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व्हीलचेयर पर बैठकर लड़ी जिंदगी की जंग

देश की सैन्य सेवा में शामिल होने के इरादे से मैं सत्ताइस वर्ष पहले पुणे स्थित राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी से जुड़ा था. तीन वर्ष तक वहां प्रशिक्षण लेने के बाद देहरादून में एक वर्ष का दूसरा प्रशिक्षण लेकर कैप्टन बन चुका था, लेकिन मेरी ख़्वाहिश एक सैन्य प्रतियोगिता में भाग लेकर पैरा कमांडो बनने की थी.
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इसी कोशिश में मैं एक्सीडेंट का शिकार हो गया. मेरे बॉडी का निचला भाग बुरी तरह से जख्मी हो गया. हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू करके मुझे दिल्ली लाया गया, जहां डॉक्टरों ने मुझे बताया कि मैं अब दोबारा चल-फिर नहीं सकता. दिल को तोड़ देने वाले इस कड़वे हकीकत के साथ मैं दो वर्ष तक अस्पताल में पड़ा रहा. फिर भी मैं अपने भविष्य को लेकर आशान्वित रहा. नब्बे के दशक में अपने राष्ट्र में कंप्यूटरीकृत भविष्य की आहट सुनी जा सकती थी.

मैंने कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री करने का निर्णय किया. मैंने पढ़ाई पूरी की  कुछ वक्त तक पढ़ाने का भी कार्य किया. यह सब करते समय मैं खुश तो रहता, लेकिन पूरी तरह संतुष्ट नहीं था. मुझे हमेशा यही लगता कि भले ही मैं व्हीलचेयर पर हूं, मगर मैं इससे भी बड़ा कार्य कर सकता हूं. वैसे भी किसी को उसकी क्षमता नहीं, बल्कि सोच रोकती है. मैं अपने सैन्य सेवा काल में पहाड़ी रोमांचक खेलों का शौकीन रहा था. मैंने सोचा, क्यों न इसी एरिया में अपने को साबित किया जाए.

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खुद गाड़ी चलाकर लद्दाख की मर्सिमिक ला चोटी तक पहुंचे

2004 में इंटरनेट इतना शक्तिशाली था नहीं, जो इस कार्य में मेरी मदद कर सकता. इधर-उधर से जानकारी इकट्ठा करके मैंने तय किया कि मैं खुद गाड़ी चलाकर लद्दाख की मर्सिमिक ला चोटी तक जाउंगा. इसके लिए मैंने प्रायोजक ढूंढने प्रारम्भ कर दिए. मैंने वाहन कंपनियों से संपर्क साधा, बहुत ज्यादा मशक्कत के बाद टाटा कंपनी ने मेरी पूरी तहकीकात करके अपने एसयूवी वाहन सफारी के साथ मेरी यात्रा प्रायोजित की. मैंने उन्हें निराश नहीं किया  लिम्का रिकॉर्ड बनाते हुए मात्र पचपन घंटों में वह यात्रा तय की.

मेरा रिकॉर्ड आज तक बरकरार है. यह तो थी खुद को साबित करने की प्रक्रिया. समाज के लिए कार्यकरने की मेरी ख़्वाहिश अभी तक अधूरी थी. मुझे याद है कि स्कूल में मैंने पढ़ा था कि महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि कार्य वह करो, जिसका लाभ समाज के सबसे निर्बल वर्ग को हो. राष्ट्रपिता का यह संदेश मेरे जेहन में था, पर मैं करूं क्या, इसकी समझ तब आई, जब एक दिन गुड़गांव के एक मार्केटके पार्किंग में मैंने एक दो वर्ष की बच्ची को रोते हुए देखा.

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सर्द शाम में उस बच्ची के बॉडी पर एक फटा-सा कपड़ा था. मैंने उस बच्ची की सभी तात्कालिक जरूरतें पूरी करके उसके घर तक पहुंचाया. वह घटना मेरे लिए एक संदेश की तरह थी. उस दिन से मैंने समाज के तमाम जरूरतमंद बच्चों के लिए कार्य करना प्रारम्भ कर दिया. मैंने 2007 में एक संस्था बनाई. मेरी संस्था अलग-अलग बच्चों की उनकी जरूरतों के हिसाब से मदद करती है, क्योंकि मैं मानता हूं कि हर बच्चे की आवश्यकता एक समान नहीं होती है. मैं दर्जनों बच्चों को उनकी जिंदगी बेहतर करने में अपना सहयोग दे चुका हूं, उनमें पंद्रह वर्ष का सनी भी शामिल है, जो बचपन से अपंग था. वह बच्चा आज मेधावी विद्यार्थी है  पूरे आत्मविश्वास के साथ जी रहा है. बच्चों के इतने करीब रहने के कारण मैंने कुछ किताबें भी लिखी हैं, जिनमें हौसले से भरी कविताएं  कहानियां शामिल हैं.

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