्रेम अरुणाचल प्रदेश के लोगों के DNA में है ये एक बहुत बड़ी बात है इसीलिए अब वक्त आ गया है, कि बिना देर लगाए, अरुणाचल प्रदेश की उम्मीदों को पूरा किया जाए ये सिर्फ वहां के नागरिकों के हित की बात नहीं है, ये देशहित की बात है

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