Wednesday , September 19 2018
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महाराष्ट्र गवर्नमेंट ने दिया अनाथों को जॉब में 1 प्रतिशत आरक्षण

मुझे अपनी मां  पिता का चेहरा याद नहीं है. बस इतना याद है कि जब मैं बहुत छोटी थी, तब से अनाथालय में रही हूं. मुझे नहीं पता कि वह कौन-सी मजबूरी थी, जिसने मेरे पिता को मुझे ढाई वर्षकी आयु में अनाथालय में छोड़ने पर विवश कर दिया था.
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मुझे खुद से दूर करते वक्त अनाथालय के रजिस्टर में उन्होंने मेरा नाम  उपनाम लिख दिया था.उनकी यही विरासत अब तक मेरे साथ है. अट्ठारह वर्ष की आयु तक मैं गोवा के मातृछाया (अनाथालय) में रही. अनाथालय में मेरी जैसी कई लड़कियां थीं. कई मर्तबा हमें परिवार, मां-बाप की कमी खलती, लेकिन हम जानते थे कि यह कमी कभी नहीं पूरी होने वाली. इन्हीं एहसासों ने मुझे वक्त से पहले समझदार बना दिया.

समय बीतता गया  मैं बड़ी होती गई. जब मैं बालिग हो गई, तो अनाथालय के नियमों के मुताबिक, मुझे अनाथालय छोड़ना था. कागजी नियम के हिसाब से यह मान लिया जाता है कि अट्ठारह की आयुमें कोई भी आदमी अपना ख्याल रख सकता है  उसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन मुझे तो आवश्यकता थी! मैं अभी पढ़ रही थी  चिकित्सक बनना चाहती थी. अनाथालय की दूसरी लड़कियों की तरह मैं जल्द विवाह करके घर बसाने का बिल्कुल भी नहीं सोच रही थी. मेरे लिए एक लड़का भी ढूंढ लिया गया था. मैं जिंदगी के एक ऐसे मोड़ पर थी, जब पहली बार मुझे एक बड़ा निर्णयकरना था.

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या तो मैं विवाह करके औरों की तरह सामान्य जिंदगी चुनती या फिर अनाथालय छोड़कर बिल्कुल अंजान संसार में अपना रास्ता खुद बनाती. मैंने दूसरा विकल्प चुना. उस वक्त मुझे कुछ नहीं पता था कि मैं क्या करूं, कहां जाऊं. हकीकत कहूं, तो मैं भयानक डरी हुई थी. किसी तरह मैंने खुद को संभाला  पुणे आ गई. पुणे में भी मेरा कोई नहीं था, मुझे पहली रात स्टेशन पर बितानी पड़ी. यहीं से मेरा असल प्रयत्न प्रारम्भ हुआ.

अस्तित्व के लिए मैंने घरों, दुकानों  अस्पतालों में कार्य किया. फिर इन्हीं कार्य के बदले मिले कुछ पैसों को जोड़कर एक कॉलेज में प्रवेश लिया. मैं दिन में कार्य करती  सांध्य कक्षाओं में भाग लेती.मुझे रहने के लिए सरकारी छात्रावास मिला था. इसी तरह दिन में एक बार खाना खाकर मैंने आखिरकार स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली. चिकित्सक बनने का सपना तो कब का टूट चुका था, अब मैंने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की इम्तिहान में बैठने का निर्णय किया.

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मैं इम्तिहान में बैठी  39 प्रतिशत अंक अर्जित किए. आरक्षण प्रवाधानों में नॉन क्रीमीलेयर के लिए पैंतीस प्रतिशत कट ऑफ था, पर मेरे पास नॉन क्रीमीलेयर परिवार से होने का कोई प्रमाण लेटर नहीं था. मेरे लिए यह सबसे नयी समस्या थी. मुझे यह बात अखर गई कि राष्ट्र में अनाथों के लिए आरक्षण की कोई पृथक व्यवस्था नहीं है. इस विषय पर गहन चिंतन करने के बाद मैंने तय कर लिया कि इस विषय को राज्य के CM तक पहुंचाऊंगी.

लेकिन CM से मिल पाना इतना सरल नहीं था. मगर मैंने भी उनसे मिलने की ठान रखी थी, जिसमें मुझे सफलता मिली भी. CM ने मेरी बात ध्यान से सुनी  इस बारे में कोई ठोस कदम उठाने का भरोसा दिलाया. मुलाकात के तीन महीने बाद ही महाराष्ट्र गवर्नमेंट ने अनाथों के लिए सरकारी जॉबमें एक प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान लाने का एलान कर दिया. मैं अभी एमए की पढ़ाई कर रही हूं मैं चाहती हूं कि ऐसा पूरे राष्ट्र में हो.

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