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स्वास्थ्य के लिए जबरदस्त है ‘रेड लव’

स्विट्जरलैंड के सेब की खास किस्म ‘रेड लव’ हिमाचल पहुंच गई है. यह सेब बाहर से तो लाल होता ही है, भीतर से भी टमाटर की पूरी तरह लाल होता है. इसके फूल भी लाल रंग के ही होते हैं. इसकी साइनवुड यानी कलम को भी काटा जाए तो उसमें भी भीतर खून की तरह लाल रंग दिखता है.
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बागवानों का दावा है कि हिमाचल पहुंची सेब की यह किस्म हिंदुस्तान में पहली बार उगाई जा रही है.हिमाचल के कुछ बागवानों के बगीचों में सेब की इस किस्म में इस वर्ष पहली बार फल उगेंगे. इस सेब की अच्छाई यह है कि इसमें सामान्य सेब से 40 प्रतिशत ज्यादा एंटी ऑक्सीडेंट तत्व होते हैं. इससे यह किस्म सेहत के लिए फायदेमंद होती है.

रेड लव किस्म सबसे पहले स्विट्जरलैंड के एक नर्सरी मालिक मारकस कोबेल्ट ने तैयार की. यह साल 2010 में जब तैयार की गई तो इसने खूब सुर्खियां बटोरीं. इसके बाद सेब यूरोपीय राष्ट्रों में उगाया जाने लगा.

यूरोप के रास्ते यह किस्म अब हिमाचल में भी पहुंच चुकी है. हिमाचल के कुछ सेब बागवानों के पास इस किस्म के दर्जन भर पौधे पहुंचे तो पिछली सर्दियों में उन्होंने इससे साइनवुड निकालकर इसकी लोकल सेब किस्मों के पेड़ों पर कलमें कर टॉप ग्राफ्टिंग की.

शौक से उगा सकते हैं, मगर बाजार की परख बाकी

अब इसकी पहली फसल भी आने वाली है. बखोल गांव के प्रगतिशील बागवान संजीव चौहान ने बोलाकि उनके पास भी सेब की यह किस्म आ चुकी है. उन्होंने कुछ बागवानों से इसकी साइनवुड प्राप्त की.

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कुछ प्रगतिशील बागवानों ने इसके पौधे ट्रायल के लिए यूरोप से मंगवाए हैं. इसकी कलमें कर अब इस किस्म के कई पेड़ तैयार कर लिए गए हैं. इस सीजन में उम्मीद है कि इस पर फ ल भी उग आएंगे.उन्होंने बोला कि यह किस्म आने वाले वक्त में बड़े स्तर पर उगाई जाएगी.

‘विदेशों से मंगवाई जा रही अन्य किस्मों की तरह ही अगर सेब बागवानों ने यह किस्म मंगवाई है तो अच्छा है. बागवान शौक के लिए इस किस्म को उगा सकते हैं, मगर ये उपयोगी होगी कि नहीं.हिंदुस्तान की मंडियों में इस सेब के उतरने से पहले कुछ नहीं बोला जा सकता है. हिंदुस्तान के ज्यादातर लोग दवा के नाम पर फलों को कम खाते हैं.

वे तो बस फल समझकर ही खाते हैं. यहां वही सेब किस्म ज्यादा चलती है जो लोगों में प्रचलित हो.ऐसे में रेड डिलिशियस किस्में ही ज्यादा चलन में हैं. देखना होगा कि रेड लव किस्म बाजार में कितनी खरी उतरती है.’ – डा विजय सिंह ठाकुर, उद्यान वैज्ञानिक एवं पूर्व कुलपति, डा यशवंत सिंह परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी. 

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