Friday , September 21 2018
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न्यायालय के आदेश पर अमल होता तो नहीं होती सीलिंग

राजधानी स्लम में तब्दील होती जा रही है. राजधानी रहने लायक नहीं है  लोगों का दम घुट रहा है.यदि भूकंप आया तो आधी से ज्यादा दिल्ली तबाह हो जाएगी. न्यायालय से लेकर सर्वोच्च कोर्ट तक यह कड़ी टिप्पणियां कई बार कर चुकी है बावजूद राजनेताओं ने अपनी वोट बैंक की पॉलिटिक्स के चलते कभी भी इन समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दिया बल्कि जो भी आदेश के विरूद्ध आंदोलन करता है राजनीतिक दल उसी का साथ देने में जुट जाते हैं.
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वर्तमान में राजधानी में सीलिंग का मुद्दा प्रमुख है. सीलिंग अधिकांशत: अनधिकृत निर्माण के विरूद्धया फिर मास्टर प्लान का उल्लंघन करने वालों पर हो रही है. इसकी चपेट में ज्यादातर दुकानदार आ रहे हैं. यदि न्यायालय के आदेश पर गवर्नमेंट थोड़ा सा भी अमल कर लेती तो यह नौबत ही नहीं आती. दरअसल न्यायालय का कार्य कानून को अमल में लाना है, मगर गवर्नमेंट चाहती है कि न्यायालय अनधिकृत निर्माण पर अपनी मुहर लगा दे.

1996-97 के दौरान तत्कालीन CM साहिब सिंह वर्मा अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करवाने की मांग को लेकर न्यायालय पहुंचे. न्यायालय के समक्ष उन्होंने गरीब लोगों का तर्क रखा.न्यायालय ने बोला कि आप शपथपत्र दें कि भविष्य में कोई अनधिकृत कॉलोनी नहीं बनेगी न्यायालय अब तक की सभी कॉलोनियों को पास करने की मंजूरी प्रदान कर देगी, मगर वर्मा ने ऐसा करने से मना कर दिया  आज तक अनधिकृत कॉलोनियों का मामला लंबित है.

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ई-रिक्शा मामले में भी केंद्र, दिल्ली गवर्नमेंट और लोकल निकाय न्यायालय से आग्रह करते रहे कि ई-रिक्शा को चलाने की मंजूरी दें लेकिन साथ ही माना कि ई-रिक्शा गैरकानूनी रूप से चल रही हैं.न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए बोला था कि आप न्यायालय से गैरकानूनी को कैसे वैध करवाने की अपेक्षा कर सकते हैं. आज भी कई वर्षो से मामला लंबित है.

सर्वविदित है कि अधिकतर दुकानदारों ने अनधिकृत तरीके से अपनी दुकानें सरकारी भूमि पर कब्जा कर बढ़ा रखी हैं. राजधानी के किसी भी मार्केट में न तो चलने की स्थान है  न ही पार्किंग की व्यवस्था. कांग्रेस पार्टी नेता यह कहते रहे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में सीलिंग से राहत दिलवाने के लिए कानून बनाया लेकिन वह अस्थायी ही था. इसी कानूनी की आड़ में अनधिकृत निर्माण होता रहा  आज यह हालत आ गई कि सर्वोच्च न्यायालय को आम लोगों के हितों में कड़ा कदम उठाना पड़ा है.

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सर्वोच्च कोर्ट ने माना कि दिल्ली में बेगुनाह लोगों के ज़िंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है क्योंकि उनके लिए पानी है न ही साफ हवा. गवर्नमेंट किसी भी पार्टी की हो, हर पार्टी वोट बैंक के चलते अनधिकृत निर्माण करने वालों के हितों में झुकती रही है. साल 2006 में भी राजधानी में सीलिंग हुई थी. उस समय इतने व्यापक स्तर पर सीलिंग हुई थी कि मार्केट के मार्केट बंद हो गए थे.

गवर्नमेंट ने अध्यादेश लाकर व्यापारियों को राहत दे दी. लेकिन इसके बाद कुछ नहीं किया गया आज उन बाजारों की हालत यह है कि वहां आम लोगों का घुसना तक कठिन हो गया है. अब फिर सीलिंग की तलवार लटक रही है. यदि पिछले 12 वर्षो में सरकारों ने इस दिशा में ठोस कदम उठाए होते तो आज सीलिंग की तलवार व्यापारियों के सिर पर न होती.

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